रात के अंधेरे में, जब चांद भी कहीं छुप गया था, राधा के मन में एक अजीब सी हलचल थी। बस स्टैंड से फूटी कच्ची सड़क पर अकेली चलती हुई उसे लगा जैसे हर कदम एक नई आहट जगा रहा हो, कोई अनजानी पुकार उसके भीतर से उठ रही हो। यह **अकेली लड़की का रात का सफर** था, एक ऐसा सफर जिसका अंजाम उसे खुद भी नहीं पता था। गांव की पगडंडियाँ सूनसान थीं, हवा में रात की नमी और मिट्टी की सौंधी गंध घुली थी, जो उसके तन में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी। उसकी रेशमी साड़ी हवा में सरसरा रही थी, और हर सरसराहट पर उसके बदन में एक मीठी तड़प उठती थी।
जब वह देर रात अपने चचेरे भाई रोहन के घर पहुंची, तो पूरा गांव सो रहा था। सिर्फ रोहन ही उसकी राह तक रहा था। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसकी आँखें राधा के थके हुए, पर मदहोश करने वाले रूप पर ठहर गईं। राधा की साड़ी थोड़ी अस्त-व्यस्त थी, पसीने की बूंदें उसके माथे पर चमक रही थीं, और उसके होंठ प्यासे से लग रहे थे।
“राधा, तुम आ गईं? इतनी देर हो गई! कोई परेशानी तो नहीं हुई रास्ते में?” रोहन की आवाज़ में चिंता थी, पर उसकी आँखों में कुछ और ही गहरा रहा था।
राधा ने एक गहरी सांस ली। “बस थोड़ी थकान हो गई, रोहन। सफर लम्बा था।”
रोहन ने बिना कुछ कहे, उसका हाथ थामा और उसे भीतर ले गया। घर में हल्की डिम रोशनी जल रही थी, जो उनके चेहरों पर एक रहस्यमयी चमक बिखेर रही थी। रोहन ने उसे बैठने का इशारा किया और पानी लाने चला गया। राधा सोफे पर बैठ गई, उसकी निगाहें रोहन के मज़बूत कंधों और पीठ पर टिकी थीं। यह **अकेली लड़की का रात का सफर** उसे कहाँ ले आया था, उसे समझ नहीं आ रहा था, पर उसके भीतर एक अजीब सी उत्तेजना पनप रही थी।
पानी का गिलास उसके हाथों में थमाते हुए रोहन का हाथ राधा के हाथ से छू गया। एक बिजली सी सरक गई दोनों के बदन में। रोहन की साँसें तेज़ हो गईं, और राधा की धड़कनें। उसने गिलास किनारे रखा, और रोहन को अपनी ओर खींच लिया।
“रोहन…” राधा की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई।
रोहन ने बिना देर किए राधा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। एक लम्बी, गहरी चूम, जिसमें सदियों की प्यास समाई थी। राधा ने पूरी तरह से खुद को रोहन के हवाले कर दिया। उसकी उंगलियाँ रोहन के बालों में उलझ गईं, और उसके होंठ और भी तेज़ी से उसे चूमने लगे। रोहन के हाथों ने राधा की कमर को थामा, फिर धीरे-धीरे साड़ी के पल्लू को खिसकाते हुए उसकी नंगी कमर पर उतर गए। राधा की आँखें बंद हो गईं, उसके पूरे बदन में एक आग सी लगने लगी थी।
रोहन ने उसे बाहों में उठाया और सीधा बेडरूम में ले गया। धीमी रोशनी में राधा का रूप और भी मोहक लग रहा था। रोहन ने बड़े प्यार से उसकी साड़ी खोली, फिर ब्लाउज और पेटीकोट। राधा अब सिर्फ अपनी अंतर्वस्त्रों में थी, उसके उभार और भी स्पष्ट दिख रहे थे। रोहन ने एक-एक करके उन्हें भी उतार दिया। राधा की पलकें झपक रही थीं, उसके भीतर की वासना अब काबू से बाहर हो रही थी।
रोहन ने अपने कपड़े उतारे और राधा के सामने नग्न खड़ा हो गया। उसकी मर्दानगी राधा की आँखों में एक तूफान जगा रही थी। वह पलटा और राधा को अपनी बाहों में भरकर बिस्तर पर लिटा दिया। उनके जिस्मों का मिलन ऐसा था जैसे सदियों से इंतज़ार कर रहे दो नदी के धाराएं अब एक होकर समुद्र में मिल रही हों। रोहन के होंठ राधा की गर्दन, छाती, पेट और जाँघों पर घूम रहे थे, हर जगह आग लगा रहे थे। राधा की आहें, उसकी मदहोश चीत्कारें पूरे कमरे में गूंज रही थीं।
जब रोहन ने धीरे-धीरे अपना लौह स्तंभ उसके भीतर उतारा, तो राधा के मुँह से एक मीठी चीख निकली। उसकी आँखों में आंसू थे, पर वे दर्द के नहीं, परमानन्द के आंसू थे। रोहन ने उसे कसकर पकड़े रखा और धीरे-धीरे अपनी ताल पर नाचने लगा। राधा ने अपनी टांगें उसकी कमर में फंसा लीं और हर झटके के साथ और गहराई में उतरती गई। उनके जिस्म एक हो गए थे, पसीने और वासना की गंध से कमरा भर गया था। राधा का शरीर रोहन के हर प्रहार पर ऊपर-नीचे होता, और वह हर बार “और तेज़, रोहन, और तेज़” कहती रही। उनकी सांसें उखड़ रही थीं, पर उनके जिस्मों की भूख अभी शांत नहीं हुई थी।
कई बार चरम सुख के बाद, जब उनके बदन थककर एक दूसरे में पिघल गए, तो राधा रोहन की बाहों में सिकुड़ी हुई थी। बाहर रात अभी भी काली थी, पर उनके भीतर अब कोई अंधकार नहीं था। यह **अकेली लड़की का रात का सफर** सिर्फ एक यात्रा नहीं था, यह खुद को पाने का, अपनी सबसे गहरी इच्छाओं को पहचानने का सफर था। राधा ने रोहन को और कसकर अपनी बाहों में भर लिया, उसके होठों पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। अगली सुबह की किरणें उनकी ज़िंदगी में एक नया अर्थ लेकर आने वाली थीं।
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