राधा की आँखों में आज एक अजीब सी प्यास थी, जो उसके खाली दामन और अधूरी रातों की कहानी कह रही थी। दोपहर की तपती धूप खिड़की से झाँक कर कमरे में एक उदास रोशनी बिखेर रही थी, पर राधा के अंदर की आग कहीं ज़्यादा तेज़ थी। उसका पति, सुरेश, अक्सर व्यापार के सिलसिले में बाहर रहता, और पीछे छोड़ जाता राधा की सूनी देह और उससे भी ज़्यादा सूनी आत्मा को।
आज दोपहर भी वही दिन था। सुरेश शहर से बाहर था। राधा अपनी साड़ी के पल्लू से माथे का पसीना पोंछ रही थी, जब दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। समीर था। पड़ोस में रहने वाला समीर, जिसके दिल में राधा के लिए सिर्फ़ पड़ोसन से ज़्यादा कुछ था, यह दोनों ही जानते थे। उसकी आँखें हमेशा राधा के जिस्म पर एक भूखी नज़र रखती थीं, और राधा भी इस बात से अनजान नहीं थी। आज उसकी आँखों में कुछ ज़्यादा ही स्पष्टता थी।
“पानी चाहिए था, राधा जी,” समीर ने आवाज़ को नम्र रखने की कोशिश की, पर उसकी नज़र राधा के ब्लाउज के भीतर उभरते वक्ष पर टिक गई। राधा समझ गई। आज समीर सिर्फ़ पानी मांगने नहीं आया था। उसकी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** आज जैसे समीर की आँखों से सीधे उसकी आत्मा में उतर रही थी।
“अंदर आ जाओ, समीर,” राधा की आवाज़ में एक अनकही सहमति थी। समीर अंदर आया और राधा ने दरवाज़ा बंद कर दिया। कमरे की हल्की रोशनी में दोनों की धड़कनें तेज़ होने लगीं। समीर ने धीरे से राधा का हाथ पकड़ा। राधा का बदन सिहर उठा। यह स्पर्श अनजाना नहीं था, यह वह था जिसकी उसने बरसों से कल्पना की थी।
समीर ने राधा को अपनी बाँहों में भर लिया। राधा ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि खुद को उसके और करीब खींच लिया। समीर के होठ राधा के होठों पर उतर आए, एक भूखे प्यासे की तरह। राधा ने भी अपनी आँखें मूँद लीं और अपनी जीभ को समीर की जीभ से उलझा दिया। उनके मुंह में एक मीठा, नमकीन युद्ध शुरू हो गया, जिसमें दोनों ही हारना चाहते थे। समीर के हाथ राधा की कमर पर सरकते हुए उसकी साड़ी के पल्लू को पीछे धकेलने लगे। राधा की साँसें तेज़ हो गईं।
एक पल में, राधा की साड़ी ज़मीन पर गिर गई, उसके पेटिकोट और ब्लाउज में ढका बदन समीर की आँखों के सामने था। समीर की आँखें वासना से चमक उठीं। उसने राधा के ब्लाउज के हुक खोले और उसे एक झटके में उतार दिया। राधा के भरे हुए स्तन, गहरे निप्पल, समीर के लिए एक निमंत्रण थे। समीर ने उन्हें अपने हाथों में भरकर सहलाना शुरू किया, फिर झुककर एक निप्पल को अपने मुँह में ले लिया। राधा के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली। उसकी उंगलियाँ समीर के बालों में उलझ गईं, उसे और कसकर अपने ऊपर दबाने लगीं।
“समीर…” राधा मुश्किल से कह पाई, “मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकती।”
समीर ने उसके कान में फुसफुसाया, “मैं भी नहीं, मेरी रानी।” उसने राधा को बिस्तर पर धकेला, उसके पेटिकोट को भी उतार दिया। अब राधा पूरी तरह निर्वस्त्र थी, उसकी कामुक देह समीर के सामने थी, काँपती हुई, प्यासी। समीर ने अपने कपड़े भी उतार दिए, उसका मर्दाना लिंग उत्तेजित होकर राधा को निमंत्रण दे रहा था।
समीर राधा के ऊपर आ गया। उसकी निगाहें राधा की योनि पर टिकी थीं, जो पानी से भीगी हुई, उसे पुकार रही थी। उसने धीरे से अपने लिंग को राधा की योनि के द्वार पर टिकाया। राधा ने एक गहरी साँस ली और अपनी टाँगें फैला दीं। समीर ने एक धीमा धक्का दिया। पहली बार में ही उसका लिंग राधा की गहराई में समा गया। राधा के मुँह से एक दर्द भरी आह निकली, जो जल्द ही सुख की सिसकी में बदल गई।
समीर ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए, फिर उसकी गति तेज़ होती गई। हर धक्के के साथ राधा का बदन थिरक रहा था। “और तेज़, समीर… और तेज़…” राधा की आवाज़ अब सिर्फ़ कामुकता में डूबी हुई थी। उनके शरीर पसीने से भीग गए थे। कमरे में सिर्फ़ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ें और राधा की मदहोश कर देने वाली आहें गूँज रही थीं। यह **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** अब एक प्रचंड अग्नि में बदल चुकी थी, जो उन्हें पूरी तरह जला रही थी।
दोनों एक-दूसरे में खोए हुए थे, समय का कोई बोध नहीं था। हर धक्का उन्हें आनंद के एक नए स्तर पर ले जा रहा था। जब चरम सुख अपने शिखर पर पहुँचा, तो राधा का बदन काँप उठा। समीर ने एक ज़ोरदार धक्का दिया और उसकी सारी गर्मजोशी राधा के भीतर उड़ेल दी। दोनों एक-दूसरे पर निढाल होकर गिर पड़े, साँसें तेज़ थीं, पर दिल को असीम शांति मिल चुकी थी।
राधा ने समीर को कसकर पकड़ा हुआ था। “आज तुमने मेरी अधूरी जिंदगी को पूरा कर दिया, समीर,” उसने फुसफुसाया। समीर ने राधा के माथे को चूमा। यह एक गुप्त मिलन था, चोरी का सुख, पर इस पल में उन्हें पता था कि उनकी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** आज पूरी तरह तृप्त हो चुकी थी, और यह सिर्फ़ शुरुआत थी। कमरे में अभी भी उनकी साँसों और पसीने की मादक गंध तैर रही थी, जो इस रात की चोरी के सुख की गवाह थी।
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