अधूरी शादीशुदा जिंदगी की आग और पराये बदन का सुकून

माया की आँखें आज फिर खिड़की से बाहर किसी उम्मीद को टटोल रही थीं, पर उसके भीतर की प्यास बुझने का नाम नहीं ले रही थी। शादी को पाँच साल हो गए थे, पर पति सुरेश की व्यस्त दिनचर्या और बेरुखी ने उसके मन में एक गहरा शून्य भर दिया था। बिस्तर पर भी उनकी नज़दीकियाँ बस एक रस्म बनकर रह गई थीं, जहाँ माया के जिस्म की तड़प हमेशा अधूरी ही रहती। इस अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत में वह हर रोज़ घुटती थी। उसकी जवान देह में सुलगती आग बस राख होने को थी, जब तक राहुल, नया पड़ोसी, उसकी जिंदगी में नहीं आया था।

राहुल, जो पिछले महीने ही बगल के मकान में रहने आया था, एक अकेला, आकर्षक नौजवान था। एक दिन जब माया की नलकी खराब हो गई और सुरेश घर पर नहीं थे, राहुल ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया था। उस दिन उनके बीच बस एक छोटी सी बातचीत हुई थी, पर राहुल की आँखों में उसने कुछ ऐसा देखा था, जो सुरेश की आँखों में सालों से नहीं दिखा था – एक गहरा आकर्षण, एक आमंत्रित करने वाली चमक। उसके बाद से, वे कभी-कभार बालकनी पर टकरा जाते, एक मुस्कान का आदान-प्रदान होता, पर माया के मन में हलचल मच चुकी थी। उसकी देह, जो इतने सालों से उपेक्षित थी, राहुल के एक छोटे से स्पर्श से भी सिहर उठती।

आज दोपहर सुरेश ऑफिस से देर से लौटने वाले थे। माया बालकनी में कपड़े सुखा रही थी कि तभी राहुल अपने दरवाजे पर दिखाई दिया। “नमस्ते, माया जी। सब ठीक है?” उसकी आवाज़ में वो गर्मजोशी थी जो माया के कानों को बरसों बाद सुनाई दी थी। माया ने संकोच से मुस्कान दी। “हाँ, राहुल जी। बस कपड़े सुखा रही थी।”

“आज मौसम कुछ अजीब है, लगता है बारिश आएगी।” राहुल ने बात बढ़ाने की कोशिश की।

माया ने देखा, उसकी आँखों में वही आकर्षण था। “शायद…” कहते हुए उसकी नज़रें राहुल के मज़बूत कंधों और भरी हुई छाती पर जा टिकीं। उसके भीतर की आग फिर से भड़क उठी।

“अगर कभी कोई काम हो तो बेझिझक बताइएगा,” राहुल ने कहा और उनकी आँखें फिर मिलीं। उस पल, दोनों के बीच एक अनकही सहमति बन गई थी।

आधे घंटे बाद, जब माया रसोई में चाय बनाने जा रही थी, तो उसके दरवाजे पर दस्तक हुई। राहुल था। “माया जी, मेरा वाई-फाई काम नहीं कर रहा। सोचा आपसे पूछ लूँ कि आपका चल रहा है या नहीं।” उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा।

माया का दिल ज़ोरों से धड़क उठा। “अंदर आइए राहुल जी,” उसने न्योता दिया। राहुल अंदर आया, और जैसे ही वह भीतर आया, कमरे में एक अजीब सी गर्मी भर गई। माया ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

“आप बैठिए, मैं देखती हूँ।” माया जानती थी कि उसे वाई-फाई से कोई मतलब नहीं था, और ना ही उसे। उसने पास आकर अपना लैपटॉप खोला, पर उसका ध्यान लैपटॉप पर नहीं, राहुल की ओर था। राहुल की नज़रें माया के खुले गले और कमर के घुमावों पर टिकी थीं। माया ने जान-बूझकर थोड़ा और झुककर उसे देखने का मौका दिया।

“शायद कुछ सेटिंग का इश्यू है,” माया ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना थी।

राहुल ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा जो लैपटॉप पर था। “नहीं माया जी, इश्यू यहाँ है।” उसने माया की उंगलियों को धीरे से सहलाते हुए कहा।

माया की साँसें तेज़ हो गईं। उसने राहुल की आँखों में देखा और उसकी अधरों पर एक शरारती मुस्कान आ गई। राहुल ने हिम्मत की और धीरे से माया के गालों पर अपना हाथ फेरा। माया ने अपनी आँखें बंद कर लीं, बरसों बाद उसे किसी पराये पुरुष के हाथों का यह मीठा स्पर्श मिला था।

राहुल ने उसे अपनी ओर खींचा और उनके होंठ मिले। यह कोई साधारण चुंबन नहीं था। यह दो प्यासी आत्माओं का मिलन था। माया के सूखे होंठों को जैसे बरसों बाद अमृत मिला था। उसकी जीभ राहुल की जीभ से उलझी, हर एक कतरा अमृत सा लग रहा था।

राहुल के हाथ माया की पीठ पर घूमने लगे, धीरे-धीरे उसकी साड़ी के पल्लू को खिसकाते हुए। माया की देह में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। वह खुद को राहुल को सौंप रही थी, अपनी सारी दबी हुई इच्छाओं को बाहर निकलने दे रही थी। राहुल ने उसे अपनी बाहों में उठाया और बेडरूम की ओर चला। पलंग पर लिटाकर उसने माया की साड़ी खोली, फिर ब्लाउज और पेटीकोट। माया का गोरा, सुडौल बदन राहुल के सामने था, थोड़ा शरमाया हुआ, पर पूरी तरह से कामुक।

राहुल ने उसके स्तनों को अपने हाथों में भर लिया, उन्हें सहलाते हुए, फिर अपने होंठों से उन्हें चूमने लगा। माया के मुँह से दर्दभरी आह निकली, जो धीरे-धीरे सुख में बदल गई। उसकी अंगुलियाँ राहुल के बालों में उलझ गईं। राहुल का स्पर्श उसकी अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत को पूरा करने का इकलौता ज़रिया बन रहा था।

कपड़े कब उतरे, उन्हें पता ही नहीं चला। अब दोनों के नग्न बदन एक-दूसरे से सटे थे, त्वचा की गर्मी एक-दूसरे में घुल रही थी। राहुल ने माया के भीतर धीरे-धीरे प्रवेश किया। माया की आँखें बंद थीं, उसके होंठों से एक मीठी चीख निकली। बरसों की प्यास, बरसों की तड़प एक ही पल में जैसे पिघल गई थी। राहुल ने अपनी गति बढ़ाई, और माया उसके हर एक धक्के के साथ हवा में उड़ रही थी। उनकी साँसें, उनके पसीने, उनकी आहें सब एक हो गईं। बेडरूम कामुक गंध से भर गया था। माया अपने वजूद को भूल चुकी थी, बस राहुल के साथ उस पल में जी रही थी। उसकी कमर राहुल के हर वार के साथ ऊपर उठती, उसकी टाँगें राहुल की कमर को जकड़े हुए थीं।

जब दोनों चरम पर पहुँचे, तो माया की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। यह सिर्फ शारीरिक सुख नहीं था, यह आत्मा की तृप्ति थी। वे एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी साँसें धीरे-धीरे शांत हो रही थीं। आज उसे अपनी अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत का एक अनमोल पल मिल गया था। राहुल ने उसे अपने आलिंगन में कसकर रखा, और माया को लगा कि आज उसने सच में जी भर कर साँस ली है। उसके भीतर की आग शांत हो चुकी थी, कम से कम कुछ देर के लिए। यह एहसास अमिट था।

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