आज दोपहर की गर्मी ने प्रिया के भीतर एक अजीब सी बेचैनी जगा दी थी, जो सिर्फ बदन की नहीं, बल्कि रूह की थी। पति महेश ऑफिस गए थे और घर बिलकुल खाली था। इस सन्नाटे में प्रिया की आत्मा का कोना-कोना चीख रहा था, एक ऐसी प्यास लिए हुए जिसे कभी बुझाया ही नहीं गया था। उसकी शादीशुदा जिंदगी एक सूखी नदी की तरह थी, जिसमें प्रेम और वासना का पानी सूख चुका था। यही थी उसकी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत**, एक ऐसी प्यास जो भीतर ही भीतर उसे जला रही थी।
उसने अपने बेडरूम की खिड़की से बाहर झाँका। सामने वाले मकान की छत पर राज, उनका नया पड़ोसी, कुछ काम कर रहा था। राज की गठीली देह पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, और उसकी हर हरकत में एक मर्दाना आकर्षण था। प्रिया की नज़रें उस पर ठिठक गईं। अचानक राज ने पलटकर देखा और उनकी नज़रें मिल गईं। एक पल के लिए समय थम सा गया। राज की आँखों में एक गहरी, आमंत्रित चमक थी, जिसने प्रिया के भीतर सोई हुई कामुकता को जगा दिया। उसके गालों पर हल्की सुर्ख़ी दौड़ गई।
कुछ देर बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई। प्रिया का दिल तेज़ी से धड़क उठा। उसने दरवाज़ा खोला, तो सामने राज खड़ा था। उसके हाथ में एक पानी का ग्लास था। “पानी लेने आया था, भाभी जी,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी जो प्रिया के कानों से होते हुए सीधे उसके दिल में उतर गई। प्रिया ने उसे अंदर आने का इशारा किया। राज अंदर आया और उसकी आँखें सीधे प्रिया की आँखों से मिलीं। हवा में एक अजीब सी गर्माहट तैर रही थी।
“अकेली हैं आप?” राज ने पूछा, उसकी आवाज़ में हमदर्दी कम, और कुछ और ज़्यादा थी।
प्रिया ने सिर्फ सिर हिलाया। उसने देखा कि राज की नज़रें उसकी साड़ी में ढकी छाती पर टिकी हैं। उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी, जैसे वह उसके भीतर की हर बात जानता हो। प्रिया को लगा जैसे उसकी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** आज सच होने वाली थी।
राज धीरे से उसके करीब आया, और उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। प्रिया सिहर उठी। उसके स्पर्श में एक ऐसी आग थी जो महेश के स्पर्श में कभी नहीं थी। राज ने उसकी आँखों में देखा, और प्रिया ने अपनी पलकें झुका लीं, अपनी रजामंदी जताते हुए। राज ने धीरे से उसके चेहरे को अपनी उंगलियों से सहलाया, और फिर उसके होंठों पर झुक गया।
वह एक जंगली, प्यासा चुम्बन था। राज के होंठों ने प्रिया के होंठों को निगल लिया, और उनकी जीभें एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो गईं। प्रिया की दबी हुई आहें उसके गले से निकलीं। राज ने उसे अपनी बाहों में भर लिया, और उसे अपने बेडरूम की ओर ले गया। दरवाज़ा बंद हुआ और कमरा अँधेरे में डूब गया, सिर्फ बाहर से आती रोशनी की एक पतली लकीर बची थी।
राज ने प्रिया की साड़ी की परतों को एक-एक करके खोलना शुरू किया। हर परत के उतरने के साथ प्रिया के भीतर की बेचैनी एक तीव्र उत्तेजना में बदलती जा रही थी। जब ब्लाउज के हुक खुले और उसके गोल वक्ष राज के सामने नग्न हुए, तो उसने बिना देर किए एक को अपने मुँह में भर लिया। प्रिया के मुँह से दर्द और आनंद से भरी एक चीख निकली। उसके निप्पल कठोर हो चुके थे और राज उन्हें चूसता रहा, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ का दूध पी रहा हो।
फिर राज ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसकी जांघों के बीच की गरमाहट उसे बुला रही थी। राज ने अपने कपड़े उतारे और उसके ऊपर आ गया। उनकी देहें एक-दूसरे से चिपक गईं, पसीने से भीगी हुई। राज ने धीरे-धीरे उसे खोला, और फिर एक ही झटके में उसके भीतर प्रवेश कर गया। प्रिया ने एक गहरी साँस ली, दर्द और चरम सुख का मिश्रण उसके पूरे बदन में दौड़ गया।
उनकी देहें एक-दूसरे से तालमेल बिठाने लगीं। राज की हर धक्के के साथ प्रिया का शरीर मचल उठता। उसकी आहें और सिसकियाँ कमरे में गूँजने लगीं। राज उसके हर मीठे आहट पर और तेज़ होता गया, उसकी कमर को थामे हुए, उसे अपने करीब खींचता हुआ। वे दोनों कामदेव के उस नृत्य में पूरी तरह खो चुके थे, जहाँ सिर्फ देह और वासना थी, कोई बंधन नहीं, कोई रोकटोक नहीं। राज ने उसके कानों में फुसफुसाया, “कितनी प्यासी थी तुम, मेरी जान।”
और फिर, एक तीव्र, मीठे दर्द के साथ, दोनों अपनी चरम सीमा पर पहुँच गए। प्रिया ने राज को कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जैसे वह उसे कभी छोड़ना नहीं चाहती थी। उनकी देहें शिथिल पड़ गईं, लेकिन उनकी आत्माओं में एक नई ऊर्जा का संचार हो चुका था। प्रिया ने कभी नहीं सोचा था कि **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** इतनी गहराई से मिट सकती है। वह जानती थी कि यह सिर्फ एक क्षणिक सुख था, लेकिन इस पल में, वह पूरी तरह से तृप्त थी, संतुष्ट थी। उसकी आत्मा, जो बरसों से प्यासी थी, आज जाकर शांत हुई थी।
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