आज ऑफिस में देर शाम तक काम करते हुए, प्रिया और राहुल की आँखों का मिलन किसी इत्तेफाक से कम नहीं था, पर उस मिलन में एक अघोषित आग धधक रही थी। राहुल ने जब देखा कि प्रिया अपनी कुर्सी पर बैठी एक फाइल में गुम है और उसके रेशमी बाल उसके कंधों पर बिखरे हैं, तो उसे अपनी नब्ज में एक अजीब-सी हलचल महसूस हुई। प्रिया ने अचानक सिर उठाया और उसकी नज़रें सीधे राहुल से टकराईं। एक पल को दोनों की साँसें थम गईं। ऑफिस की खाली दीवारें उस बेकाबू चाहत की मूक गवाह थीं, जो बरसों से उनके बीच पल रही थी।
“अकेले क्यों बैठी हो, प्रिया? बाकी सब तो कब के जा चुके हैं,” राहुल ने खुद को संभालते हुए कहा, पर उसकी आवाज़ में एक हल्की-सी थरथराहट थी।
प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की, “बस, यह आखिरी रिपोर्ट खत्म कर रही थी।” उसकी आवाज़ में भी वही छुपा हुआ निमंत्रण था जो राहुल की आँखों में था।
राहुल धीरे-धीरे उसके पास आया, उसकी कुर्सी के पीछे खड़ा हो गया। प्रिया को उसकी साँसों की गर्माहट अपनी गर्दन पर महसूस हुई। उसके रोंगटे खड़े हो गए। राहुल का हाथ अनायास ही उसके कंधे पर जा टिका। “इतनी देर तक काम मत किया करो, थकावट हो जाएगी।” उसके शब्द तो साधारण थे, पर स्पर्श में कुछ और ही गहराई थी।
प्रिया की आँखों में एक चमक उभरी। उसने धीरे से अपना हाथ राहुल के हाथ पर रखा। यह पहला सीधा शारीरिक संपर्क था, जो उनकी सालों की दबी हुई हसरत को हवा दे गया। राहुल की उंगलियाँ उसकी नर्म त्वचा पर फिसलने लगीं। ऑफिस कलीग के साथ बेकाबू प्यार की चिंगारी अब लपटों में बदल रही थी।
“आज रात तुम्हें घर कौन छोड़ेगा?” राहुल ने फुसफुसाते हुए पूछा।
प्रिया ने गहरी साँस ली, “पता नहीं।” उसकी आँखें राहुल की आँखों में डूब गई थीं। “तुम छोड़ दोगे?”
“हाँ, अगर तुम चाहो,” राहुल ने कहा और उसका हाथ प्रिया की कमर पर सरक गया।
बिना कुछ कहे, दोनों ने ऑफिस छोड़ा। उनकी गाड़ियाँ वहीं खड़ी रह गईं, मानो उन्हें आज किसी और मंजिल पर जाना था। राहुल के फ्लैट पर पहुँचते ही, दरवाज़ा बंद होते ही दोनों एक-दूसरे में समा गए। दबे हुए जुनून का बांध आज टूट रहा था। राहुल के होंठ प्रिया के होंठों पर ऐसे टूट पड़े, मानो सदियों की प्यास बुझा रहे हों। प्रिया ने भी उतनी ही शिद्दत से जवाब दिया, उसकी उंगलियाँ राहुल के बालों में उलझ गईं।
कपड़े उतरने लगे, धीरे-धीरे, फिर तेज़ी से। एक-एक वस्त्र के हटते ही, उनका जिस्मानी प्यार और गहरा होता गया। राहुल ने प्रिया को गोद में उठा लिया, प्रिया की टाँगें उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस गईं। बेडरूम की तरफ बढ़ते हुए उनके होंठों का संगम एक पल के लिए भी नहीं टूटा। बिस्तर पर पहुँचते ही राहुल ने प्रिया को हल्के से लिटाया और उसकी आँखें प्रिया के बदन पर ठहर गईं। चंद्रमा की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी और प्रिया के सुडौल बदन पर पड़ रही थी, मानो उसे और भी लुभावना बना रही हो।
राहुल ने अपने होंठ प्रिया की गर्दन पर उतारे, फिर उसके स्तनों पर, उनके निप्पल्स को अपनी जीभ से सहलाते हुए उसने प्रिया को आहें भरने पर मजबूर कर दिया। प्रिया ने अपनी कमर उठाई, राहुल को अपने और करीब खींचते हुए। “राहुल… अब और नहीं रुका जाता।” उसकी आवाज़ में एक गहरी तड़प थी।
राहुल ने उसके पैरों को फैलाया और धीरे-धीरे अपने आप को उसमें उतारा। एक गहरी सिसकी प्रिया के गले से निकली। यह ऑफिस कलीग के साथ बेकाबू प्यार अब अपने चरम पर था। दोनों के जिस्म एक लय में हिलने लगे, त्वचा से त्वचा का घर्षण एक मधुर संगीत पैदा कर रहा था। राहुल प्रिया की आँखों में देख रहा था, उसकी हर आह, हर कराह को महसूस कर रहा था।
प्रिया ने अपनी बाहें राहुल की गर्दन के इर्द-गिर्द कस लीं और उसकी पीठ पर अपने नाखूनों से हल्के निशान बनाए। उनकी साँसें एक हो गईं, उनके दिल एक ताल में धड़क रहे थे। धीरे-धीरे, उनकी गति तेज़ होती गई, उनका जुनून चरम सीमा पर पहुँच रहा था। “और… और तेज़, राहुल…” प्रिया ने फुसफुसाया। राहुल ने उसकी बात मानी और अपनी पूरी शक्ति से उसमें समा गया।
एक तीव्र, मीठी तड़प के साथ, दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे। उनके जिस्मों से एक कंपन गुज़रा और वे एक-दूसरे में ढीले पड़ गए। पसीने से भीगे हुए, वे एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं। उस रात, ऑफिस कलीग के साथ बेकाबू प्यार ने समाज की सारी बंदिशें तोड़ दी थीं और उन्हें एक ऐसे अनुभव से नवाज़ा था, जिसकी तुलना किसी और चीज़ से नहीं की जा सकती थी। उनके जिस्मों की प्यास बुझ चुकी थी, पर उनकी आत्माएँ अब एक-दूसरे से हमेशा के लिए जुड़ चुकी थीं। भविष्य की परवाह किए बिना, उस पल में वे पूर्ण थे।
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