आज रात बॉस की नज़रें काम पर नहीं, मेरे जिस्म पर टिकी थीं। रात के दस बज चुके थे, और ऑफिस की विशाल इमारत में सिर्फ़ मैं और अर्जुन सर बचे थे। हर खिड़की से शहर की जगमगाती रोशनी झाँक रही थी, पर हमारे अंदर एक अलग ही आग सुलग रही थी। रीना, मेरा नाम था, और पिछले कुछ हफ़्तों से अर्जुन सर की मीठी मुस्कान और कभी-कभी पीठ पर पड़ने वाली बेतरतीब उंगलियों के स्पर्श ने मेरे दिल में एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी। मुझे पता था कि यह गलत था, यह एक **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** बनने वाली थी, पर इस नशे को रोकना मेरे बस में नहीं था।
“रीना, तुम्हारा काम हो गया?” अर्जुन सर की भारी आवाज़ मेरे कानों में गूंजी, जिसने मेरी धड़कनों को और तेज़ कर दिया। मैंने पलटा और देखा, वो मेरी डेस्क के बिल्कुल करीब खड़े थे, उनके परफ्यूम की मादक गंध मेरे रोम-रोम में समा रही थी। उनके कोट की बटन खुली थी, और शर्ट के ऊपर से उनके मज़बूत सीने की हल्की झलक दिख रही थी। मेरी नज़रें उनके होठों पर टिकी थीं, जो अब एक हल्की मुस्कान दे रहे थे।
“जी सर, बस थोड़ा सा बाकी है,” मैंने कांपती हुई आवाज़ में कहा।
“मुझे दिखाओ,” कहते हुए वो मेरे और करीब आ गए। मेरी कुर्सी से उनकी पैंट छू रही थी। मेरे माथे पर पसीने की बूंदें थीं, पर ठंडी एयर कंडीशनिंग की वजह से वो जमने लगी थीं। उन्होंने मेरा माउस पकड़ा, और उनके हाथ का स्पर्श मेरी उंगलियों पर पड़ा। एक हल्की सी सिहरन मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई।
“तुम बहुत अच्छा काम करती हो, रीना,” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, और इस बार उनकी गर्म सांसें मेरे गालों को छू गईं। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू हो चुकी थीं। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, उनके होंठ मेरे गालों पर थे, फिर कान पर, और फिर उन्होंने धीरे से मेरे कान की लौ को अपने दांतों में भर लिया। एक आह मेरे मुंह से निकल गई।
“अर्जुन सर…” मैंने बड़ी मुश्किल से कहा, पर मेरी आवाज़ में विरोध कम और निमंत्रण ज़्यादा था।
उन्होंने मुझे घुमाया, मेरी कुर्सी पीछे धकेल दी, और अपने मज़बूत हाथों से मेरी कमर को अपनी ओर खींच लिया। मेरा पूरा जिस्म उनके जिस्म से सट गया। मेरे सीने पर उनकी शर्ट का स्पर्श महसूस हुआ, और उनकी उंगलियाँ मेरी साड़ी के पल्लू के अंदर से मेरी नंगी कमर को सहलाने लगीं। उनकी हवस भरी आँखों में मैंने अपनी प्यास देखी।
बिना एक शब्द कहे, उन्होंने मेरे होंठों पर हमला कर दिया। यह कोई साधारण चुंबन नहीं था, बल्कि एक भूखा, प्यासा चुंबन था, जिसमें सालों की दबी हुई चाहत का सैलाब उमड़ पड़ा था। मेरे होंठ दर्द से भर उठे, पर उस दर्द में भी एक अनोखा सुख था। उनकी जीभ मेरे मुंह में घुसकर हर कोने को तलाश रही थी, और मैं भी पूरी तरह से समर्पण कर चुकी थी। मेरी उंगलियाँ उनकी गर्दन को कसकर पकड़ रही थीं, जैसे डूबता हुआ कोई तिनका।
उन्होंने मुझे धीरे से अपनी कैबिन की ओर धकेला, जो अंदर से बंद थी। अंधेरा था, सिर्फ़ खिड़की से शहर की दूर की रोशनी आ रही थी। उन्होंने मुझे अपनी डेस्क पर बिठा दिया, और मेरे पैर उनके दोनों तरफ थे। मेरी साड़ी और पेटिकोट काँच तक ऊपर आ चुके थे, और उनके हाथ मेरी जांघों को बेताबी से सहला रहे थे। मेरी पैंटी तक पहुँचकर, उन्होंने उसे एक झटके में खींचकर उतार दिया। मुझे शर्म नहीं आई, बस एक तेज़ उत्तेजना ने मुझे जकड़ लिया।
“कितना इंतज़ार किया है मैंने इस पल का, रीना,” वो हांफते हुए बोले, उनकी आवाज़ में वासना स्पष्ट थी।
मैंने अपने होंठों को फिर से उनके होठों पर रखा, और उनकी शर्ट के बटन खोल दिए। उनकी नग्न छाती को छूते ही मुझे एक अजीब सी गर्मी महसूस हुई। मेरे ब्लाउज और ब्रा को भी उन्होंने कुछ ही पलों में उतार फेंका, और मेरे उभारों को अपनी हथेली में भरकर मसलने लगे। एक तेज़ दर्द और उससे भी ज़्यादा तेज़ सुख मेरे शरीर में दौड़ गया।
धीरे-धीरे, उन्होंने अपने पैंट की ज़िपर खोली। मैं उनकी मर्दानगी को महसूस कर रही थी, जो मेरी खुली जांघों के बीच रगड़ रही थी। मेरे मुंह से हल्की सी चीत्कार निकली, जब उन्होंने अपने आप को मेरी देह के अंदर धकेला। यह एक गहरा, पूरा प्रवेश था, जिसने मेरी आत्मा तक को झकझोर दिया। हमने अपनी गति को तेज़ किया, शरीर एक दूसरे से टकरा रहे थे, उनकी डेस्क पर रखी फाइलें ज़मीन पर गिर रही थीं। हमारे जिस्मों की आवाज़, हमारी सांसों की गरमाहट, और उस कैबिन की बंद दरवाज़ों के पीछे एक अनोखी **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** लिखी जा रही थी।
कई मिनटों तक, हम उसी आग में जलते रहे, एक दूसरे को तृप्त करते रहे। आखिर में, हम दोनों का शरीर एक साथ सिहर उठा, और हमारी आहें कैबिन की दीवारों से टकराकर वापस हम तक लौटीं। मैं निढाल होकर उनकी बाहों में सिमट गई।
“यह हमारा राज है, रीना,” उन्होंने मेरे बालों को सहलाते हुए कहा।
“हमारा राज, अर्जुन,” मैंने फुसफुसाते हुए कहा, यह जानते हुए कि इस रात के बाद, हमारी **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** अभी और गहरी होने वाली थी। यह एक अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत थी, जिसका हर पल, हर स्पर्श, हमेशा के लिए मेरा हो चुका था।
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