अंधेरी रात की चुप्पी में, बस उसकी पायल की हल्की छनछन मेरी रूह में आग लगा रही थी। दीवार की ओट से, मैंने प्रिया को अपने आँगन में कदम रखते देखा। उसकी साड़ी की पतली किनारी चाँदनी में चमक रही थी, और उसके घुँघराले बाल उसके गोरे गालों पर इतरा रहे थे। मैं, रवि, वहीं आम के पेड़ के नीचे छिपा, अपनी धड़कनों को काबू में करने की नाकाम कोशिश कर रहा था। रोज़ रात का यही इंतज़ार, यही बेकरारी।
वह दबे पाँव मेरे पास आई, उसकी साँसें तेज़ थीं, और उसकी आँखें डर और दीवानगी के मिले-जुले भावों से भरी थीं। “रवि…” उसने फुसफुसाया, जैसे हवा भी न सुन ले। मैंने अपना हाथ बढ़ाया, और उसके मुलायम हाथ ने तुरंत उसे जकड़ लिया। उसका स्पर्श मेरी नसों में बिजली दौड़ा गया। हम दोनों जानते थे कि यह एक छुप छुप कर प्यार करने की कहानी थी, जिसे समाज की नज़रों से बचाने के लिए हमें हर रात ऐसी चोरी करनी पड़ती थी।
मैं उसे खींचकर अपने आँगन के सबसे सुनसान कोने में बनी पुरानी कोठरी की ओर ले गया। यहाँ धूल थी, जाले थे, पर सबसे ज़रूरी, यहाँ अकेलापन और सुरक्षा थी। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, बाहर की दुनिया, उसके नियम, उसके डर सब वहीं छूट गए। कोठरी के भीतर घुप्प अँधेरे में भी, हम एक-दूसरे को महसूस कर सकते थे। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में थामा, और हमारे होंठ एक-दूसरे पर टूट पड़े। यह कोई कोमल चुम्बन नहीं था, बल्कि दो भूखे जिस्मों की प्यास बुझाने वाला, गहरा, उन्मत्त चुम्बन था। उसकी साँसें मेरी साँसों में घुल गईं, और मेरी ज़बान उसके मुँह के हर कोने को तलाशने लगी।
उसकी साड़ी धीरे-धीरे मेरे हाथों में खुलती गई, और ज़मीन पर एक मुलायम ढेर बन गई। उसके गोरे, उभरे हुए स्तन मेरे हाथों में आते ही कड़क हो गए। मैंने धीरे-धीरे उसके आँचल को हटाया, और उसकी गरम त्वचा को छूते हुए उसके गुलाबी निप्पलों को अपने मुँह में ले लिया। प्रिया के मुँह से एक मदहोश सिसकी निकली, और उसने अपने हाथों से मेरे बालों को जकड़ लिया। वह मेरी पीठ पर अपने नाखूनों से खरोंच रही थी, जैसे अपनी सारी बेचैनी मुझपर उतार देना चाहती हो। मेरी उँगलियाँ उसकी नाभि से होती हुई, नीचे उसके पेट पर थिरक रही थीं, जहाँ उसकी मुलायम त्वचा पर हल्का पसीना चमक रहा था।
मैंने उसे दीवार से सटाया, और उसके पैरों के बीच अपनी जगह बनाई। प्रिया ने अपनी टांगें मेरे इर्द-गिर्द कस लीं, और उसकी गरम, नम चूत मेरी मर्दानगी को पुकार रही थी। “रवि… और नहीं रुक सकती,” उसकी आवाज़ काँप रही थी, उसकी आँखें वासना में बंद थीं। मैंने अपने लंड को उसकी गीली चूत पर रगड़ा, और फिर एक ही धक्के में उसे भीतर उतार दिया। प्रिया के मुँह से एक चीख दबी, जो तुरंत एक गहरी साँस में बदल गई।
हमारी साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं, और कोठरी की हवा कामुक गंध से भर गई थी। मैं उसे ज़ोर-ज़ोर से धक्के दे रहा था, उसकी चूत की गहराई में उतरते हुए, और वह हर धक्के पर आहें भर रही थी। “आह… रवि… और… तेज़…” वह फुसफुसाई। उसकी कामोत्तेजना चरम पर थी, और मेरे धक्कों की लय के साथ उसका जिस्म ऊपर-नीचे उछल रहा था। हम दोनों पसीने से तर थे, और हमारी यह छुप छुप कर प्यार करने की कहानी अब अपने सबसे तीव्र पल में थी। मैंने उसे अपनी बाहों में कसकर उठाया, और उसे दीवार से टिकाए हुए ही, अपने लंड को उसकी चूत में और गहराई तक धँसाता गया।
एक लंबी, गहरी सिसकी के साथ प्रिया का जिस्म ढीला पड़ गया, और उसने अपनी सारी ताकत से मुझे कस लिया। मेरे भीतर भी एक गरम लहर उठी, और मैंने अपना सारा प्यार, सारी हवस उसके भीतर उड़ेल दी। हम दोनों एक-दूसरे पर बेजान से गिर गए, हमारी साँसें तेज़ी से चल रही थीं। अंधेरे में भी, मैं उसकी चमकती आँखों में अपनी ही तृप्ति देख सकता था। हम जानते थे कि यह छुप छुप कर प्यार करने की कहानी यूँ ही चलती रहेगी, हर रात, हर मौका तलाशते हुए, क्योंकि यह वासना सिर्फ जिस्मानी नहीं, रूहानी भी थी। कुछ देर वहीं एक-दूसरे से लिपटकर हम बस अपनी साँसों की आवाज़ सुन रहे थे, जब तक कि सुबह की हल्की रोशनी की आहट ने हमें अलग होने का इशारा नहीं दिया। एक आखिरी गहरा चुम्बन, और फिर वह फिर से अपनी दुनिया में वापस चली गई, पीछे छोड़ गई अपनी महक और अगली रात के इंतज़ार की कसक।
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