पड़ोसी के हाथों बुझी तनहा औरत की जलती प्यास

साँझ ढल चुकी थी, लेकिन रानो के बदन की आग नहीं बुझ रही थी। उमस भरी हवा खिड़की से अंदर आ तो रही थी, पर उसके अकेलेपन की तपिश को और बढ़ा रही थी। विधवा हुए उसे दो साल बीत चुके थे, और उसकी जवानी की देह हर रात एक अनकही तड़प से जलती थी। उसकी नम आँखों में एक गहरी, अनबुझी प्यास साफ़ झलकती थी।

तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई। रानो ने चौंक कर देखा। सामने सुरेश खड़ा था, पड़ोस का युवा और बलिष्ठ आदमी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और उसकी शर्ट की दो बटनें खुली थीं, जिससे उसकी मज़बूत छाती थोड़ी दिख रही थी। “भाभी, वो… आपके नल से पानी नहीं आ रहा था, सोचा पूछ लूँ कहीं मोटर खराब तो नहीं हुई?” उसने थोड़ी झिझक के साथ कहा।

रानो का दिल धक-धक करने लगा। उसकी प्यासी नज़रें सुरेश के मर्दाना जिस्म पर ठहर गईं। “अंदर आओ सुरेश। हाँ, पता नहीं क्या हुआ है।” उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी कंपकंपी थी। सुरेश अंदर आया। जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा, एक अजीब-सा तनाव हवा में घुल गया। रानो की आँखों में वासना की ज्वाला और तेज़ हो गई। उसे लगा कि आज शायद उसकी **तनहा औरत की प्यास बुझाने वाली कहानी** शुरू हो सकती है।

सुरेश झुका, मोटर देखने लगा। रानो उसके पीछे खड़ी, उसकी कमर, उसकी चौड़ी पीठ और तनी हुई मांसपेशियों को निहार रही थी। उसकी साँसें तेज़ होने लगीं। सुरेश जब उठने लगा, तो उसका हाथ अनजाने में रानो की जांघ से छू गया। एक बिजली-सी दौड़ गई दोनों के बदन में। सुरेश ने आँखें ऊपर उठाईं, और उनकी नज़रें मिलीं। रानो की आँखों में बेताबी और निमंत्रण था, और सुरेश की आँखों में एक गहरी ललक।

“भाभी…” उसकी आवाज़ भारी थी।

“सुरेश…” रानो ने फुसफुसाते हुए कहा, और उसका हाथ अनायास ही सुरेश की बांह पर चला गया। उसकी उँगलियों ने उसकी गर्म त्वचा को सहलाया।

सुरेश ने रानो की कमर पर अपना हाथ रखा, उसे धीरे से अपनी ओर खींचा। रानो ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि और करीब आ गई। उनके बदन की गरमाहट एक-दूसरे में समाने लगी। सुरेश ने अपना चेहरा झुकाया और उसके होंठों को अपने होंठों से दबा लिया। यह कोई साधारण चुंबन नहीं था, यह वर्षों की प्यास को मिटाने वाला, गहरा, उमड़ता हुआ चुंबन था। रानो ने आँखें मूंद लीं और खुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। उसकी देह कामुकता में पिघल रही थी।

उसके हाथों ने सुरेश की शर्ट के बटन खोले और शर्ट को उसके बदन से अलग कर दिया। सुरेश ने भी झटके से रानो की साड़ी को एक तरफ कर दिया, फिर ब्लाउज और पेटीकोट को। रानो का सुडौल बदन, चांदनी रात में और भी कामुक लग रहा था। सुरेश ने उसे बाहों में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया।

उसके होंठ रानो के गले से होते हुए उसके वक्ष तक उतर आए। रानो की साँसें उखड़ रही थीं, उसकी आहें कमरे में गूंज रही थीं। “आह… सुरेश… और… और तेज़…” उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा। सुरेश ने उसकी हर इच्छा को समझा। उसके हाथ उसके बदन पर ऐसे चल रहे थे, मानो वह वर्षों से इस क्षण का इंतज़ार कर रहा हो। उसकी उँगलियाँ रानो की जंघाओं के बीच पहुंची, जहाँ वासना का रस बह रहा था। रानो ने अपनी कमर उचका दी, उसकी हर नस में एक रोमांच दौड़ रहा था।

सुरेश ने धीरे-धीरे अपना बदन रानो के ऊपर झुकाया। उसके मर्दाना उभार ने रानो की कामुकता को और भड़का दिया। रानो ने अपनी जांघें फैलाईं और उसे अपने भीतर समाने के लिए आमंत्रित किया। एक गहरी साँस के साथ, सुरेश ने रानो के भीतर प्रवेश किया। रानो की चीख सिसकी में बदल गई। वर्षों बाद उसे लगा कि उसकी देह को वो स्पर्श मिला है जिसकी उसे तलाश थी। हर धक्का, हर रगड़, उसकी अधूरी प्यास को बुझा रहा था। वे एक-दूसरे में ऐसे खो गए थे, जैसे दो प्यासे जिस्म एक दूसरे में घुल गए हों।

रात गहरा रही थी, और कमरे में सिर्फ उनके प्यार की आवाज़ें गूंज रही थीं। रानो ने अपनी कमर उठाई, अपनी सारी वासना को उस पल में उड़ेल दिया। सुरेश भी उसी आवेश में था। अंततः, एक तीव्र, मीठी तड़प के साथ, दोनों ने एक-दूसरे में अपनी चरम सीमा को पाया। रानो ने सुरेश को कसकर अपनी बाहों में भींच लिया, उसकी आँखों में अब सुकून था। उसकी वर्षों की **तनहा औरत की प्यास बुझाने वाली कहानी** आज पूरी हुई थी। वह आज तृप्त थी, संतुष्ट थी, और पूरी तरह से शांत थी।

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