उसकी साड़ी का पल्लू जब भी कंधे से फिसलता, मेरी साँसों की लय बिगड़ जाती थी। आज तो बस यही हो रहा था, जैसे किस्मत चाहती हो कि मैं खुद पर से अपना नियंत्रण खो दूँ।
अमित, मेरा सबसे अच्छा दोस्त, एक ज़रूरी फ़ोन कॉल पर बालकनी में व्यस्त था। घर में मैं और प्रिया, उसकी खूबसूरत पत्नी, अकेले थे। गर्मी का दिन था और प्रिया ने हल्के गुलाबी रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जो उसके सुडौल बदन से चिपक कर उसकी हर एक अदा को और भी कामुक बना रही थी। उसके ब्लाउज का गहरा गला उसकी भरी हुई छाती को बमुश्किल संभाले हुए था, और हर पल ऐसा लगता था जैसे अब वो मोती जैसे दाने बाहर आ जाएंगे।
“राहुल, तुम्हें ठंडा शिकंजी दूँ?” उसकी मीठी आवाज़ ने मुझे वर्तमान में खींचा।
“हाँ, ज़रूर प्रिया,” मैंने अपने लड़खड़ाते शब्दों पर काबू पाते हुए कहा।
वह किचन में गई, और मैं सोफे पर बैठा उसकी पीठ को निहारता रहा। साड़ी में लिपटी उसकी कमर, हिप्स पर जाकर जिस तरह से मुड़ती थी, वह मुझे हर बार मदहोश कर देती थी। आज तो वह कुछ ज़्यादा ही लुभावनी लग रही थी, शायद अमित की गैर-मौजूदगी ने मुझमें भी एक अजीब सी हिम्मत भर दी थी।
वह शिकंजी लेकर लौटी। ग्लास देते हुए उसका हाथ मेरे हाथ से छू गया। एक हल्की सी सिहरन मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। उसने मुस्कुरा कर देखा, और उसकी आँखें कुछ ऐसा कह रही थीं, जिसे मैं समझ रहा था, लेकिन स्वीकारने से डर रहा था। “अमित आजकल बहुत व्यस्त रहता है, मेरा भी मन नहीं लगता,” उसने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी उदासी थी, या शायद एक निमंत्रण।
मुझे याद आया, अमित ने कितनी बार मुझे छेड़ा था कि प्रिया कितनी खूबसूरत है। और आज, उसी दोस्त की बीवी मेरे सामने इस तरह बैठी थी, जैसे कोई अनकहा तूफान आने वाला हो। मेरी छाती के अंदर कुछ अजीब सा होने लगा, एक तेज़ धड़कन, एक अनैतिक इच्छा जो ज़ोर मार रही थी।
“अमित के होते हुए भी तुम्हारा मन नहीं लगता?” मैंने उसे छेड़ने की कोशिश की।
उसने एक गहरी साँस ली, “बस हो गया! उसे तो अपने काम से ही फुर्सत नहीं मिलती। मैं भी कब तक अकेली रहूँ?”
उसकी बातों में एक गहरी प्यास थी, जिसे मैं महसूस कर सकता था। वह उठकर पास वाली कुर्सी पर आकर बैठ गई। हमारी टाँगें अब एक दूसरे से लगभग छू रही थीं। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो मेरी आँखों में भी थी। इस पल, हम दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बन रहा था, दोस्त की बीवी से अनैतिक संबंध की शुरुआत का एक मौन समझौता।
मेरी हिम्मत और बढ़ गई। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी जांघ पर रखा। वह चौंकी, लेकिन उसने मेरा हाथ हटाया नहीं। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। मैंने धीरे-धीरे ऊपर की ओर हाथ बढ़ाना शुरू किया। उसकी साड़ी की चिकनी सतह के नीचे, उसकी गर्म मुलायम त्वचा मुझे महसूस होने लगी।
“राहुल, यह… यह सही नहीं है,” उसने फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई प्रतिरोध नहीं था, बल्कि एक ललक थी।
“क्या सही नहीं है, प्रिया? तुम्हारा यह अकेलापन? या मेरी यह दीवानगी?” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।
उसने अपनी नज़रें झुका लीं, लेकिन उसका हाथ मेरे हाथ पर आ गया, जैसे मुझे रोकने की बजाय, उसे और कस रहा हो।
मैंने उसे अपनी ओर खींचा। वह मेरे ऊपर आ गिरी। हमारी साँसें एक-दूसरे में घुल गईं। मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। एक तूफानी चुंबन था वो, जिसमें सालों की दबी हुई वासना फूट पड़ी थी। उसने भी मेरा पूरा साथ दिया, उसकी ज़बान मेरी ज़बान से लड़ रही थी, जैसे वर्षों से भूखी हो।
हम दोनों अब बेकाबू हो चुके थे। मैंने उसे गोद में उठाया और सीधे बेडरूम की तरफ ले गया। कमरे में पहुँचते ही मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसकी साड़ी कब उसके शरीर से अलग हो गई, पता ही नहीं चला। अब वह मेरे सामने सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट में थी। उसकी आँखों में वासना और शर्म का अजीब मिश्रण था।
मैंने उसके ब्लाउज के हुक खोले, और उसके भरे हुए स्तन मेरे सामने आ गए। मैंने बिना देर किए उन्हें अपने मुँह में भर लिया, और वो एक मीठी सी चीख के साथ मेरे बालों को कसकर पकड़ने लगी। उसके गुलाबी निप्पल मेरे मुँह में उत्तेजित होकर कड़े हो गए थे। मैं उन्हें चूसता रहा, और वह मचलती रही।
उसका पेटीकोट भी अब बाधा नहीं बन रहा था। मैंने उसे नीचे सरका दिया, और अब वह पूरी तरह से नग्न मेरे सामने थी। उसकी कामुकता से भरी जवानी मेरे सामने पूरी तरह से उजागर थी। उसकी योनि, हल्की झाड़ियों से घिरी हुई, मेरी आँखों को अपनी ओर खींच रही थी। मैंने उसके पैरों के बीच जगह बनाई और अपनी उंगलियों से उसे सहलाना शुरू कर दिया। वह आहें भरने लगी।
“राहुल… आह… और नहीं… अमित आ जाएगा…” उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ टूट रही थी।
“आने दो अमित को… तब तक हम अपने इस अनैतिक संबंध का आनंद ले लेते हैं,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा और अपने कपड़े उतारने लगा।
अब हम दोनों पूरी तरह नग्न थे, एक-दूसरे की गर्मी में डूबे हुए। मैंने अपने पुरुषत्व को उसकी योनि के द्वार पर रखा, और एक झटके में उसे अंदर उतार दिया।
“आहहहहहह!” उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
मैंने धीमी-धीमी गति से धक्के देने शुरू किए, और वह हर धक्के के साथ मेरे नीचे छटपटाने लगी। उसकी कामुक आहें मेरे कानों में अमृत घोल रही थीं। यह दोस्त की बीवी से अनैतिक संबंध का वर्जित सुख था, जो मुझे पागल कर रहा था।
धीरे-धीरे हमारी गति बढ़ती गई, और पूरा कमरा हमारी आहों, साँसों और बिस्तर की आवाज़ से भर गया। वह अपनी कमर उठाकर मेरा साथ दे रही थी, उसकी आँखें बंद थीं, और उसके चेहरे पर चरम सुख की एक अजीब सी चमक थी।
कुछ ही देर में हम दोनों एक साथ चरम पर पहुँच गए। मेरा सारा वीर्य उसकी गर्म योनि में समा गया, और वह अपनी बाँहों में मुझे कसकर पकड़कर पूरी तरह शांत हो गई। हम एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे, हमारी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं।
बाहर से अमित की आवाज़ सुनाई दी। वह वापस आ गया था। हम दोनों एक-दूसरे से अलग हुए, आँखों में एक गहरी संतुष्टि और एक गहरा राज़ लिए हुए। हमने जल्दी-जल्दी कपड़े पहने, और जब अमित कमरे में आया, तो हम दोनों सामान्य दिखने की पूरी कोशिश कर रहे थे। लेकिन प्रिया ने मुझे एक ऐसी मुस्कान दी, जिसमें एक वादा था, उस रात के बेडरूम के वर्जित नशे का, और दोस्त की बीवी से अनैतिक संबंध के उस गहरे राज़ का, जो अब हमेशा के लिए हम दोनों के बीच रहेगा।
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