बस की भीड़ में धधक उठी वासना: मेरी पहली रात का प्यार

गर्मी से तपते दिल्ली के उस बस अड्डे पर भीड़ का आलम ऐसा था कि साँस लेना भी मुश्किल। जैसे-तैसे प्रिया ने खुद को एक ठसाठस भरी बस में धकेला, बस किसी तरह अपनी सीट तक पहुँचने की आस में। तभी बस एक झटके के साथ आगे बढ़ी और प्रिया असंतुलित होकर लड़खड़ाई। एक मज़बूत हाथ ने उसे गिरने से बचाया, और एक पल को उसका शरीर उस अनजान मर्द के शरीर से चिपक गया। यह रोहन था, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, और जिसकी उँगलियाँ प्रिया की कमर पर ऐसी जगह रुक गई थीं, जहाँ की गरमाहट सीधे उसके भीतर उतर गई।

बस की भीड़, पसीने की मिली-जुली गंध और उस अनजान स्पर्श ने प्रिया के तन-मन में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी। “माफ़ करना,” रोहन ने धीमे से कहा, पर उसकी आँखों ने कुछ और ही कहा। प्रिया के होंठों से बस एक धीमी आह निकली। अगले कुछ स्टॉप तक, बस के हर मोड़ और हर ब्रेक पर, उनका शरीर एक-दूसरे से टकराता रहा। रोहन का हाथ कभी अनजाने में प्रिया की जाँघ से छू जाता, कभी उसका सीना प्रिया की पीठ से रगड़ खाता। हर स्पर्श जानबूझकर न होते हुए भी जानबूझकर महसूस हो रहा था। प्रिया की साँसें तेज़ हो रही थीं, और उसने महसूस किया कि उसका जिस्म उस अनजान आदमी की निकटता के लिए मचल रहा था। यह सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं था, यह **बस में हुई पहली मुलाकात का प्यार** था, जो अब वासना की आग में बदल रहा था।

जब प्रिया का स्टॉप आया, तो रोहन ने उसे उतरने में मदद की। उसकी उंगलियाँ एक बार फिर उसकी कमर पर ठहरीं, इस बार थोड़ी देर ज़्यादा। “क्या तुम यहीं रहती हो?” रोहन ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक उम्मीद थी। प्रिया ने हाँ में सिर हिलाया। “मुझे लगता है, मुझे भी यहीं उतरना था,” उसने शरारत से कहा। प्रिया के दिल की धड़कन बढ़ गई। वे दोनों बस स्टैंड से कुछ दूर एक सुनसान गली में आ चुके थे। रोहन ने प्रिया का हाथ पकड़ा और उसे अपने नज़दीक खींच लिया। “मुझे नहीं लगता कि मैं तुम्हें ऐसे ही जाने दे सकता हूँ,” उसने फुसफुसाते हुए कहा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह कोई कोमल चुंबन नहीं था, बल्कि एक भूखी, बेचैन आत्मा का चुंबन था, जो बस की भीड़ में पनपी आग को बुझाना चाहता था।

उनके होंठों का संगम गहराता गया। रोहन ने प्रिया को दीवार से सटा दिया, उसके हाथ उसकी कमर से होते हुए उसकी वक्षस्थल की ओर बढ़ने लगे। प्रिया की साड़ी का पल्लू कब गिरा, उसे पता ही नहीं चला। रोहन की उँगलियाँ उसके ब्लाउज के नीचे घुस गईं, उसके स्तनों को सहलाने लगीं। प्रिया के मुँह से सिसकियाँ निकल रही थीं, वह रोहन की शर्ट को खींच रही थी। “चलो, यहाँ नहीं,” प्रिया ने हाँफते हुए कहा। रोहन ने बिना एक पल गँवाए उसे अपने साथ अपने पास के कमरे में खींच लिया।

कमरे में घुसते ही उन्होंने एक-दूसरे को फिर से अपनी बाहों में भर लिया। कपड़े एक-एक करके ज़मीन पर गिर रहे थे। प्रिया ने रोहन के मज़बूत शरीर को छुआ, उसकी हथेलियाँ उसकी छाती पर मचल रही थीं। रोहन ने प्रिया को बिस्तर पर धकेला, और उसकी नंगी जंघाओं के बीच आ गया। उसकी उंगलियाँ प्रिया की योनि पर थिरकने लगीं, उसकी उत्कट इच्छा को और भड़काती हुई। प्रिया ने अपनी कमर ऊपर उठाई, उस स्पर्श को और गहरा करने के लिए। “और नहीं, रोहन… मुझे पूरा महसूस करना है तुम्हें,” प्रिया ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।

रोहन ने बिना देर किए, अपनी पैंट उतारी और उसके लिंग को प्रिया की प्यासी योनि के मुहाने पर टिका दिया। एक गहरी साँस लेकर, उसने खुद को प्रिया के भीतर धँसा दिया। एक चीख प्रिया के होंठों से निकली, पर वह दर्द की नहीं, संतुष्टि की थी। वे दोनों एक-दूसरे में खो चुके थे, हर धक्का, हर रगड़ उनकी पहली मुलाकात की आग को और तेज़ कर रही थी। उनकी साँसें एक हो गईं, उनके शरीर एक लय में गति कर रहे थे। बिस्तर की चादरें उनकी वासना की गवाह बन रही थीं। प्रिया ने रोहन को और कसकर अपनी बाहों में भर लिया, अपनी टाँगों से उसे जकड़ लिया। वह खुद को पूरी तरह से उसके हवाले कर चुकी थी। **बस में हुई पहली मुलाकात का प्यार** अब चरम पर पहुँच चुका था।

दोनों कई बार एक-दूसरे में खोए और फिर से उभरे, जब तक कि उनके शरीर पूरी तरह से शिथिल नहीं पड़ गए। पसीने से भीगे, हाँफते हुए वे एक-दूसरे से लिपटे हुए थे। प्रिया ने रोहन के सीने पर सिर रखकर कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक बस की भीड़ में, मुझे मेरा सब कुछ मिल जाएगा।” रोहन ने उसके माथे को चूमा। “यह तो बस शुरुआत है, मेरी जान। यह तो **बस में हुई पहली मुलाकात का प्यार** है, जो अब हमारे हर पल में बस गया है।” और उस रात, उनके दिलों में एक नई, गहरी और कामुक कहानी की शुरुआत हो चुकी थी।

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