बस की पिछली सीट: वासना की चिंगारी, पहली मुलाकात का तूफ़ान

उस दिन बस की हर करवट मेरे जिस्म को एक नई आग से सुलगा रही थी, पर असली आग तो अभी मिलनी बाकी थी। सीमा, अपनी नीली साड़ी में लिपटी, पिछली सीट पर खिड़की से बाहर देख रही थी, जब एक झटके से बस रुकी और एक लंबा, गठा हुआ नौजवान उसकी बगल की खाली सीट पर आ बैठा। रवि, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो सीमा ने तुरंत भाँप ली। बस फिर चली और हर मोड़ पर, हर गड्ढे पर, उनके शरीर एक-दूसरे से टकराने लगे। पहले तो यह अनजाने में था, पर जल्द ही यह एक मधुर, जानलेवा स्पर्श बन गया।

“बहुत भीड़ है,” रवि ने धीमे से कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरी गुंजन थी। सीमा ने बस एक मुस्कान दी, उसकी साँसें तेज हो रही थीं। बस की पिछली सीट, जहाँ अक्सर कम लोग होते थे, आज उनके लिए एक निजी स्वर्ग बन रही थी। रवि का कंधा उसके कंधे से सटा था, उसकी जांघ सीमा की नरम जांघ को छू रही थी। हर झटका एक रोमांच पैदा कर रहा था। रवि का हाथ धीरे से अपनी सीट की आर्मरेस्ट पर फैला और ‘अनजाने में’ सीमा की कमर से जा लगा। एक सिहरन सीमा के पूरे जिस्म में दौड़ गई। उसने आँखें बंद कर लीं, अपने अंदर उठती लहरों को महसूस करते हुए। यह थी बस में हुई पहली मुलाकात का प्यार, एक ऐसा प्यार जो सीधे जिस्म से होकर दिल तक पहुँच रहा था।

रवि ने हिम्मत जुटाई। उसकी उंगलियाँ धीरे से सीमा की कमर पर सरकती हुई, साड़ी के पल्लू के नीचे से, उसकी नरम त्वचा पर पहुँच गईं। सीमा की साँसें तेज हो गईं, उसने अपना सिर थोड़ा पीछे मोड़ा, उसकी आँखें रवि की आँखों से मिलीं। उन आँखों में अनकही वासना और एक बेताबी थी। रवि ने एक पल भी न गंवाते हुए अपना हाथ सीमा के ब्लाउज के नीचे खिसका दिया। उसकी गरम उंगलियाँ सीमा की कमर से होते हुए, उसके पसलियों के पास पहुँच गईं। सीमा की साँसें अटक गईं, उसके होंठ खुल गए, पर कोई आवाज़ नहीं निकली। बस का शोर उनके गुप्त, अंतरंग खेल को छुपा रहा था। रवि की उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ीं, उसकी उंगलियों ने सीमा के स्तनों का निचला हिस्सा महसूस किया, और सीमा की आँखों से एक मादक नशा छलक पड़ा। उसकी देह कामुक इच्छा से तड़प उठी थी।

बस आखिरकार अपने गंतव्य पर पहुंची। रवि ने धीरे से सीमा के कान में फुसफुसाया, “इतनी जल्दी मत जाओ… यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है।” सीमा ने बिना कुछ कहे, बस एक सर हिलाया। उनकी देह की प्यास इतनी तीव्र थी कि अब एक पल भी इंतज़ार करना मुमकिन न था। पास के एक छोटे से धर्मशाला में उन्होंने एक कमरा लिया। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, उनकी आँखों में उठी आग ने उन्हें एक-दूसरे की बाहों में धकेल दिया। रवि ने सीमा को अपनी बाहों में उठाया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया। बिना एक पल गंवाए, उसके होंठ सीमा के होंठों से मिल गए, एक गहरी, बेताब चूमने की क्रिया में।

कपड़े एक-एक करके ज़मीन पर गिरने लगे। सीमा के नीले ब्लाउज और पेटीकोट को रवि ने एक झटके में उतारा, उसके स्तन रवि की आँखों के सामने खुल गए। रवि ने अपनी जुबान से उसके एक-एक इंच को सहलाया, सीमा की चीखें उसके गले में ही घुट कर रह गईं। रवि की उंगलियाँ उसके अंगों को तलाश रही थीं, और जल्द ही, उसकी वासना भरी ऊँगली सीमा के भीगे अंतरंग पर जा टिकी। सीमा की आँखें बंद थीं, उसका पूरा शरीर एक अजीब से नशे में डूब गया था। रवि ने अब और इंतज़ार न करते हुए, अपने कामुक अंग को सीमा की प्यासी देह में उतारा। एक गहरी आह, एक मीठी पीड़ा, और फिर सिर्फ सुख की लहरें। उनके जिस्म एक लय में हिलने लगे, कमरे में उनके मिलन की आवाज़ें गूँज उठीं। हर धक्के के साथ, उनकी देह की प्यास और भी बढ़ती जा रही थी, जब तक कि वे दोनों एक साथ, सुख के चरम पर न पहुँच गए।

थक कर, हाँफते हुए, वे एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी साँसें एक-दूसरे में घुल रही थीं। यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, यह उस बस में हुई पहली मुलाकात का प्यार था, जो उनके दिल और रूह में गहराई तक उतर गया था। उस दिन बस की पिछली सीट ने उनके लिए एक नई दुनिया के दरवाज़े खोल दिए थे, जहाँ वासना और प्यार एक हो गए थे।

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