दोपहर की तपती धूप खिड़कियों से रिसकर कमरे में पसरी हुई थी, पर प्रिया के भीतर की आग कहीं ज़्यादा धधक रही थी। दरवाज़े पर हलकी सी दस्तक हुई, और उसकी धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गईं। उसने साड़ी का आँचल ठीक किया और दरवाज़ा खोला। सामने समीर खड़ा था, उसकी आँखों में वही पुरानी, जानी-पहचानी प्यास थी जो उसके दिल में भी तूफान मचा रही थी। “तुम आ गए,” प्रिया ने फुसफुसाते हुए कहा, और उसे अंदर खींचकर दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया।
कमरे की हल्की रोशनी में भी उनके जिस्मों की भूख साफ़ दिख रही थी। समीर ने बिना एक पल गंवाए प्रिया की कमर पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया। उनके होंठ मिले, एक दूसरे की आत्माओं को चूसते हुए। यह सिर्फ़ एक चुंबन नहीं था, यह वर्षों की दबी इच्छाओं का, प्रेम और वासना का एक विस्फोटक संगम था जो अब **शादी के बाद भी जारी इश्क** की आग बनकर सुलग रहा था। प्रिया की उँगलियाँ समीर के बालों में उलझ गईं, जबकि उसके हाथों ने प्रिया की कमर से खिसककर उसकी पीठ पर दबाव बनाया, उसे और भी कसकर अपने करीब खींचते हुए।
साड़ी और कुर्ता, एक पल में दोनों के जिस्म से उतरकर ज़मीन पर गिर गए, जैसे उन बंधनों का प्रतीक हों जिनसे वे भाग रहे थे। प्रिया के भरे-पूरे स्तन समीर की उँगलियों के स्पर्श से सिहर उठे। उसने एक निप्पल को धीरे से मुँह में भरा, उसे चूसते हुए और हल्के से काटते हुए। प्रिया की आहें कमरे की खामोशी को चीरती हुई निकलीं। समीर के हाथ उसकी चिकनी जाँघों पर उतर आए, और वो धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ते हुए उसकी कामुक योनि तक पहुँच गए। गीलेपन की गर्माहट महसूस होते ही समीर की साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी एक उँगली अंदर डाली, प्रिया के अंग-अंग में एक मीठी तड़प पैदा करते हुए। प्रिया ने अपनी जाँघें और फैला दीं, समीर को और गहराई तक जाने की मौन अनुमति देते हुए।
“अब और इंतज़ार नहीं,” समीर ने भारी आवाज़ में कहा, और प्रिया को उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया। वह उसके ऊपर झुका, उसकी आँखों में गहरे उतरते हुए, जैसे हर पल की स्वीकृति माँग रहा हो। प्रिया ने अपने बाहों को उसकी गर्दन में लपेट लिया, अपनी कमर उठाती हुई, अपने अंदर के खालीपन को भरने की लालसा में। समीर ने एक ही झटके में खुद को प्रिया के भीतर धकेल दिया। एक गहरी आह प्रिया के होंठों से निकली, सुख और हल्की पीड़ा का एक मिश्रण। उनके जिस्मों ने एक-दूसरे की लय पकड़ ली, हर धक्के के साथ वासना की आग और भड़कती गई। बिस्तर की चरमराहट और उनके जिस्मों की थपथपाहट कमरे में गूँज उठी। यह एक आदिम नृत्य था, जिसमें दो आत्माएँ एक होने को बेताब थीं, सभी सामाजिक सीमाओं को तोड़कर।
समीर ने अपनी गति और तेज़ की, प्रिया के भीतर गहराई तक प्रवेश करते हुए। प्रिया ने अपनी टाँगें उसकी कमर के चारों ओर कस लीं, उसे अपने से दूर जाने से रोकते हुए। उसकी साँसें अनियंत्रित हो गईं, उसका पूरा जिस्म एक अनकही प्यास से काँप रहा था। समीर ने उसे पलट दिया, और पीछे से खुद को उसमें फिर से धकेला। इस नए कोण ने उनकी उत्तेजना को और बढ़ा दिया। प्रिया ने बिस्तर को अपनी मुट्ठियों में कस लिया, हर धक्के के साथ एक तीव्र सुख की लहर उसके रोम-रोम में दौड़ गई। यह **शादी के बाद भी जारी इश्क** की वो सच्चाई थी जिसे वो दुनिया से छिपाए हुए थी, पर जिसके बिना उसकी साँसें अधूरी थीं।
कुछ ही पलों में, दोनों के शरीर काँप उठे। समीर ने एक गहरी दहाड़ के साथ खुद को प्रिया के भीतर पूरी तरह खाली कर दिया, और प्रिया भी एक तीखी चीख के साथ चरम सुख की गहराइयों में डूब गई। उनके जिस्म पसीने से भीगे हुए थे, एक दूसरे से लिपटे हुए।
वे देर तक यूँ ही पड़े रहे, एक दूसरे की साँसों की गर्माहट महसूस करते हुए। कमरे में सिर्फ़ उनकी भारी साँसों की आवाज़ें थीं, और हवा में घुली हुई वासना की मीठी गंध। प्रिया ने समीर के कंधे पर सिर रखा और उसकी छाती पर हल्के से किस किया। “तुमसे यह **शादी के बाद भी जारी इश्क** मुझे जीने की वजह देता है, समीर,” उसने फुसफुसाते हुए कहा। समीर ने उसे कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जैसे दुनिया की कोई ताक़त उन्हें अलग न कर सके। बाहर भले ही दुनिया अपनी गति से चल रही थी, पर उस कमरे के भीतर, वे दोनों अपने गुप्त प्रेम और वासना के अद्भुत संसार में खोए हुए थे, जहाँ हर बंधन टूट चुका था और सिर्फ़ उनके जिस्मों की प्यास और रूहों का मिलन ही शाश्वत सत्य था।
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