दोपहर की ढलती धूप खिड़की से अंदर झाँक रही थी, और प्रिया को अपनी सूनी देह में एक अजीब सी तड़प महसूस हो रही थी। तभी दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। उसका दिल धक से रह गया। यह और कोई नहीं, रोहन था, उसके पड़ोसी और उसके दिल के चोर।
“कौन?” प्रिया ने खुद को संभालते हुए पूछा।
“मैं, रोहन। कुछ काम था।” उसकी आवाज़ में वही जानी-पहचानी मिठास थी जो प्रिया की नसों में आग लगा देती थी।
प्रिया ने दरवाज़ा खोला। रोहन सामने खड़ा था, उसकी टी-शर्ट में कसे हुए उसके बाइसेप्स और आँखों में वही शरारत भरी चमक। प्रिया ने एक पल को अपने पति राहुल के बारे में सोचा, जो दफ़्तर में थे, और फिर अपने अंदर उठते तूफ़ान को महसूस किया। वह जानती थी कि यह गलत है, पर रोहन के लिए उसके दिल में उठती हवस एक ऐसी लपट थी जो **शादी के बाद भी जारी इश्क** को हर दिन गहरा करती जा रही थी।
“क्या हुआ?” प्रिया ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कंपन थी।
“बस, ऐसे ही चला आया। सोचा भाभी जी अकेली होंगी तो…” रोहन ने बात अधूरी छोड़ दी, पर उसकी आँखें प्रिया के होंठों पर ठहरी थीं।
प्रिया ने उसे अंदर आने का इशारा किया। जैसे ही वह अंदर आया, प्रिया ने दरवाज़ा बंद कर दिया और कुंडी लगा दी। कमरे में एक अजीब सी चुप्पी छा गई, जो दोनों के दिल की धड़कनों से टूट रही थी। रोहन ने एक कदम प्रिया की ओर बढ़ाया। प्रिया पीछे हटती गई, जब तक उसकी पीठ दीवार से न लग गई। रोहन ने अपना हाथ उसकी कमर पर रखा। प्रिया की साँसें तेज़ हो गईं।
“प्रिया…” रोहन की आवाज़ कामुक फुसफुसाहट में बदल गई।
“रोहन, ये… ये ग़लत है,” प्रिया ने कहा, पर उसकी आँखों में विरोध नहीं, बल्कि समर्पण था।
रोहन ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। एक पल को प्रिया ठिठकी, फिर उसने जवाब दिया। उनके होंठ एक-दूसरे को चूसने लगे, प्यार की सारी वर्जनाएं टूट गईं। रोहन ने उसे अपनी बांहों में भर लिया, और प्रिया ने उसकी गर्दन को अपने हाथों से जकड़ लिया। उनकी जीभें एक-दूसरे में उलझ गईं, हर चुंबन के साथ प्यास और गहरी होती जा रही थी।
रोहन के हाथ प्रिया की साड़ी में घुस गए, उसकी कमर को सहलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ रहे थे। प्रिया ने आह भरी जब रोहन ने उसके पेट पर चुंबन करना शुरू किया, फिर उसकी नाभि के चारों ओर अपनी जीभ फिराई। प्रिया का बदन काँपने लगा। उसने अपने हाथ रोहन की टी-शर्ट में डाले और उसे उतार फेंका। रोहन का सुडौल शरीर अब उसकी आँखों के सामने था। प्रिया ने उसके सीने पर अपने होंठों से निशान बनाने शुरू किए।
रोहन ने प्रिया को गोद में उठा लिया और सीधे बेडरूम की ओर चला। प्रिया ने अपनी टांगें उसकी कमर पर लपेट लीं। बेडरूम में पहुँचकर, रोहन ने उसे धीरे से बिस्तर पर लिटाया। उसने प्रिया की साड़ी खोली, फिर उसका ब्लाउज और पेटीकोट उतार फेंका। प्रिया अब सिर्फ़ गुलाबी ब्रा और पैंटी में थी, उसका बदन कामुकता से दमक रहा था। रोहन की आँखें उसके उभारों पर टिक गईं। उसने धीरे से प्रिया की ब्रा खोली और उसके सुडौल स्तनों को अपने हाथों में भर लिया। प्रिया ने एक गहरी आह भरी जब रोहन ने उसके निप्पलों को अपने मुँह में लिया और उन्हें चूसने लगा। वह अपनी कमर को ऊपर उठाने लगी, उसकी हवस अब अनियंत्रित हो चुकी थी।
प्रिया ने रोहन के पैंट और अंडरवियर भी उतार दिए। उसका मर्दाना अंग, उत्तेजित और कठोर, प्रिया की आँखों के सामने था। रोहन ने अपनी जीभ से प्रिया की पैंटी के ऊपर से ही उसकी योनि को सहलाना शुरू किया। प्रिया का पूरा बदन मचल उठा। उसने खुद अपनी पैंटी खींचकर उतार दी। अब दोनों बिल्कुल नग्न थे, एक-दूसरे की गर्मी में डूब चुके थे।
रोहन ने प्रिया की जांघों को फैलाया और धीरे से अपना लिंग उसकी योनि के द्वार पर टिका दिया। प्रिया ने अपनी कमर उठाई, उसे अंदर लेने की तीव्र इच्छा से। रोहन ने एक गहरा धक्का दिया और उसका पूरा लिंग प्रिया के अंदर समा गया। प्रिया की सिसकियाँ निकल पड़ीं। उनकी साँसें एक-दूसरे में घुल गईं, और उस पल में, प्रिया को लगा जैसे यही असली जीवन है, यही तो **शादी के बाद भी जारी इश्क** की सच्चाई है।
रोहन तेज़ी से प्रिया के अंदर आने-जाने लगा। हर धक्के के साथ प्रिया गहरी आहें भर रही थी। उनकी त्वचा पसीने से भीग चुकी थी, और उनके शरीर की आवाज़ें कमरे में गूंज रही थीं। प्रिया ने अपने नाखूनों से रोहन की पीठ खुरचनी शुरू कर दी। वह चरम सुख के किनारे पर थी। एक और ज़ोरदार धक्के के साथ, प्रिया का पूरा बदन काँप उठा। एक तीव्र लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ गई, और वह चरम सुख की गहराई में डूब गई, रोहन का नाम पुकारते हुए। रोहन भी उसके साथ ही चरम पर पहुँच गया, उसके अंदर अपनी सारी गरमाहट उड़ेल दी।
दोनों कुछ देर तक ऐसे ही लेटे रहे, एक-दूसरे की बाहों में। कमरा उनकी महक से भरा था, और प्रिया को पता था कि यह सिर्फ आज की रात नहीं थी। यह एक अंतहीन सिलसिला था, एक ऐसा रिश्ता जो **शादी के बाद भी जारी इश्क** की मिसाल बन चुका था। उसकी आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि और एक अनकही उम्मीद तैर रही थी।
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