कोहरे से लिपटी उस सर्द रात में, रेलगाड़ी के खाली डिब्बे में राती की देह, अनजाने ही एक अजीब सी बेचैनी से सिहर उठी थी। खिड़की से बाहर देखते हुए, उसे लगा कि यह केवल उसकी अकेली लड़की का रात का सफर नहीं, बल्कि उसकी आत्मा की एक कामुक यात्रा है जो अभी शुरू ही हुई थी। ट्रेन की लयात्मक घरघराहट उसके भीतर की अनकही प्यास को और हवा दे रही थी। हर स्टेशन पर रुकने और फिर चलने की आवाज़, जैसे उसके धड़कते दिल की ताल बन गई थी।
अचानक, एक स्टेशन पर, डिब्बे में एक आकृति ने प्रवेश किया। विक्रम। उसकी आँखें मिलीं और राती के अंदर एक बिजली सी दौड़ गई। वह आदमी लंबा, मज़बूत कद-काठी का था, जिसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी। उसने राती से थोड़ी दूरी पर अपनी सीट ली, पर उसकी निगाहें बार-बार राती पर ठहर जाती थीं। राती को पहले तो डर लगा, पर उस डर के नीचे कहीं एक मीठी सी उत्तेजना भी पनप रही थी। यह अकेली लड़की का रात का सफर अब शायद अकेला नहीं रहने वाला था।
कुछ देर की चुप्पी के बाद, जब ट्रेन ने फिर रफ्तार पकड़ी और बाहरी दुनिया की आवाज़ें मंद पड़ गईं, विक्रम अपनी सीट से उठा और राती के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने कुछ कहा नहीं, बस एक नज़र डाली जो हज़ारों बातें कह गई। राती की सांसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी पलकें झुका लीं, पर उसके अंदर का तूफान शांत नहीं हुआ। विक्रम धीरे से राती के पास वाली सीट पर बैठ गया। डिब्बे में अंधेरा बढ़ रहा था और ट्रेन की धीमी रोशनी उनके चेहरों पर एक रहस्यमयी चमक डाल रही थी।
विक्रम का हाथ धीरे से राती की जाँघ पर टिका, जैसे गलती से छू गया हो। राती का पूरा शरीर उस स्पर्श से कांप उठा। उसने अपनी आँखें उठाईं और विक्रम की आँखों में देखा। उनमें अब कोई सवाल नहीं था, केवल एक गहरी, ज्वलंत इच्छा थी। राती ने मना नहीं किया, बस एक धीमी आह भरी। विक्रम का हाथ अब उसकी साड़ी के ऊपर से उसकी जाँघों को सहला रहा था। राती की साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी कमर थोड़ी उचका ली, जैसे उस स्पर्श को और गहराने की अनुमति दे रही हो।
विक्रम ने अब थोड़ी और हिम्मत दिखाते हुए राती की साड़ी का पल्लू सरकाया और उसके ब्लाउज पर अपना हाथ रखा। राती के स्तन उभार से बाहर निकलने को आतुर थे। विक्रम ने धीरे से उसके ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। राती ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को उस पल में डूब जाने दिया। जैसे ही उसके स्तन खुले, विक्रम की उँगलियाँ उनकी कठोर निप्पल्स को सहलाने लगीं। राती के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली चीख निकली। उसने अपना सर पीछे कर सीट से टिका लिया। विक्रम ने अपनी उँगलियाँ नीचे सरकाईं, उसकी साड़ी को उसकी कमर से ढीला किया और फिर धीरे-धीरे उसके पेटीकोट के अंदर ले गया।
जैसे ही उसकी उँगलियाँ राती की पैंटी के किनारे को छू गईं, राती ने अपनी टांगें थोड़ी और खोल दीं। विक्रम ने पैंटी को एक तरफ सरका कर, उसकी कामोत्तेजित योनि पर अपनी उँगलियाँ रखीं। गीलापन और गर्माहट राती को मदहोश कर रही थी। विक्रम ने एक उंगली अंदर डाली और राती के मुँह से सिसकियाँ निकलने लगीं। ट्रेन की घरघराहट में उसकी सिसकियाँ और विक्रम की तेज़ साँसें घुलमिल गईं। विक्रम ने अपनी दूसरी उंगली भी अंदर डाली और उसे ज़ोर-ज़ोर से सहलाने लगा। राती की देह हिल रही थी, उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं और उसका रोम-रोम कामुकता में डूब चुका था।
यह अकेली लड़की का रात का सफर अब किसी और ही मंजिल की ओर बढ़ रहा था। विक्रम ने अपनी उँगलियों को और तेज़ी से चलाया, राती की इच्छा चरम पर थी। वह अब खुद को रोक नहीं पाई और उसकी योनि से रस बह निकला। राती ने अपनी टांगों से विक्रम की कमर को कस कर पकड़ लिया। विक्रम ने धीरे से अपनी पैंट नीचे की और अपने उत्तेजित लिंग को राती की गीली योनि पर रखा। राती ने अपनी कमर उचका कर उसे अंदर आने का न्योता दिया। विक्रम ने एक झटके में खुद को राती के अंदर धकेल दिया।
एक गहरी आह राती के गले से निकली। विक्रम ने धीरे-धीरे, फिर तेज़ी से धक्के लगाने शुरू किए। ट्रेन की हर ताल के साथ, उनकी देह एक-दूसरे से टकरा रही थी। राती की मदहोश आवाज़ें और विक्रम की मर्दाना गर्माहट उस खाली डिब्बे को भर रही थीं। राती अपनी आँखें बंद कर, हर झटके का आनंद ले रही थी। उसके शरीर का हर अंग अब सिर्फ़ और सिर्फ़ चरमसुख की ओर बढ़ रहा था। यह अकेली लड़की का रात का सफर उसके लिए सबसे यादगार बन चुका था। जब विक्रम ने अपनी पूरी शक्ति से अंदर तक उसे भर दिया, राती का शरीर एक कंपकंपी के साथ ढीला पड़ गया। उसने अपने हाथों से विक्रम को और कस कर जकड़ लिया, जैसे उसे खुद में समा लेना चाहती हो। कुछ पल बाद, विक्रम भी चरमसुख को प्राप्त कर राती के ऊपर लुढ़क गया। वे दोनों एक-दूसरे की बाहों में थके-हारे पड़े थे, पर उनके दिलों में एक अनकहा सुकून और गहरी संतुष्टि थी। बाहर ट्रेन अपने रास्ते पर बढ़ती जा रही थी, पर अंदर दो आत्माएँ एक-दूसरे में कहीं खो चुकी थीं।
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