दोपहर की अंगार-सी तपती धूप में, जब सारा गाँव गहरी नींद में डूबा था, सुनीता भाभी की भरी-पूरी काया अकेले घर में बेचैन थी। उनके पति, रणजीत, काम के सिलसिले में शहर गए हुए थे, और उनकी कमी आज सुनीता को कुछ ज़्यादा ही अखर रही थी। पसीने से भीगी उनकी गुलाबी साड़ी उनके सुडौल वक्षों से चिपकी हुई थी, जो हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। रसोई में काम करते हुए, उनकी निगाह बार-बार ठंडी पड़ी देहरी की ओर जा रही थी, जैसे किसी अनकही उम्मीद में।
तभी, किसी के कदमों की आहट हुई। राहुल, उनके देवर, अंदर आए। राहुल की युवा आँखों ने पल भर में सुनीता की बेचैनी और उनके बदन की मदहोश कर देने वाली सुगंध को भाँप लिया। “भाभी, क्या कर रही हो इस गर्मी में? पंखा चला दो,” राहुल ने अपनी आवाज़ में हल्की सी शरारत घोलते हुए कहा। सुनीता ने पलटकर देखा। राहुल की मर्दाना काया, जो पसीने में कुछ ज़्यादा ही आकर्षक लग रही थी, उनकी नस-नस में सिहरन दौड़ा गई। “अरे राहुल, तुम? क्या हुआ?” सुनीता ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।
“कुछ नहीं, बस यूँ ही आया था। तुम्हें अकेली देखकर सोचा… साथ बैठें कुछ देर।” राहुल की नज़रें सुनीता के भीगे होठों पर टिकी थीं। सुनीता का दिल धड़कने लगा। यह था देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस की शुरुआत की पहली चिंगारी। राहुल उनके पास आकर खड़ा हो गया। उसने एक गिलास पानी भरा और सुनीता को दिया। पानी पीते हुए सुनीता का हाथ राहुल के हाथ से छू गया। बिजली का एक तेज़ झटका दोनों के शरीर में दौड़ गया। सुनीता ने नज़रे झुका लीं, पर उनके गालों पर फैलती लाली राहुल से कुछ भी छुपा न सकी।
राहुल ने धीरे से सुनीता का हाथ थामा। “भाभी, तुम बहुत खूबसूरत लगती हो,” राहुल ने फुसफुसाते हुए कहा। सुनीता के रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आँखें राहुल की आँखों से मिलीं, और उस पल में, सारी मर्यादाएं, सारे बंधन कहीं दूर धुंधला गए। राहुल ने बिना देर किए सुनीता को अपनी बाँहों में भर लिया। सुनीता का विरोध क्षणिक था, और फिर उन्होंने भी राहुल की पीठ पर अपनी बाँहें कस लीं। उनके जिस्मों की गर्मी एक-दूजे में समाने लगी। राहुल ने अपनी उँगलियाँ सुनीता की कमर पर चलाईं, और फिर धीरे-धीरे उनकी साड़ी के पल्लू को खिसकाने लगा। सुनीता की साँसें तेज़ हो गईं, और एक मदहोश कर देने वाली आह उनके होंठों से निकली।
राहुल ने सुनीता को गोद में उठाया और सीधे बेडरूम की ओर बढ़ गया। कमरा बाहर की चिलचिलाती धूप से बचा हुआ था, और भीतर एक अजीब सी शांति थी, जो अब उनकी उफ़नती वासना की गवाह बनने वाली थी। राहुल ने सुनीता को बिस्तर पर धीरे से लिटाया। उनकी साड़ी अब उनके बदन से पूरी तरह अलग हो चुकी थी, और सुनीता का भरा-पूरा जिस्म राहुल की प्यासी नज़रों के सामने था। राहुल ने अपने कपड़े भी उतार दिए, और फिर दोनों जिस्म एक-दूजे से पूरी तरह लिपट गए।
उनके बीच का यह देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस, दुनिया की नज़रों से छिपा, और भी उत्तेजक था। राहुल ने सुनीता के अधरों को चूमना शुरू किया, धीरे-धीरे उनकी गर्दन से होते हुए उनके सुडौल वक्षों तक पहुँच गया। सुनीता की आहें कमरे की खामोशी को भंग कर रही थीं। उनके शरीर का हर अंग राहुल के स्पर्श से जाग उठा था। राहुल ने अपनी उँगलियाँ सुनीता की जाँघों पर चलाईं, और सुनीता ने अपने पैरों से राहुल को कस लिया, जैसे वह उन्हें कभी छोड़ना ही नहीं चाहती थीं।
उनकी प्यास अब अपनी चरम सीमा पर थी। राहुल ने सुनीता की भीगी हुई योनि पर अपना हाथ रखा, और सुनीता एक गहरी चीत्कार के साथ छटपटा उठीं। राहुल ने उनके कानों में फुसफुसाया, “आज तुम्हें पूरी तरह अपना बना लूँगा, भाभी।” फिर उसने अपनी पैंट खोली और अपने मजबूत औज़ार को सुनीता की प्रवेश-द्वार पर टिका दिया। एक गहरी साँस के साथ, राहुल ने एक धक्का मारा, और सुनीता दर्द और आनंद के मिले-जुले एहसास से कराह उठीं। उनका देह अब पूरी तरह राहुल की मर्दानगी में समा चुका था।
दोनों जिस्मों की रगड़ से बिस्तर चरमराह उठा था। सुनीता ने राहुल के बालों को कसकर पकड़ रखा था, उनकी आँखें बंद थीं और होंठों से केवल आहें निकल रही थीं। राहुल की धड़कनें उनकी कमर के हर झटके के साथ तेज़ हो रही थीं। उनका पसीना एक-दूजे में मिल रहा था, उनकी गंध एक हो गई थी। हर झटका एक नए आनंद को जन्म दे रहा था। उनका देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस अपने चरम पर था, हर पल गहराता और अधिक तीव्र होता जा रहा था।
जब दोनों थककर चूर हो गए, उनके जिस्म एक-दूजे से चिपके हुए थे, तो कमरे में एक अजीब सी शांति छा गई थी। सुनीता ने राहुल को कसकर गले लगाया और उसके सीने पर अपना सिर रख लिया। राहुल ने उनके माथे को चूमा। वे दोनों जानते थे, यह देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस अब उनकी ज़िंदगी का एक अटूट हिस्सा बन चुका था, एक ऐसा मीठा राज़ जो केवल उन्हीं दोनों के बीच रहेगा, और वे इसे हमेशा ऐसे ही छुपा कर जीते रहेंगे।
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