सुमन भाभी की आँखें बरसों से जिस आग से तप रही थीं, उस आग को आज देवर रवि की नज़रों में पहचान लिया था। उस दोपहर जब घर के सब सदस्य खेतों पर गए थे और गाँव में सन्नाटा पसरा था, तब रसोई में काम करती सुमन के पीछे आकर रवि ने यूँ ही पूछ लिया, “भाभी, कोई मदद चाहिए क्या?” सुमन ने मुड़कर देखा, उसके पसीने से भीगे खुले बालों से टपकती बूँदें उसके भरे-पूरे वक्षों पर गिर रही थीं, और उसकी साड़ी का आँचल ढीला था। रवि की आँखें उसके उतार-चढ़ाव को निहार रही थीं, और सुमन के दिल की धड़कन बढ़ गई। यह सिर्फ मदद का बहाना नहीं था, यह उनकी छिपी हुई इच्छाओं का पहला खुला आमंत्रण था।
सुमन का पति, राकेश, शहर में नौकरी करता था और महीने में बस एक या दो बार ही घर आता था। उसकी गैर-मौजूदगी में सुमन की जवानी सूखे कुएँ की तरह तरस रही थी। और रवि, जो अभी-अभी कॉलेज खत्म कर गाँव लौटा था, उसकी भरी जवानी और कामुकता भरी आँखें अक्सर भाभी की ओर उठती थीं। इन आँखों में वो प्यास थी जो सुमन खुद महसूस करती थी। दिन में हल्की छेड़छाड़, रात में छुप-छुप कर चोरी से एक-दूसरे के कमरे के बाहर से झाँकना, और कभी-कभी जब घर खाली होता तो एक-दूसरे को छूने के बहाने ढूँढ़ना – यही उनका **देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस** था।
आज जब रवि ने मदद के बहाने उसके करीब आने की कोशिश की, तो सुमन ने प्रतिरोध नहीं किया। उसने जानबूझकर अपनी कमर को रवि के हाथ से हल्का-सा छूने दिया जब वह बर्तन लेने के लिए झुकी। उस बिजली के झटके ने दोनों के शरीर में आग लगा दी। रवि का हाथ तुरंत उसकी कमर पर टिका और उसने उसे अपनी ओर खींच लिया। सुमन के अधरों से एक हल्की-सी आह निकली, और उसने खुद को रवि के मज़बूत हाथों में छोड़ दिया। “रवि…” उसके मुँह से केवल इतना ही निकल पाया। रवि ने उसे और कसकर अपनी बाँहों में भर लिया, उसकी साँसों की गर्मी सुमन की गर्दन पर महसूस हो रही थी।
उसने धीरे से सुमन के गालों पर अपने होंठ रखे, और फिर नीचे उतरते हुए उसकी गर्दन, उसके कानों को चूमने लगा। सुमन की आँखें बंद हो गईं, उसके पूरे शरीर में एक अजीब-सी सिहरन दौड़ गई। रवि के हाथों ने उसकी साड़ी को धीरे से सरकाना शुरू किया, और उसके नंगे पेट पर अपनी उंगलियाँ फेरने लगा। सुमन की साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपने होंठ रवि के होंठों पर रख दिए, और एक लम्बी, गहरी चुंबन में दोनों खो गए। यह चुंबन केवल प्यार का नहीं, बल्कि बरसों की दबी वासना का इज़हार था।
रवि ने उसे गोद में उठा लिया और सीधे पास के खाली कमरे की ओर बढ़ गया। कमरे में पहुँचते ही उसने सुमन को बिस्तर पर लिटा दिया। दोपहर की धूप खिड़की से झाँक रही थी, मानो उनके इस चोरी-छिपे मिलन की साक्षी बन रही हो। रवि ने बिना समय गंवाए सुमन की साड़ी खोली, और फिर उसका ब्लाउज। सुमन का भरा-पूरा वक्ष रवि की आँखों के सामने उजागर हो गया। रवि ने बिना पलक झपकाए उन्हें निहारा, और फिर अपने होंठों से एक कोमल निप्पल को अपने मुँह में भर लिया। सुमन के मुँह से दर्द और आनंद का मिलाजुला स्वर निकला। रवि के हाथ उसके बदन पर ऐसे फिर रहे थे, जैसे वो किसी अनमोल खजाने की खोज कर रहा हो। उसने सुमन की सलवार भी उतार दी, और फिर उसके हर अंग को अपनी नज़रों और हाथों से नापने लगा।
सुमन भी अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी। उसने रवि के कमीज़ के बटन खोले और उसकी छाती पर अपने नाखून गड़ा दिए। रवि के बदन की गर्मी, उसकी मर्दानगी की गंध सुमन को और भी उत्तेजित कर रही थी। रवि ने अपने सारे कपड़े उतार दिए। दोनों के नग्न शरीर अब एक-दूसरे से लिपट गए थे। उस पल, सारी मर्यादाएँ, सारे सामाजिक बंधन टूट चुके थे। केवल दो प्यासे शरीर थे जो एक-दूसरे में समा जाना चाहते थे।
रवि ने धीरे से सुमन की जाँघों को फैलाया और उसकी उस छिपी हुई कंदरा पर अपने अधरों से एक चुंबन अंकित कर दिया। सुमन चीख पड़ी। रवि ने उसे ऊपर देखा, उसकी आँखों में वासना और प्यार का अजीब संगम था। फिर रवि ने खुद को सुमन के भीतर धकेल दिया। एक गहरी आह के साथ सुमन ने अपनी कमर उठा दी। दोनों एक-दूसरे में खो गए, उनकी आवाज़ें कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं। हर धक्के के साथ, हर आह के साथ, उनका यह **देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस** और गहरा होता जा रहा था। वे घंटों तक एक-दूसरे में लिप्त रहे, हर पल को जीते हुए, हर संभोग को महसूस करते हुए।
जब वे दोनों थककर चूर हो गए और एक-दूसरे की बाँहों में पड़े थे, तब भी उनके दिलों में आग बुझी नहीं थी। रवि ने सुमन के माथे को चूमा और फुसफुसाया, “भाभी, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।” सुमन ने उसकी छाती पर अपना सिर रख दिया और धीरे से बोली, “और मैं तुम्हारे बिना, रवि। यह हमारा **देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस** हमेशा यूँ ही चलता रहेगा।” उस दोपहर, उन्होंने सिर्फ अपने शरीर की प्यास ही नहीं बुझाई थी, बल्कि एक ऐसा रिश्ता भी कायम कर लिया था, जो समाज की नज़रों से भले ही छुपा रहे, पर उनके दिलों में हमेशा धड़कता रहेगा। हर बार जब राकेश घर से दूर जाता, तो रवि और सुमन के लिए एक नया अवसर पैदा होता, जहाँ वे अपने कामुक प्रेम को फिर से जी सकते थे, चोरी-छिपे, बेधड़क।
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