उसकी गीली साड़ी का पल्लू जब हवा में लहराकर मेरे बालकनी के करीब आया, तो मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू हो उठीं। यह प्रिया थी, मेरी नई पड़ोसन, जो अक्सर दोपहर में छत पर अपने बाल सुखाती या कपड़े डालती नजर आती थी। उसकी भरी-पूरी काया, पतली कमर और गोल, उठे हुए वक्ष, मुझे हर बार अपने जाल में फँसा लेते थे। आज भी वह छत पर थी, हल्के नीले रंग की साड़ी में, जिसके अंदर से उसकी भीगी हुई देह का हर उभार साफ झलक रहा था।
“नमस्ते, रोहन जी,” उसकी मीठी आवाज ने मुझे मेरे ख्यालों से बाहर निकाला। उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा, उसकी नजरों में एक शरारत भरी चमक थी। “क्या देख रहे हैं?”
मैं थोड़ा हड़बड़ाया, पर खुद को संभाला। “बस… मौसम का मिजाज। और आपकी खूबसूरती।” मेरे बेबाक जवाब पर उसके गालों पर हल्की लाली दौड़ गई।
वह खिलखिलाकर हँसी, “आप भी ना… बड़े शैतान हैं।”
हमारी यह छोटी-छोटी बातें, छत और बालकनी के बीच की दूरी को धीरे-धीरे कम कर रही थीं। कभी वह मुझसे पौधों के बारे में पूछती, कभी मैं उसकी बनाई हुई डिश की तारीफ करता। धीरे-धीरे, इन छुप-छुप के मुलाकातों से, **नई पड़ोसन से बढ़ा नजदीकियां** साफ महसूस होने लगी थीं। मेरे अंदर की आग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी, और मुझे लगने लगा था कि उसकी आँखों में भी वही प्यास थी।
एक शाम, बिजली गुल हो गई। पूरा मोहल्ला अँधेरे में डूबा था। मैं अपनी बालकनी में बैठा था, तभी प्रिया की आवाज आई। “रोहन जी, क्या आपके पास मोमबत्ती है? मेरे पास एक भी नहीं है।”
यह एक सुनहरा मौका था। “हाँ, हाँ, प्रिया जी! आप आ जाइए, मैं आपके घर पहुँचकर दे देता हूँ।”
कुछ ही पल में उसने अपना दरवाजा खोला। एक पतली, रेशमी नाइटगाउन में वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। मेरे हाथ में मोमबत्ती थी, पर मेरी निगाहें उसके जिस्म पर टिकी थीं। उसने मुझे अंदर बुलाया, “अंदर आ जाइए, रोहन जी। बाहर बहुत गर्मी है।”
मैं अंदर गया। अँधेरे में एक अजीब सी उत्तेजना थी। मोमबत्ती की पीली रोशनी में उसके नैन-नक्श और भी मोहक लग रहे थे। मैंने उसे मोमबत्ती दी। उसके हाथों से मोमबत्ती लेते हुए मेरा हाथ उसके नरम हाथों को छू गया। एक बिजली सी कौंध गई हम दोनों में। न जाने कब, बातों-बातों में, **नई पड़ोसन से बढ़ा नजदीकियां** एक नए ही मोड़ पर आ खड़ी हुई थी।
“अकेले डर लग रहा था?” मैंने धीमे से पूछा।
उसने सिर झुका लिया। “हाँ, थोड़ा सा।”
मैंने हिम्मत करके उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसकी साँसें तेज हो गईं। मैंने धीरे से उसके गाल को छुआ, फिर उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाकर उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं, लालसा से भरी। मैंने उसे अपने करीब खींचा और उसके रसीले होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वह पहले तो चौंकी, फिर उसने भी मेरा साथ दिया। हमारे होंठ एक-दूसरे को चूसने लगे, जीभें एक-दूसरे से लड़ने लगीं। मेरे हाथ उसकी कमर से होते हुए उसकी भरी हुई नितंबों पर पहुँच गए और मैं उन्हें भींचने लगा। उसने एक धीमी सी आह भरी।
मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और बेडरूम की ओर ले गया। मोमबत्ती की रोशनी में कमरा कामुकता से भर उठा था। मैंने उसे बिस्तर पर धीरे से लिटाया और उसके ऊपर झुक गया। उसके नाइटगाउन के पतले स्ट्रैप्स मैंने उतार दिए और वह मेरे सामने पूरी तरह नग्न हो गई। उसके उभरे हुए स्तन, गुलाबी निप्पल, और नीचे झाड़ियों से ढकी उसकी योनि, सब कुछ मुझे मदहोश कर रहा था। मैंने उसके निप्पल्स को अपनी जीभ से सहलाना शुरू किया, फिर उन्हें अपने मुँह में लेकर चूसा। प्रिया की सिसकियाँ पूरे कमरे में गूँजने लगीं। “रोहन… अब और नहीं…!” उसकी आवाज में एक गहरी प्यास थी।
मैंने उसके जांघों के बीच हाथ फेरा, उसकी गरम योनि को महसूस किया। वह पहले से ही गीली थी, मेरे स्पर्श का इंतजार कर रही थी। मैंने अपनी पैंट उतारी और अपना गरम, तना हुआ लिंग उसके द्वार पर रखा। प्रिया ने अपनी जांघें फैला दीं। मैंने एक गहरा साँस लिया और एक ही झटके में अपना पूरा लिंग उसकी योली में उतार दिया। “आहह्ह्ह्ह…!” प्रिया के मुँह से एक तीव्र चीख निकली, जो तुरंत मेरे होंठों में दब गई। उसकी देह का हर कण मेरे जिस्म में समा गया था।
हमने एक-दूसरे को कसकर जकड़ लिया और एक जंगली लय में हिलने लगे। हर धक्के के साथ बिस्तर चरमरा रहा था, हमारी आहें और सिसकियाँ एक साथ गूँज रही थीं। मैं उसके अंदर गहराई तक जा रहा था, उसे पूरा भर देना चाहता था। प्रिया भी उतनी ही तीव्रता से मेरा साथ दे रही थी, उसकी जांघें मेरी कमर पर कस गई थीं। पसीने की बूंदें हमारे जिस्मों पर चमक रही थीं, और हवा में हमारी कामुक गंध भर गई थी। जब हम दोनों चरम सुख पर पहुँचे, तो हमारी देह काँप उठी और हम एक-दूसरे में ढह गए, पूरी तरह से तृप्त। उस रात, सिर्फ दो जिस्म ही नहीं मिले थे, बल्कि एक गहरे रिश्ते की नींव रखी गई थी, जो **नई पड़ोसन से बढ़ा नजदीकियां** का जीता-जागता सबूत था। प्रिया मेरे बगल में लेटी थी, उसके होंठों पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। उसने मेरा हाथ थामा और फुसफुसाते हुए बोली, “यह रात, कभी न खत्म हो…”। मुझे पता था, यह तो बस शुरुआत थी।
Leave a Reply