दोपहर का गहरा सन्नाटा था, और सरला भाभी की गीली साड़ी उनके जिस्म से चिपकी हुई थी, हर उभार को साफ दर्शा रही थी। मोहन की आँखें, चुपके से रसोई के दरवाजे से झाँकती हुई, उन उभारों पर टिक सी गईं। सरला, घड़े से पानी भरते हुए, अपनी कमर मटका रही थी। पसीने की बूँदें उसकी गर्दन से होती हुई, छाती की गहरी खाई में उतर रही थीं। मोहन के अंदर एक अजीब सी आग भड़क उठी, जो उसे मजबूर कर रही थी, पास जाने के लिए। यह कोई पहली बार नहीं था, जब दोनों की आँखें यूं मिली हों और बिजली सी कौंध गई हो।
हिम्मत कर मोहन रसोई में दाखिल हुआ। ‘भाभी, क्या मैं पानी भर दूं?’ उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी। सरला ने मुड़कर देखा, उसकी नज़रें मोहन की बेचैन आँखों से मिलीं। ‘हाँ, मोहन, भर दे,’ सरला ने धीरे से कहा, पर उसकी आवाज़ में एक अनकही सहमति थी। जैसे ही मोहन ने घड़ा थामा, उसका हाथ सरला की नर्म कमर से जा टकराया। एक सिहरन दोनों के जिस्म में दौड़ गई, जैसे किसी बिजली के तार को छू लिया हो। सरला ने बिना कुछ कहे मोहन का हाथ थाम लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया।
मोहन की सारी झिझक टूट गई। उसने सरला को अपनी बाहों में भर लिया, और उसके गुलाबी होंठों को अपने होंठों से कुचल दिया। सरला की साँसें तेज़ हो गईं, और उसने भी उतनी ही शिद्दत से मोहन का जवाब दिया। उनकी ज़ुबानें एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो गईं, जैसे बरसों की प्यास बुझा रही हों। साड़ी का पल्लू कब सरला के कंधे से खिसक गया, उन्हें पता ही नहीं चला। मोहन के हाथ सरला की पीठ पर सरकने लगे, उसकी गर्म त्वचा का स्पर्श पाकर सरला की आँखों में कामुकता उतर आई। उसने अपनी हथेलियों से मोहन के बालों को सहलाया, और उसकी कमीज़ के बटन खोलने लगी। ‘कोई देख लेगा, मोहन,’ सरला ने हाँफते हुए कहा, पर उसकी आँखों में रोकने की कोई चाहत नहीं थी। मोहन ने उसे अपनी बाहों में उठाया और पास के सुनसान कमरे की ओर बढ़ चला, जहाँ उनका **देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस** अपनी इंतहा पर पहुँचने वाला था।
कमरे में पहुँचते ही, मोहन ने सरला को बिस्तर पर हल्के से लिटाया। साड़ी और पेटीकोट एक झटके में हटा दिए गए, और सरला का भरा-पूरा जिस्म, गोरा और कोमल, मोहन के सामने नुमायां हो गया। उसकी आँखों में चमक थी, और होंठों पर शरारती मुस्कान। मोहन ने अपने कपड़े भी उतार फेंके, और दोनों के नग्न जिस्म एक-दूसरे से लिपट गए। मोहन ने सरला के उभारों को अपने होंठों से टटोलना शुरू किया, उन्हें चूसते हुए, नोंचते हुए। सरला के मुँह से दर्द और आनंद की मिली-जुली आवाज़ें निकलने लगीं। वह अपनी कमर को ऊपर की ओर उठाती, मोहन को और करीब खींचती।
धीरे-धीरे मोहन सरला की जाँघों के बीच उतर गया। सरला ने अपनी टांगें फैला दीं, उसकी आँखों में अब सिर्फ़ वासना थी। मोहन ने एक गहरी साँस ली, और फिर धीमे से, लेकिन दृढ़ता से, सरला के अंदर प्रवेश कर गया। ‘आह्ह्हह,’ सरला की चीख दबी रह गई, उसने अपनी उँगलियों से बिस्तर की चादर को कसकर पकड़ लिया। मोहन की हर थाप पर, सरला का जिस्म मचल उठता। दोनों एक लय में हिल रहे थे, पसीने से भीग चुके थे। कमरे में सिर्फ़ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ें और सरला की कामुक कराहें गूँज रही थीं। इस पवित्र रिश्ते की मर्यादा को लाँघकर, उन्होंने अपने भीतर की सभी वर्जित इच्छाओं को आज़ादी दे दी थी।
कुछ पल बाद, मोहन ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई, और सरला भी उतनी ही तेज़ी से उसका साथ दे रही थी। दोनों एक-दूसरे में पूरी तरह खो चुके थे। ‘मोहन… हाँ… और तेज़…’ सरला की आवाज़ उत्तेजना में काँप रही थी। एक तीव्र, मादक ख़ुशी की लहर दोनों के जिस्म में दौड़ गई, और वे एक साथ चरम पर पहुँच गए। उनके शरीर ढीले पड़ गए, लेकिन आत्माएँ एक हो चुकी थीं। यह उनके **देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस** की एक और यादगार शाम थी।
थके-हारे, पर संतुष्ट, दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे। बाहर सूरज ढल रहा था, और घर में सन्नाटा अभी भी कायम था। उनके इस गुप्त प्रेम ने उन्हें एक-दूसरे से और भी कसकर जोड़ दिया था। वे जानते थे कि यह सिलसिला अभी लंबा चलेगा, और हर नई मुलाकात उनके **देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस** को और गहरा करती जाएगी।
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