मीरा जानती थी, उसकी देह में अभी भी वो आग सुलग रही थी, जिसे कोई चिंगारी भर देने वाला चाहिए था। पँतालिस की उम्र पार कर चुकी मीरा की आँखें आज भी काजल से सजी, किसी की तलाश में थीं। उसका पति बीते कई सालों से परदेस में था, और उसकी तन्हाई की चादर अब उसके शरीर को भी ढकने लगी थी। क्या इस उम्र में भी कोई नई चाहत संभव थी? अधेड़ उम्र की औरत का नया रोमांस कहाँ संभव था? पर मीरा की देह की प्यास आज भी गहरी थी।
दोपहर का तपता सूरज आँगन में उतर चुका था। ऐसे में रोहन का आना एक ठंडी हवा के झोंके जैसा था। पच्चीस साल का रोहन, उनके पड़ोसी का बेटा, जो अकसर मीरा के छोटे-मोटे काम कर दिया करता था। आज वो उनके बेडरूम के पंखे में कुछ गड़बड़ी ठीक करने आया था। मीरा ने उसे पंखा दिखाते हुए कहा, “बेटा, पता नहीं क्यों, बस हवा ही नहीं दे रहा।” रोहन अपने औजारों के साथ कमरे में दाखिल हुआ। उसकी मजबूत बाँहें, उसके कसी हुई टी-शर्ट के नीचे उभरती मांसपेशियाँ, और उसके चेहरे पर पसीने की चमक… मीरा की नज़रें उस पर जम सी गईं।
रोहन स्टूल पर चढ़कर पंखा ठीक करने लगा। कमरे में फैली धीमी रोशनी और कूलर की गुनगुनी आवाज़ के बीच, सिर्फ रोहन के औजारों की खटखटाहट थी। मीरा वहीं दरवाजे की चौखट पर खड़ी उसे निहार रही थी। उसकी हल्की साड़ी उसके मांसल वक्रों पर चिपकी हुई थी। जब रोहन नीचे उतरा, तो उसके हाथ में एक छोटा-सा पेंच था। “मामी जी, ज़रा ये पकड़िए।” उसके हाथ छूते ही मीरा के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। रोहन ने भी उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक देखी।
पंखे की आवाज़ अब पहले से तेज़ हो गई थी, पर कमरे में एक अलग ही गरमाहट फैल गई थी। रोहन जाने लगा, “ठीक हो गया मामी जी।”
“अरे! इतनी जल्दी? बैठो, कुछ ठंडा पानी पियो।” मीरा ने उसे रोक लिया।
रोहन हिचकिचाया, फिर मान गया। मीरा उसे पानी देने अंदर रसोई में गई। जब वो लौटी, तो रोहन बेडरूम में ही बिस्तर के किनारे बैठ चुका था। मीरा ने गिलास उसे थमाया। इस बार उनके हाथ ज़्यादा देर तक एक-दूसरे से सटे रहे। रोहन ने अपने होंठों पर एक शरारती मुस्कान लाई, “मामी जी, आप आज बहुत हसीन लग रही हैं।”
मीरा का चेहरा शर्म से लाल हो गया, पर उसकी आँखों में एक नई चमक थी। “क्या कह रहे हो रोहन?”
रोहन खड़ा हुआ, मीरा के और करीब आया। उसकी आँखों में एक ऐसी चाहत थी, जिसे मीरा बरसों से तरस रही थी। “जो सच है, वही कह रहा हूँ।”
उसने धीरे से मीरा का हाथ थामा। मीरा का पूरा बदन काँप गया। उसकी ठंडी हथेली पर रोहन के गर्म हाथों का स्पर्श किसी आग की लपट जैसा था। रोहन ने उसे धीरे से अपनी ओर खींचा। मीरा का प्रतिरोध पल भर का था। उसकी वर्षों की प्यासी देह अब किसी बंजर ज़मीन सी थी, जिसे बस एक बारिश का इंतज़ार था।
रोहन के होंठ मीरा के होंठों पर उतर आए। यह एक मीठा, गहरा चुम्बन था जो मीरा के भीतर तक झनझना गया। उसके सूखे होंठों में मानो फिर से जान आ गई। रोहन की बाँहें मीरा की कमर पर कस गईं और उसने उसे अपनी ओर खींच लिया। मीरा ने खुद को पूरी तरह रोहन के हवाले कर दिया। उसकी साड़ी सरक कर नीचे गिरी, और रोहन के हाथों ने उसके नरम बदन को टटोला। उसके उभरे हुए स्तनों को दबाते ही मीरा के मुँह से एक मदभरी आह निकली।
रोहन ने उसे बिस्तर पर धकेला, और खुद उसके ऊपर आ गया। उसकी कठोरता मीरा के भीतर एक अनसुनी उत्तेजना जगा रही थी। मीरा ने अपने दोनों पैर उठा कर उसे कस लिया। रोहन ने अपने कपड़े उतारे, और मीरा की देह को अपनी बाहों में भर लिया। मीरा ने अपने हाथों से रोहन के मजबूत बालों को सहलाया। उसकी उंगलियाँ उसकी कमर से होते हुए उसकी जाँघों तक पहुँचीं। उनकी देहें एक-दूसरे में सिमट चुकी थीं, हर स्पर्श, हर आह, हर साँस एक दूसरे की प्यास बुझा रही थी।
फिर आया वो पल, जब रोहन ने अपनी कठोरता को मीरा के भीतर उतारा। मीरा की आँखों में आँसू थे, पर ये दर्द के नहीं, बरसों बाद मिली संतुष्टि के थे। उसकी देह, जो कब से वीरान पड़ी थी, आज फिर से खिल उठी थी। रोहन की हर धड़कन, हर धक्के के साथ मीरा एक नए लोक में पहुँच रही थी। उसकी मधुर चीखें कमरे में गूँज रही थीं, और रोहन के भारी साँसें उसे और भी उत्तेजित कर रही थीं। दोनों एक दूसरे में खो चुके थे, वासना और प्रेम के उस संगम में, जहाँ उम्र की कोई सीमा नहीं थी।
जब उनकी देहें शांत हुईं, तो मीरा निढाल होकर रोहन की बाँहों में थी। उसके सिर को अपने सीने से लगाए रोहन ने उसके माथे पर एक गहरा चुम्बन दिया। मीरा ने ऊपर देखा, उसकी आँखों में कृतज्ञता और एक नयापन था। यह सिर्फ एक रात नहीं, यह तो अधेड़ उम्र की औरत का नया रोमांस था, जो उसकी आत्मा तक को तृप्त कर गया था। आज मीरा ने न सिर्फ एक प्रेमी पाया था, बल्कि अपनी देह और आत्मा को भी फिर से जीवित पाया था। यह शुरुआत थी एक ऐसी कहानी की, जहाँ उम्र बस एक संख्या थी और चाहत की कोई उम्र नहीं होती।
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