उसकी उँगलियों का मेरे पेट पर छूना भर था, और एक सिहरन मेरे पूरे जिस्म में दौड़ गई, बरसों की प्यास जैसे आज बुझने को थी। प्रिया के घर के आंगन में खड़ी मैं, राजेश की आँखों में अपने लिए वही बचपन का दीवानापन देख रही थी, जो कभी दफ़न हो गया था। दोपहर का सूरज सिर पर तप रहा था, और गाँव का माहौल शांत था, जैसे हर चीज़ हमारे इस अधूरी प्रेम कहानी का रोमांचक अंत देखने के लिए साँस रोके बैठी हो।
राजेश, मेरा बचपन का सखा, जिसे मैंने वर्षों पहले अपने परिवार की बंदिशों के चलते अलविदा कहा था, आज फिर मेरे सामने था। उसके चौड़े कंधे और आँखों में मेरे लिए बेशुमार चाहत देखकर मेरी साँसें तेज़ हो गईं। उसने धीरे से मेरे हाथ को अपनी हथेली में ले लिया। “प्रिया,” उसकी आवाज़ में वो खुरदुरापन था जो मेरी रगों में आग लगा गया, “कितने साल हो गए… और तुम आज भी उतनी ही हसीन हो।”
मैंने शर्माकर नज़रें झुका लीं, पर मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू हो चुकी थीं। मैं उसे घर के अंदर ले आई। पुराना मिट्टी का घर, जो हमारी बचपन की शरारतों का गवाह था, आज एक अलग ही कहानी लिखने को तैयार था। हवा में एक अजीब सी उत्तेजना घुली हुई थी। मैंने उसे पानी दिया, पर उसकी नज़रें मुझसे हट नहीं रही थीं। “राजेश…” मैंने मुश्किल से कहा, “तुम यहाँ कैसे?”
“कैसे नहीं आता?” उसने मेरे करीब आते हुए कहा, उसकी आँखों में ज्वाला थी, “तुम्हारी यादों ने मुझे कहीं चैन से बैठने नहीं दिया। वो अधूरी प्रेम कहानी… वो हमेशा मुझे बुलाती रही।” उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और उसके स्पर्श से मेरा शरीर काँप उठा। उसने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया। मेरे होंठों से एक हल्की सी आह निकली जब उसके होंठ मेरे होंठों पर उतरे। यह सिर्फ एक चुंबन नहीं था; यह बरसों की प्यास थी, बरसों की तड़प थी जो आज एक-दूसरे में समा जाना चाहती थी।
उसके होंठों का स्वाद मीठा और नशीला था, और मेरी सारी सुध-बुध जाती रही। मैंने भी अपनी बाँहें उसके गले में डाल दीं, और उसे और कसकर अपनी ओर खींचा। हमारा यह चुंबन गहरा होता चला गया, भाषाविहीन, वासना से भरा हुआ। उसकी हथेलियाँ मेरी पीठ पर सरकती हुई मेरी साड़ी के पल्लू से खेल रही थीं। मैं बेसुध होकर उसके हर स्पर्श का जवाब दे रही थी। मेरी साड़ी, मेरा ब्लाउज, सब बोझ लगने लगा।
राजेश ने मुझे धीरे से उठाया और बेडरूम की ओर ले चला। मुझे बिस्तर पर लिटाते ही उसने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा। एक-एक करके कपड़े शरीर से अलग हो रहे थे, जैसे वो हमारे बीच के हर बंधन को तोड़ रहे हों। मेरी नंगी त्वचा पर उसकी निगाहें किसी शिकारी की तरह थीं। मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया। जब मेरा ब्लाउज उतरा, तो उसके होंठ मेरे उठे हुए स्तनों पर टिक गए, और उसके दांतों ने हल्के से मेरे निप्पल को पकड़ा। मेरे मुँह से दर्द और आनंद का एक मिश्रण निकला।
वह नीचे उतरता गया, मेरे पेट पर, मेरी नाभि पर उसके होंठों का स्पर्श मेरी रीढ़ में सिहरन भर रहा था। जब उसकी जीभ मेरी जंघाओं के बीच पहुंची, तो मैं बिस्तर में धंस गई। “आह… राजेश…” मैं बेकाबू होकर सिसकने लगी। उसने अपनी जीभ से मुझे इतना उकसाया कि मेरा पूरा जिस्म ऐंठने लगा। मेरी साँसें उखड़ रही थीं। मैं अब और इंतजार नहीं कर सकती थी।
मैंने उसे खींचकर ऊपर किया। उसकी पैंट और मेरी पेटीकोट, दोनों ही हमारे बीच की अंतिम बाधा थीं। हमने एक साथ उन्हें हटाया। उसका मजबूत लिंग मेरे सामने तनकर खड़ा था, जैसे मुझे पुकार रहा हो। मैंने उसे अपनी हथेलियों में लिया, उसकी गर्मी महसूस की और उसे अपनी योनि के द्वार पर लगाया। “अब और नहीं रुक सकती, राजेश,” मैंने हाँफते हुए कहा।
उसने एक ही झटके में मुझे अपने अंदर समा लिया। एक तीव्र दर्द के साथ एक गहरा आनंद मेरे पूरे वजूद में फैल गया। “आहह्हह…” मेरे मुँह से एक चीख निकली, और फिर मैं केवल आहें भर रही थी। उसने धीमी गति से धक्के देने शुरू किए, और मैं भी पूरी तरह से उसमें ढल गई। हमारी अधूरी प्रेम कहानी का रोमांचक अंत हर धक्के, हर स्पर्श में घुल रहा था। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की, पसीने से भीगे जिस्मों के टकराने की और मेरे सुख से भरी चीखों की आवाज़ें थीं।
उसने अपनी गति बढ़ाई। मैं अपनी टाँगों को उसकी कमर में कसे हुए थी, जैसे कभी उसे जाने नहीं दूँगी। हर धक्का मुझे और गहरा डुबो रहा था। हम एक-दूसरे में पूरी तरह से खो चुके थे। मेरे शरीर में एक ऐसी ऊर्जा भर गई थी जो कभी शांत नहीं होना चाहती थी। जब वो पल आया, मेरे पूरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ी, और मैं सुख के उस चरम पर पहुँच गई जहाँ से वापस आने का मन ही नहीं करता। राजेश भी कुछ ही पलों में मेरे अंदर ही चरम सुख को प्राप्त हुआ।
हम दोनों पसीने से लथपथ, हाँफते हुए एक-दूसरे से लिपटे रहे। उसकी बाँहों में मुझे एक ऐसी शांति मिली थी, जो मैंने कभी महसूस नहीं की थी। हमारी अधूरी प्रेम कहानी का यह रोमांचक अंत, हर कल्पना से परे था। उस दिन, गाँव के उस पुराने घर में, हमने सिर्फ अपने जिस्मों को ही नहीं मिलाया था, बल्कि अपनी रूठी हुई आत्माओं को भी एक किया था। यह अंत था या एक नई शुरुआत, मैं नहीं जानती थी, पर यह सबसे संतोषजनक एहसास था जो मैंने कभी अनुभव किया था।
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