कमरे में फैली मंद रौशनी और इत्र की मादक खुशबू ने ऋतु के भीतर की सुलगती आग को और भड़का दिया था। उसकी आँखें विक्रम की आँखों में मिलीं, जहाँ एक गहरा, आदिम निमंत्रण साफ झलक रहा था। ऋतु ने अपनी साड़ी का पल्लू सरकाया, उसकी उंगलियां जानबूझकर धीमे पड़ गईं, जैसे वह इस पल को लंबा खींचना चाहती हो। उसकी शादीशुदा जिंदगी में सबकुछ था – एक सम्मानजनक पति, एक खूबसूरत घर, समाज में इज्जत – सिवाय उस आग के, उस जुनून के, जो अब विक्रम की आँखों में दिख रहा था। यह अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत उसे कब तक घेरे रखती? शायद अब और नहीं।
विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया, उसके मजबूत हाथ ऋतु की कमर पर टिक गए, और उसने उसे अपनी ओर खींच लिया। ऋतु की साँसें उसके करीब आते ही तेज हो गईं। उनके होंठ मिले, एक दूसरे में गुम होने को बेताब। विक्रम के होंठ ऋतु के नरम होंठों को ऐसे चूम रहे थे जैसे बरसों से प्यासा कोई रेगिस्तानी मुसाफिर पानी को तरसा हो। ऋतु ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके हाथों ने विक्रम की गर्दन को जकड़ लिया, और वह इस अथाह गहराई में डूबती चली गई। हर चुम्बन के साथ, उसके भीतर एक नई प्यास जग रही थी, एक ऐसी प्यास जिसे उसका पति कभी बुझा नहीं पाया था।
कपड़े एक-एक करके फर्श पर गिर रहे थे, हर परत के साथ वासना की गर्माहट बढ़ती जा रही थी। पहले साड़ी, फिर ब्लाउज, उसके बाद पेटीकोट। ऋतु का कसा हुआ बदन अब विक्रम की आँखों के सामने था, हर उभार, हर ढलान उसे निमंत्रण दे रहा था। विक्रम की आँखें उसकी गोरी त्वचा पर, उसकी सुडौल कमर पर, और उसके गोल-मटोल स्तनों पर ठहर गईं। उसने झुककर ऋतु की नाभि पर एक गरम चुम्बन दिया, जिससे ऋतु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
विक्रम के हाथ उसके बदन पर ऐसे रेंग रहे थे जैसे कोई कलाकार अपनी सर्वोत्तम कृति को गढ़ रहा हो। वह धीरे-धीरे ऊपर चढ़े, ऋतु की छाती पर आकर टिके। ऋतु की साँसें तेज हो रही थीं, उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, गुलाबी निप्पल कड़े हो गए थे। विक्रम ने एक हाथ से उसके स्तनों को सहलाया, दूसरे से उसकी नाभि के नीचे की मुलायम जगह को टटोलने लगा। ऋतु की योनि अब विक्रम की उँगलियों का इंतजार कर रही थी, गीली, गरम और बेचैन। वह अपने होंठों से एक आह निकली, एक मीठी शिकायत, एक अनकही इच्छा।
विक्रम ने समझ लिया। उसने धीरे से ऋतु को उठाया और बिस्तर पर लेटाया। ऋतु की आँखें अब लाल थीं, वासना से भरी। जब विक्रम उसके ऊपर झुका, तो ऋतु ने अपनी टाँगें फैलाईं, उसे अपने अंदर समाने को आतुर। उनका मिलन हुआ, धीरे-धीरे, फिर तेज रफ्तार में। हर धक्के के साथ एक गहरा सुख पूरी नस-नस में दौड़ रहा था। ऋतु ने अपनी पीठ उठाई, विक्रम को और गहराई तक लेने के लिए। उसकी हर छुअन में ऋतु को अपनी अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत पूरी होती महसूस हो रही थी। वह चिल्लाई, विक्रम का नाम उसके होंठों से निकला, एक दर्द भरी खुशी के साथ।
उनके बदन पसीने से भीगे थे, बिस्तर की चादरें सिकुड़ चुकी थीं, पर उनकी आत्माएं अब शांत और संतुष्ट थीं। ऋतु ने अपनी आँखें खोलीं और विक्रम की आँखों में देखा। उन आँखों में सिर्फ वासना नहीं, बल्कि एक गहरी समझ थी, एक मौन स्वीकृति कि उन्होंने एक दूसरे को वह दिया था जिसकी उन्हें सालों से तलाश थी। आज रात ऋतु ने जाना कि अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि एक ज्वलंत हकीकत थी जिसे उसने आज जिया था। यह रात उसकी देह और आत्मा पर विक्रम की मुहर लगा गई थी, एक ऐसी मुहर जो शायद कभी मिटेगी नहीं, और अब ऋतु को पता था कि वह इस चाहत के लिए बार-बार लौट आएगी।
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