पति के जाते ही प्रिया की अतृप्त देह ने एक अजीब सी बेचैनी महसूस की। दोपहर की सुस्त धूप घर के रोशनदानों से होकर आ रही थी, और कमरे में एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। इस खामोशी में प्रिया को अपनी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** की गूँज साफ सुनाई दे रही थी। पति के साथ सब कुछ था, घर, पैसा, समाज में इज्जत, पर न जाने क्यों उसकी रूह और उसका बदन हमेशा कुछ और माँगता था। एक ऐसी तपिश, एक ऐसी गहराई जो उसे कभी मिली ही नहीं।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। प्रिया ने साड़ी के पल्लू को थोड़ा ठीक किया और दरवाजा खोला। सामने विक्रम खड़ा था, पड़ोस में ही रहने वाला, अक्सर पति के साथ बैठता-उठता था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो प्रिया ने पहले कभी गौर नहीं की थी। “प्रिया जी, वो सुरेश भाई ने कहा था, कुछ कागज़…” विक्रम ने कहा, पर उसकी निगाहें प्रिया के खुले गले पर ठहर गई थीं, जहाँ से पसीने की बूंदें सरक रही थीं।
प्रिया ने उसे अंदर आने को कहा। “आइए, विक्रम जी। सुरेश जी तो अभी गए हैं, कागज़ कहाँ रख गए वो?” उसने पूछा, पर उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हिचकिचाहट थी। विक्रम अंदर आया और सोफे पर बैठ गया। उसकी आँखें कमरे में घूम रही थीं, और फिर वापस प्रिया पर टिक गईं। “नहीं, प्रिया जी, वो तो मैंने वैसे ही कहा… बस, सोचा कि कुछ देर बैठूँ, घर पर अकेला ही था।” उसकी बातों में साफ न्योता था।
कमरे में तनाव और उत्तेजना का मिश्रण था। प्रिया ने पानी का गिलास बढ़ाया, विक्रम ने जानबूझकर उसके हाथों को छू लिया। एक बिजली सी दौड़ गई प्रिया के बदन में। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने सोफ़े से थोड़ा दूर हटने की कोशिश की, पर उसकी इच्छाशक्ति कम पड़ रही थी। विक्रम की आँखों में वासना की आग साफ दिख रही थी, और प्रिया के भीतर की दबी आग भी भड़क उठी थी।
“प्रिया जी,” विक्रम की आवाज़ अब और गहरी थी, “आपके चेहरे पर आज एक अजीब सी उदासी दिख रही है। क्या बात है?” उसने धीरे से पूछा, और अपना हाथ प्रिया की साड़ी के पल्लू पर रख दिया। प्रिया का बदन काँप उठा। यह स्पर्श, यह नज़दीकी, यह वो था जिसकी उसे बरसों से कमी महसूस हो रही थी। उसकी आँखें बंद हो गईं, और उसने खुद को विक्रम के हवाले कर दिया।
विक्रम ने धीरे से प्रिया का पल्लू सरका दिया। प्रिया की साँसें अब पूरी तरह बेकाबू थीं। विक्रम उसके करीब आया और उसके होठों को अपने होठों में भर लिया। यह कोई साधारण चुंबन नहीं था, यह प्यास बुझाने वाला, आत्मा को झकझोरने वाला चुंबन था। प्रिया ने अपनी आँखें खोलीं और उसे विक्रम की आँखों में वही **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** दिखी जो उसके भीतर भी जल रही थी।
उसके हाथ विक्रम की पीठ पर फिसल गए। उसने उसे और करीब खींच लिया। विक्रम ने प्रिया को अपनी बाहों में उठा लिया और बेडरूम की तरफ बढ़ने लगा। बिस्तर पर पहुँचते ही उसने प्रिया को धीरे से लिटा दिया। अब कोई शर्म, कोई झिझक नहीं थी। प्रिया के भीतर का जानवर जाग उठा था, जो इस पल का बरसों से इंतजार कर रहा था। विक्रम ने उसकी साड़ी उतारी, फिर ब्लाउज और पेटीकोट भी। प्रिया अब उसके सामने सिर्फ अपनी वासना से ढकी थी।
विक्रम की उंगलियाँ प्रिया के जिस्म पर एक नई कहानी लिख रही थीं। उसके होंठ उसकी गर्दन से होते हुए उसके स्तनों तक पहुँचे। प्रिया की चीखें एक मीठी पुकार में बदल गईं। “विक्रम… और… और…” वह हाँफते हुए बोली। विक्रम ने उसे अपनी बाहों में कस लिया, और फिर उन दोनों के बदन एक-दूसरे में समा गए। हर स्पर्श, हर धड़कन, हर आह उस अधूरीपन को मिटा रही थी जिसे प्रिया ने इतने साल झेला था।
उसकी रग-रग में एक नया जीवन दौड़ रहा था। विक्रम ने उसे उस ऊंचाई पर पहुँचा दिया, जहाँ से वह कभी लौटना नहीं चाहती थी। उनकी साँसें एक-दूसरे में घुलमिल गईं, और बदन पसीने में भीगे हुए एक होकर काँप रहे थे।
जब सब शांत हुआ, प्रिया विक्रम की बाहों में पड़ी थी, उसकी आँखों में तृप्ति के आँसू थे। उसने आज जाना था कि **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** सिर्फ एक चाहत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी हकीकत थी जिसे अब उसे हर पल जीना था। वह जानती थी कि यह गलत था, पर उसके बदन और रूह को मिली इस संतुष्टि के आगे दुनिया की कोई भी बात छोटी लग रही थी। यह उस प्यास की बुझाई थी, जिसने उसे बरसों तड़पाया था, और आज वह पूरी तरह से शांत थी।
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