दोपहर की सुनहरी धूप, और मैं अपने बिस्तर पर अकेली लेटी, अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत में जल रही थी। सुरेश, मेरा पति, ऑफिस में व्यस्त था, और मैं यहाँ घर की चारदीवारी में कैद, अपनी जवान देह की बेकाबू इच्छाओं से जूझ रही थी। कितनी रातें सूखी बीत जातीं, कितना कुछ अनकहा रह जाता। मेरे जिस्म को एक ऐसी आग की तलाश थी जो उसे पूरी तरह जलाकर राख कर दे और फिर से नवजीवन दे।
पिछले कुछ दिनों से मेरी आँखें रवि पर टिकने लगी थीं, जो हमारे पड़ोस में नया आया था। उसकी मजबूत कद-काठी, आँखों में एक शरारती चमक और होंठों पर हमेशा एक हल्की मुस्कान, मुझे बेचैन कर देती थी। आज सुबह जब मैं आँगन में तुलसी को पानी दे रही थी, तो उसने मुझे देखकर मुस्कुराया। उस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मेरे भीतर की दबी हुई आग को और भड़का गया।
कुछ देर बाद, दरवाज़े पर हलकी-सी दस्तक हुई। मेरा दिल ज़ोर से धड़का। रवि! मैंने सोचा था कि वह कुछ पूछने आया होगा। दरवाज़ा खोला तो वह ही था, हाथ में एक प्लेट लिए, “भाभी जी, पूड़ी बनाई हैं, सोचा आपको भी चखा दूँ।” उसकी आवाज़ शहद-सी मीठी थी। मैंने उसे अंदर आने को कहा। सोफे पर बैठते ही हमारी नज़रें टकराईं। इस बार उसकी आँखों में सिर्फ शरारत नहीं, एक गहरी चाहत भी थी।
“अकेली हो भाभी जी?” उसने पूछा, उसकी आवाज़ अब थोड़ी धीमी थी।
“हाँ, सुरेश जी तो ऑफिस गए हैं।” मैंने कहा, मेरी आवाज़ भी काँप रही थी।
एक पल का मौन छाया, जिसमें कई अनकहे पैगाम थे। रवि अपनी जगह से उठा और धीरे-धीरे मेरे करीब आया। मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू हो गईं। मेरी साँसें तेज़ हो गईं। उसने धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका स्पर्श बिजली की तरह मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया।
“भाभी जी, आपकी आँखों में कुछ और ही लिखा है… आपकी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** मुझ तक पहुँच रही है,” उसने फुसफुसाते हुए कहा, और मेरा दूसरा कंधा भी थाम लिया।
मैं कुछ बोल न सकी, बस उसकी आँखों में डूबी रही। उसकी उंगलियाँ मेरे ब्लाउज के किनारे को छूती हुई मेरी त्वचा पर सरक गईं। मैं काँप उठी। उसने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया। हमारे होंठ मिले, और यह कोई साधारण चुंबन नहीं था। यह एक भूखे भेड़िये का शिकार पर झपटने जैसा था, जिसमें सालों की प्यास और बेताबियाँ घुली हुई थीं। उसके होंठ मेरे होंठों को निगल रहे थे, और मेरी ज़ुबान उसके मुँह में अपनी जगह तलाश रही थी।
उसके हाथों ने मेरे कमर को कसकर पकड़ा और मुझे और करीब खींच लिया। मेरे स्तनों पर उसकी मजबूत छाती का दबाव मुझे एक अजीब सुख दे रहा था। मेरा पल्लू कब सरक गया, पता ही नहीं चला। उसने मेरे ब्लाउज के हुक खोल दिए और मेरी साड़ी को ज़मीन पर गिरा दिया। मैं अब सिर्फ पेटीकोट और ब्रा में थी। उसकी आँखें मेरे उभारों पर टिक गईं। उसने एक हाथ से मेरी ब्रा उतार दी और मेरे नग्न स्तनों को अपनी हथेलियों में भर लिया। “तुम कितनी हसीन हो, सपना,” उसकी आवाज़ उत्तेजना से भरी थी।
उसने मुझे गोद में उठाया और सीधे बेडरूम में ले गया। मुझे बिस्तर पर लिटाते ही वह मेरे ऊपर झुक गया। उसके गर्म होंठ मेरे गालों से होते हुए गर्दन पर, फिर छाती पर उतर आए। वह मेरे निप्पलों को अपनी ज़ुबान से सहला रहा था, कभी धीरे से चूसता, कभी हल्के से काटता, और मैं आहों में डूब रही थी। मेरे जिस्म का हर एक अंग जाग उठा था। मेरी पेंटियां गीली हो चुकी थीं। मैं अपनी टांगें उसके इर्द-गिर्द कस चुकी थी।
रवि ने अपने कपड़े उतारे। उसका बलिष्ठ शरीर मेरे सामने था। उसने धीरे-धीरे मेरे पेटीकोट को भी उतार दिया। अब हम दोनों नग्न थे, एक-दूसरे की चाहत में जलते हुए। उसने मेरे पैरों को फैलाया और मेरे भीतर समा गया। एक पल का तीखा दर्द, और फिर एक अद्भुत सुख की लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। मैं कसकर उससे लिपट गई। मेरी चीख उसके होंठों में दब गई।
वह एक लय में हिल रहा था, और मैं उसके हर वार के साथ ऊपर उठ रही थी। मेरी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** आज पूरी हो रही थी। उसकी हर धड़कन, हर स्पर्श मुझे स्वर्ग का अनुभव करा रहा था। हम दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। मेरी रूह और जिस्म दोनों तड़प रहे थे, और उसके हर झटके के साथ मुझे एक नई पहचान मिल रही थी। कमरे में सिर्फ हमारी आहों, सिसकियों और जिस्मों के टकराने की आवाज़ें गूँज रही थीं।
एक तूफानी लहर-सा चरमसुख मुझे अपने आगोश में ले गया। मैं काँप उठी, और रवि ने भी मेरे ऊपर ही अपनी सारी चाहत उड़ेल दी। हम दोनों पसीने से तर-बतर, एक-दूसरे की बाहों में निढाल पड़े थे। मेरी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। शायद यह सिर्फ एक शुरुआत थी, उस अनदेखी, अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत को पूरा करने की, जिसे मैंने आज रवि के साथ पाया था। बाहर धूप अब भी सुनहरी थी, पर मेरे भीतर एक नया सूरज उग चुका था।
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