सुनीता की सूनी शामें अब पड़ोसी रवि की बाहों में करवट बदल रही थीं। उसका पति, रमेश, अक्सर व्यापार के सिलसिले में बाहर रहता, और जब घर पर होता भी, तो उसकी सारी ऊर्जा ऑफिस के कागज़ों और व्यापारिक सौदों में ही खप जाती। सुनीता, एक तीस साल की जवान, ख़ूबसूरत औरत, घर की चारदीवारी में अपनी अधूरी वासनाओं और कुँवारी इच्छाओं के साथ घुट रही थी। उसकी भरी-पूरी देह, गोरा रंग, और गहरी आँखें किसी भी मर्द का ध्यान खींचने के लिए काफ़ी थीं, पर रमेश की आँखों में बस उदासीनता थी।
रवि, उनके सामने वाले घर में रहने वाला, तीस के क़रीब का नौजवान था। उसकी मर्दाना चाल, चौड़े कंधे और आँखों में एक ऐसी शरारत भरी चमक थी, जो सुनीता को अंदर तक छू जाती थी। शुरू में तो यह सिर्फ़ एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराना या नमस्ते कहना ही था, पर धीरे-धीरे उनकी आँखें कुछ और ही कहने लगीं। एक दिन जब सुनीता बालकनी में कपड़े सुखा रही थी और उसकी साड़ी का पल्लू सरक कर उसके वक्षों की हल्की झलक दिखा रहा था, रवि ने अपनी आवाज़ में शहद घोलकर कहा, “भाभी, आज मौसम भी कितना मदहोश करने वाला है, है ना?” उसकी नज़रें सुनीता के झुके हुए बदन पर थीं, और सुनीता ने शर्म से पलकें झुका लीं, पर उसके दिल की धड़कन बढ़ चुकी थी। यह शुरुआत थी उस रोमांचक अध्याय की जिसे लोग **शादीशुदा औरत का पराये मर्द से अफेयर** कहते हैं।
कुछ ही दिनों में, उनकी चोरी-छिपे मुलाक़ातें शुरू हो गईं। कभी बहाने से रवि उसके घर आ जाता, कभी सुनीता अपनी छत पर रवि को देखने के बहाने निकल आती। एक शाम, जब रमेश शहर से बाहर था, रवि बिना किसी बहाने के सुनीता के दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ। सुनीता ने दरवाज़ा खोला, तो रवि ने बिना कुछ कहे, बस उसकी आँखों में देखा। उन आँखों में प्यास थी, इंतज़ार था, और एक अनकही चाहत थी। सुनीता ने उसे अंदर आने का इशारा किया और दरवाज़ा बंद कर लिया। कमरे में आते ही रवि ने सुनीता की कलाई पकड़ी और उसे अपनी ओर खींच लिया। सुनीता का बदन काँप गया, पर वह हटी नहीं। रवि ने धीरे से उसका चेहरा ऊपर उठाया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह कोई साधारण चुंबन नहीं था, बल्कि दो प्यासे शरीरों की मिलन की तीव्र इच्छा का इज़हार था। सुनीता भी मदहोश हो गई और पूरे जोश से उसका साथ देने लगी।
रवि के हाथ सुनीता की कमर से होते हुए उसकी साड़ी के पल्लू में घुस गए और उसने साड़ी को धीरे-धीरे उसकी कमर से सरका दिया। सुनीता ने खुद को उसके हवाले कर दिया था। रवि के लब उसके गले से होते हुए, उसके भरे हुए वक्षों पर उतर आए। रवि ने ब्लाउज़ के हुक खोल दिए और सुनीता के गुलाबी निप्पल को अपने मुँह में भर लिया, उन्हें चूसने लगा, जैसे कोई प्यासा बच्चा अपनी माँ का दूध पीता है। सुनीता दर्द और मज़े के मिले-जुले अहसास से सिसक उठी, “आह… रवि… बस…” रवि ने उसकी पैंटी भी नीचे सरका दी और अपनी उँगलियों से उसकी भीगी हुई योनि को सहलाने लगा। सुनीता की आहें अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं। रवि ने अपने कपड़े उतारे, उसका सुदृढ़ लिंग अब सुनीता के सामने अपनी पूरी मर्दानगी में खड़ा था।
रवि ने सुनीता को उठाया और उसे पलंग पर लिटा दिया। सुनीता की आँखें बंद थीं, उसका पूरा बदन सिहर रहा था। रवि ने धीरे-धीरे अपने लिंग को सुनीता की योनि के द्वार पर रखा और एक हल्के झटके के साथ अंदर धकेल दिया। सुनीता की चीख़ निकल गई, “उफ़…” पर यह दर्द से ज़्यादा तीव्र आनंद की थी। रवि ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के के साथ सुनीता को लग रहा था, जैसे उसकी आत्मा को वो चरम सुख मिल रहा हो जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। रवि ने अपनी गति बढ़ाई, और सुनीता भी अपनी कमर उठा-उठा कर उसका साथ देने लगी। उनके शरीर एक-दूसरे में ऐसे समा गए थे, जैसे सदियों से एक-दूसरे का इंतज़ार कर रहे हों। रवि का हर स्पर्श उसे याद दिलाता था कि एक **शादीशुदा औरत का पराये मर्द से अफेयर** कितना मीठा और नशीला हो सकता है।
दोनों एक-दूसरे में खोए हुए थे, उनकी साँसें तेज़ हो चुकी थीं, उनके बदन पसीने से भीग चुके थे। कुछ ही पलों में, दोनों एक साथ चरम सुख की गहराइयों में डूब गए। सुनीता ने अपनी बाहों में रवि को कस कर जकड़ लिया, जैसे उसे कभी जाने ही नहीं देगी। रवि ने उसके माथे पर चूमते हुए कहा, “सुनीता, तुम इतनी ख़ूबसूरत हो।” सुनीता मुस्कुराई, उसकी आँखों में संतुष्टि और एक नई चमक थी। वह जानती थी कि यह ग़लत है, पर इस प्रेम, इस स्पर्श ने उसे फिर से ज़िंदा कर दिया था। आज सुनीता पूरी तरह जान चुकी थी कि **शादीशुदा औरत का पराये मर्द से अफेयर** सिर्फ़ एक धोखा नहीं, बल्कि कभी-कभी एक औरत की अधूरी प्यास बुझाने का ज़रिया भी होता है। उनकी रातें अब अक्सर इसी तरह रंगीन होने लगी थीं।
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