गाँव की सुनसान पगडंडी पर राधा के पायल की छनछनहट रात के सन्नाटे को और गहरा कर रही थी, पर उसके भीतर की अग्नि उस सन्नाटे से कहीं अधिक तीव्र थी। अमावस की रात थी, चाँद का नामोनिशान नहीं। बस दूर टिमटिमाते तारों की क्षीण रोशनी में, राधा का युवा बदन किसी अनजाने रोमांच की तलाश में आगे बढ़ रहा था। वह अपनी बुआ के घर से लौट रही थी, पर आज उसके कदम कुछ अधिक भारी और कुछ अधिक उत्साहित थे। उसे पता था कि इस अकेली लड़की का रात का सफर उसे उस सीमा तक ले जा रहा था, जहाँ से वापसी नहीं थी।
जैसे ही उसने आम के बाग से सटी सकरी गली में प्रवेश किया, एक घनी काली परछाई रास्ते के बीचो-बीच उभर आई। राधा का दिल धक से रह गया। “कौन है?” उसकी आवाज़ में घबराहट थी, पर आँखों में एक अजीब सी चमक।
“शांत हो जा, राधा। मैं ही हूँ।” जानी-पहचानी, भरी हुई आवाज़ सुनकर उसके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। यह गोपाल था, गाँव का सबसे हट्टा-कट्टा, जिसकी मर्दाना छवि ने ना जाने कितनी रातों तक राधा को बेचैन रखा था।
गोपाल आगे बढ़ा। उसकी आँखें अँधेरे में भी चमक रही थीं। राधा को याद आया, किस तरह दोपहर में नदी किनारे उसने गोपाल को नहाते हुए देखा था, और कैसे उसके मजबूत बदन की कल्पना ने उसे दिन भर तड़पाया था।
“तुम… यहाँ क्या कर रहे हो?” राधा की आवाज़ अब कांप रही थी, पर वह पीछे नहीं हटी।
“तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था,” गोपाल ने सीधा जवाब दिया, और एक पल में ही राधा के पास पहुँचकर उसका हाथ थाम लिया। उसकी खुरदुरी उँगलियों का स्पर्श पाकर राधा का पूरा शरीर बिजली के झटके से काँप उठा।
गोपाल ने उसे अपनी ओर खींचा। राधा का नाजुक बदन उसके मजबूत सीने से जा टकराया। उसके साँसों की गरमाहट राधा के चेहरे पर महसूस हुई। बिना एक शब्द कहे, गोपाल ने राधा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
यह कोई साधारण चुम्बन नहीं था। यह अँधेरी रात की कामुक पुकार थी, जो राधा ने बरसों से अपने भीतर दबा रखी थी। गोपाल के होंठों ने राधा के होंठों को ऐसे चूसा, जैसे कोई प्यासा बरसों से पानी न पीया हो। राधा ने विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी बाँहें गोपाल की गर्दन के इर्द-गिर्द लिपट गईं और वह इस मदहोशी में डूबती चली गई। गोपाल के एक हाथ ने उसकी पतली कमर को जकड़ लिया, जबकि दूसरा हाथ धीरे-धीरे उसकी पीठ पर ऊपर की ओर सरकता हुआ उसके ब्लाउज के भीतर जा घुसा।
“उफ्फ्फ…” राधा के मुँह से दबी हुई आह निकली, जब गोपाल की उंगलियों ने उसके गरम, भरे हुए वक्ष पर स्पर्श किया। उसके निप्पल कड़े हो गए थे, और वे गोपाल की उंगलियों के स्पर्श के लिए तड़प रहे थे। गोपाल ने उसे एकटक देखा, उसकी आँखों में वासना की गहरी चमक थी। उसने राधा को धीरे से जमीन पर लिटाया। सूखी पत्तियां और मिटटी उसके बदन के नीचे नरम बिस्तर सी बिछ गईं। गाँव की धूल में सनी उसकी साड़ी का पल्लू कब सरक गया, उसे पता भी नहीं चला।
गोपाल ने उसके ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके, और हर बटन के खुलने के साथ राधा का दिल और तेज़ धड़कने लगा। ब्लाउज हटाते ही, उसके गोल, सुडौल उरोज अँधेरे में भी अपनी चमक बिखेर रहे थे। गोपाल ने उनके ऊपर झुककर, अपनी गर्म सांसों से उन्हें सहलाया, फिर एक को मुँह में भर लिया। राधा के मुँह से चीख निकल जाती, अगर गोपाल के होंठ उसके गर्दन पर ना होते। वह मदहोशी में सिसकती रही, अपनी कमर को ऊपर उछालते हुए गोपाल के स्पर्श का और अधिक आनंद ले रही थी।
उसने धीरे-धीरे राधा की साड़ी और पेटीकोट भी सरका दिए। राधा अब पूर्णतः नग्न थी, चांदनी में उसकी कामुक देह किसी देवी की प्रतिमा सी लग रही थी। गोपाल की आँखें उसके हर वक्र पर ठहर गईं, उसकी कामुक भूख और भी बढ़ गई। उसने राधा के पैरों के बीच जगह बनाई। राधा की जांघें अपने आप चौड़ी हो गईं, जैसे वे इस क्षण का ही इंतज़ार कर रही थीं। गोपाल ने एक हाथ से उसके अंतरंग अंगों को सहलाना शुरू किया। राधा के शरीर में जैसे आग लग गई। उसकी हर नस में झुनझुनी दौड़ गई, और वह पूरी तरह से गोपाल के अधीन हो गई।
“गोपाल…” उसने फुसफुसाया, उसकी साँसें तेज हो रही थीं।
गोपाल ने एक क्षण के लिए खुद को रोका, राधा की आँखों में देखा। उसकी आँखें प्यास से भरी थीं। उसने अपनी पैंट खोली, और राधा ने उसके मजबूत, उत्तेजित लिंग को देखा। अँधेरे में भी, उसकी ताकत साफ झलक रही थी।
बिना और देर किए, गोपाल ने खुद को राधा पर झुकाया और एक गहरी धक्के के साथ उसके भीतर प्रवेश कर गया। राधा के मुँह से एक तीव्र चीख निकली, जो तुरंत ही उसके होंठों में दब गई। दर्द और आनंद का यह अद्भुत मिश्रण उसे एक साथ झकझोर गया।
गोपाल की हर धड़कन, हर धक्के के साथ राधा और गहराइयों में डूबती गई। उसके शरीर का हर अंग गोपाल के साथ तालमेल बिठा रहा था। उनकी साँसों की आवाज़, उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और राधा की मदहोश कर देने वाली सिसकियाँ उस रात के सन्नाटे को चीर रही थीं। पसीने की बूंदें उनके बदन से टपक रही थीं, पर उन्हें किसी बात की सुध नहीं थी। इस अकेली लड़की का रात का सफर अब एक ज्वलंत आग में बदल चुका था। जब दोनों का शरीर शिथिल होकर एक-दूसरे में सिमट गया, तब भी उनके होंठ अलग नहीं हुए थे।
सुबह की पहली किरण फूटने से पहले, राधा ने महसूस किया कि इस अकेली लड़की का रात का सफर सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि अपने ही भीतर की सबसे गहरी कामुक इच्छाओं की खोज थी, जो आज पूरी तरह से संतुष्ट हो चुकी थी। गोपाल ने उसे कसकर अपनी बाहों में भरा और एक गहरी साँस ली। राधा ने उसके सीने पर अपना सर रखा, अपने बदन में फैली शांति और पूर्णता को महसूस करते हुए। यह रात उसके जीवन की सबसे यादगार, सबसे कामुक रात बन गई थी।
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