अकेली लड़की का रात का सफर: देह की प्यास, रूह का मिलन

रीना की साँसें तेज़ हो रही थीं, जब आधी रात को उसने अपने बदन में एक अजीब सी तड़प महसूस की। कमरे की घुटन और बिस्तर की खामोशी उसे काटने को दौड़ रही थी। उसकी आँखें बंद करते ही विजय का चेहरा उभर आता, उसके मज़बूत हाथ, उसकी गरम साँसें, और उसके अधरों की वो बेकरारी जो सिर्फ़ रीना के लिए थी। आज की रात सिर्फ़ करवटें बदल कर नहीं कटने वाली थी, ये रीना जानती थी। उसके जिस्म की हर नस, हर बूँद पुकार रही थी उस मिलन को जो उसे इस रात के सन्नाटे में ही मिल सकता था।

हिम्मत जुटाकर, रीना ने धीरे से दरवाज़ा खोला। ठंडी हवा का एक झोंका उसके खुले बालों से टकराया और एक सिहरन उसके जिस्म में दौड़ गई। आज वह अपने “अकेली लड़की का रात का सफर” पर निकल रही थी, एक ऐसा सफर जिसकी मंज़िल सिर्फ़ विजय की बाहें थीं। गाँव की पगडंडी सुनसान थी, चाँदनी रात में पेड़ों की परछाइयाँ अजीब सी लग रही थीं, पर रीना के कदमों में कोई डर नहीं, सिर्फ़ एक जुनून था। उसकी धड़कनें तेज़ी से दौड़ रही थीं, हर कदम उसे विजय के और करीब ले जा रहा था। उसे लगा कि यह सिर्फ़ एक रास्ता नहीं, यह उसकी अपनी कामनाओं का, उसकी हवस का सफर था, जो उसे उसकी आत्मा के दूसरे हिस्से तक ले जा रहा था।

विजय के घर की देहरी पर पहुँचते ही, उसकी साँसें अटक गईं। दरवाज़ा हल्का सा खुला था, जैसे उसका ही इंतज़ार हो। जैसे ही रीना ने अंदर कदम रखा, विजय ने उसे अपनी मज़बूत बाहों में भर लिया। उसकी गरम साँसों ने रीना के बदन को और दहका दिया। “कितना इंतज़ार करवाया तुमने, मेरी जान,” विजय ने फुसफुसाया, उसके लब रीना की गर्दन पर टिक गए।

उनके होंठ एक दूसरे से मिले, एक गहरी, बेकाबू चूमने में बदल गए। विजय के मज़बूत हाथ रीना की साड़ी में उलझ गए, और पलक झपकते ही वो ज़मीन पर सरक गई। रीना ने भी अपने हाथ विजय की गर्दन में डाल दिए, उसकी टी-शर्ट खींचते हुए। साड़ी कब गिरी, पेटीकोट कब एक तरफ हुआ, और ब्लाउज़ के बटन कब खुले, दोनों को पता ही न चला। दोनों के बदन एक दूसरे से लिपट गए, त्वचा से त्वचा का स्पर्श, हर स्पर्श बिजली की तरह। विजय के होंठ रीना की गर्दन से होते हुए उसके स्तनों तक पहुँच गए, जहाँ उसकी निप्पलें पहले से ही अकड़ी हुई थीं, इंतज़ार में। रीना की आहें कमरा भर रही थीं, “और… और तेज़…” वो फुसफुसाई, उसकी आँखें मदहोशी में बंद थीं, उसका बदन एक धधकती आग बन चुका था।

विजय ने रीना के पैरों को ऊपर उठाया, और फिर एक ही धक्के में उसने उस गहरी प्यास को बुझाना शुरू किया जिसकी चाहत में रीना ने यह “अकेली लड़की का रात का सफर” तय किया था। रीना के मुँह से एक मीठी सी चीख निकली, जो तुरंत ही विजय के होंठों में दब गई। उनकी कमरें एक दूसरे से टकराने लगीं, एक लयबद्ध, बेकाबू ताल में। पसीना टपक रहा था, कमरा उनकी आहों और गहरी साँसों से गूँज रहा था। रीना ने अपनी सारी ताकत विजय की पकड़ में छोड़ दी, उसके नाखूनों ने विजय की पीठ पर निशान बना दिए, और उसके होंठ विजय के कंधे को चूम रहे थे। हर धक्के के साथ, उनकी रूहें एक दूसरे में घुलती जा रही थीं।

कुछ देर बाद, दोनों के जिस्म एक तीव्र कंपन और एक तीव्र चीख के साथ शांत हुए। रीना विजय की बाहों में ढीली पड़ गई, उसकी साँसें अभी भी अनियमित थीं, पर उसके चेहरे पर एक गहरी, असीम संतुष्टि थी। उसने विजय की छाती पर सर रखा और मुस्कुराई। इस अकेली लड़की का रात का सफर ने उसे वो सब कुछ दिया था जिसकी उसके बदन को और रूह को प्यास थी। विजय ने उसे और कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जानते हुए कि उनकी रात अभी बहुत लंबी थी, और यह तो बस शुरुआत थी उस असीम सुख की जिसे उन्होंने अभी-अभी चखा था। उसकी आँखें बंद थीं, और उसने महसूस किया कि उसका तन-मन तृप्त हो चुका था, जैसे वर्षों की प्यास आज बुझ गई हो।

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