रात का अँधेरा घना होता जा रहा था, और रीना की साँसें तेज़। उसकी पतली साड़ी शरीर से चिपक कर उसके उभारों को और भी स्पष्ट कर रही थी। उसकी थरथराती हथेलियाँ एक अनजाने रोमांच की तलाश में थीं।
गाँव से थोड़ी दूर, जहाँ कच्ची सड़क जंगल की तरफ मुड़ती थी, रीना को आज फिर यह अकेली लड़की का रात का सफर अपनी नियति लग रहा था। पच्चीस साल की रीना की शादी को तीन साल हो गए थे, पर उसका बिस्तर हमेशा खाली ही रहा था। पति, सुरेश, दिल्ली में नौकरी करता था और छह-छह महीने में एक बार ही आता था, वो भी थका-हारा। रीना की जवान देह, उसकी दबी हुई इच्छाएँ, सब भीतर ही भीतर सुलग रही थीं। आज, वह उस आग को बुझाने निकली थी, चाहे इसका अंजाम कुछ भी हो। उसके पैरों में जैसे कोई अदृश्य शक्ति थी जो उसे इस अनसुनी राह पर धकेल रही थी।
हवा में एक अजीब सी ख़ुशबू थी, मिट्टी और रात की रानी की मिली-जुली महक, जो रीना के मन में उत्तेजना भर रही थी। जैसे ही वह गाँव की सीमा पार करके जंगल के रास्ते पर मुड़ी, उसकी नज़र सड़क किनारे खड़ी एक पुरानी जीप पर पड़ी। उसके पास ही एक अधेड़ उम्र का, गठा हुआ बदन वाला आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। उसका नाम राजेश था, वह गाँव के साहूकार का चौकीदार था। उसकी पैनी नज़रें रीना पर टिक गईं, जिनमें एक अजीब सी चमक थी।
रीना थोड़ी झिझकी, पर उसके भीतर की आग ने उसे आगे बढ़ने को कहा। “राम-राम भैया,” उसने हिचकिचाते हुए कहा।
“राम-राम बिटिया,” राजेश की आवाज़ में एक अजीब सी खुरदुरी मिठास थी। “इतनी रात को कहाँ जा रही हो अकेली?”
रीना ने एक पल सोचा, फिर अपनी आँखों में एक दबी हुई प्यास के साथ बोली, “मेरा घर दूर है, राह भटक गई हूँ।”
राजेश समझ गया। उसकी आँखों में एक नई चमक आई, जैसे उसने अपनी पसंद का शिकार देख लिया हो। “आओ, बैठो। यहाँ पास में एक छोटा सा ढाबा है, वहाँ तक छोड़ दूँगा।”
ढाबा तो बस एक बहाना था। जीप में बैठते ही राजेश का हाथ उसके घुटने पर आ गया। रीना सिहर उठी, पर उसने हाथ हटाया नहीं। उसके अंदर की वासना इस स्पर्श को स्वीकार कर रही थी। राजेश ने जीप को ढाबे की तरफ ले जाने के बजाय एक सुनसान खेत के रास्ते पर मोड़ दिया, जो एक टूटी हुई झोपड़ी की ओर जा रहा था। रीना ने कुछ कहा नहीं, बस उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं। वह जानती थी कि यह अकेली लड़की का रात का सफर अब वासना की राह पर मुड़ चुका था।
जीप एक पुराने, टूटे हुए झोपड़े के पास रुक गई। राजेश ने इंजन बंद किया और रीना की तरफ मुड़ा। उसकी आँखें अँधेरे में भी चमक रही थीं, जिनमें एक जंगली वासना साफ़ दिख रही थी।
“डर गई क्या?” राजेश ने पूछा, उसका हाथ रीना की कमर पर पहुँच चुका था और हल्के से सहला रहा था।
रीना ने ना में सिर हिलाया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और होंठ हल्के से खुले थे।
राजेश ने बिना कुछ कहे, उसकी साड़ी का पल्लू खींचा और उसे अपने नज़दीक कर लिया। उसकी हथेलियाँ रीना की कमर पर फिसलती हुई उसकी नंगी पीठ पर पहुँच गईं। रीना ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसकी देह एक अनजाने सुख के लिए तरस रही थी।
राजेश ने रीना के होठों को अपने होठों में भर लिया। एक जंगली, बेताब चुंबन। रीना ने भी पूरी शिद्दत से उसका साथ दिया, अपने सूखे होठों को राजेश के होठों पर रगड़ा। उसकी हथेलियाँ राजेश के मजबूत कंधों पर थीं, जो उसकी शर्ट के भीतर से उसकी मांसलता महसूस कर रही थीं। राजेश ने रीना की साड़ी को एक झटके में उसके बदन से अलग कर दिया। अब वह सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में थी, जिसके भीतर से उसके उठे हुए स्तन साफ दिख रहे थे। राजेश की आँखें वासना से भर गईं।
उसने रीना के ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके बटन खुले और रीना के गोरे, भरे हुए स्तन उसकी आँखों के सामने आ गए, जिनके निप्पल उत्तेजना में कड़े हो गए थे। राजेश ने बिना देर किए एक स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा, जैसे कोई भूखा बच्चा दूध पी रहा हो। रीना के मुँह से एक दबी हुई आह निकली। उसकी उंगलियाँ राजेश के बालों में उलझ गईं। वह अपनी कमर को राजेश के मुँह की तरफ धकेल रही थी, ताकि उसे और गहरा सुख मिल सके।
राजेश ने दूसरे स्तन को भी नहीं बख्शा। फिर उसकी जीभ रीना के पेट पर फिसलती हुई नाभि तक पहुँची, उसे चाटते हुए। रीना की देह में जैसे बिजली दौड़ गई। वह अब बेताब हो चुकी थी। राजेश ने धीरे से उसका पेटीकोट भी उतार दिया। रीना अब पूरी तरह नग्न थी, अँधेरे में उसकी गोरी त्वचा चाँदनी में चमक रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, उसकी साँसें भारी थीं और उसके भीतर की आग अब ज्वालामुखी बन चुकी थी।
राजेश ने अपने कपड़े भी उतार दिए। अब दोनों झोपड़े के अंदर अँधेरे में नग्न थे। राजेश ने रीना को ज़मीन पर बिछा दिया, जो कि घास और कुछ कपड़ों से नरम थी। उसकी टांगों को फैलाया और उसकी जंघाओं के बीच अपनी उंगलियाँ दौड़ाईं। रीना का अंतरंग गीला हो चुका था, वासना से तप रहा था। राजेश ने अपनी जीभ से उसके अमृत द्वार को चाटना शुरू किया, गोल-गोल घुमाते हुए। रीना चीख पड़ी, “आह्ह्ह्ह… भैया…”
यह सुख असहनीय था। वह अपनी कमर को ऊपर उठा रही थी, राजेश के सिर को अपनी जंघाओं के बीच कस रही थी, एक अजीबोगरीब आनंद में खोई हुई।
जब रीना लगभग फटने को थी, राजेश ने अपनी जीभ हटा ली और अपने मजबूत, गरम लिंग को उसके द्वार पर टिका दिया। रीना की आँखें खुल गईं। उसने राजेश की आँखों में देखा, जहाँ सिर्फ वासना और अधिकार था। राजेश ने एक गहरा धक्का दिया और उसका लंबा, मोटा लिंग रीना के अंदर समा गया। “आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह… मर गई मैं…” रीना के मुँह से चीख निकल गई। दर्द और सुख का एक अजीब सा मिश्रण था यह, एक साथ दो विपरीत भावनाओं का ज्वार।
राजेश ने एक लयबद्ध तरीके से अपनी कमर चलाना शुरू किया। हर धक्के के साथ रीना की नस-नस में एक नई ऊर्जा दौड़ रही थी। उनकी देहें आपस में टकरा रही थीं, पसीने से भीग चुकी थीं। रीना अब दर्द भूल चुकी थी, वह सिर्फ सुख की गहराईयों में गोते लगा रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, होंठ खुले हुए थे, दबी हुई आहें उसके गले से निकल रही थीं। “तेज़… और तेज़… आह्ह्ह्ह… भैया… मुझे और चाहिए…”
कई धक्कों और गहरे प्रवेश के बाद, राजेश ने एक अंतिम ज़ोरदार धक्का दिया और रीना के अंदर ही खाली हो गया। रीना की देह भी काँप उठी और वह चरम सुख की अनुभूति के साथ निढाल हो गई। दोनों कुछ देर तक एक दूसरे से लिपटे हाँफते रहे, उनकी साँसें एक-दूसरे में घुलमिल रही थीं।
सुबह होने से पहले, राजेश ने रीना को वापस उसी जगह छोड़ दिया जहाँ से उसने उसे उठाया था। रीना की साड़ी अब अस्त-व्यस्त थी, पर उसके चेहरे पर एक अलग सी चमक थी, एक ऐसी संतुष्टि जो उसने कभी महसूस नहीं की थी। उसकी प्यास बुझ चुकी थी, उसकी रूह को शांति मिली थी। उसने राजेश की आँखों में कृतज्ञता और एक अजीब सा आकर्षण देखा। रीना ने अपनी आँखों में एक नई चमक के साथ सोचा, ‘यह अकेली लड़की का रात का सफर मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन सफर था। अब उसकी देह को पता था कि उसकी प्यास कैसे बुझाई जा सकती है।’ वह वापस गाँव की ओर चल दी, एक नई हिम्मत और एक गहरे राज़ के साथ, यह जानते हुए कि यह सफर शायद उसकी ज़िंदगी का आखिरी सफर नहीं था।
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