गर्मी की दुपहरी, सुनसान घर और कामिनी के जिस्म में उमड़ती आग… उसे आज कोई बुझाने वाला चाहिए था। उसके पति राजीव महीनों से व्यापार के सिलसिले में बाहर थे, और कामिनी की जवानी घर की चारदीवारी में घुटकर रह गई थी। बिस्तर पर लेटे-लेटे उसकी आँखें छत पर टिकी थीं, पर मन में भावनाओं का ज्वार उठ रहा था। उसके भीतर एक अजीब सी तड़प थी, एक सूखी प्यास जो उसे हर पल बेचैन कर रही थी। यह सचमुच एक तनहा औरत की प्यास बुझाने वाली कहानी बनने वाली थी, जिसकी हर करवट में एक अनकही हसरत छिपी थी।
तभी, दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। कामिनी ने चौंककर देखा। यह रोहन था, उसका देवर, जो शहर से कुछ दिनों के लिए आया था। उसकी आँखें कामिनी के सूखे होठों और उंगलियों से उलझे दुपट्टे पर टिक गईं। वह मुस्कुराया, “भाभी, सब ठीक है? आप इतनी उदास क्यों लग रही हैं?”
कामिनी ने एक गहरी साँस ली। रोहन की युवा आँखों में उसे कुछ ऐसा दिखा, जो राजीव की आँखों में सालों से नहीं दिखा था – ललक, चाहत। उसने हल्के से कहा, “बस… ऐसे ही। मन कुछ बेचैन सा है।”
रोहन धीरे-धीरे उसके करीब आया और बिस्तर के किनारे बैठ गया। उसके हाथ अनायास ही कामिनी की बांह पर रख गए। कामिनी सिहर उठी। “भाभी, आप इतनी अकेली क्यों हैं?” उसकी आवाज़ में हमदर्दी थी, पर कामिनी ने उसमें कुछ और भी महसूस किया – एक आमंत्रित चुनौती।
कामिनी की आँखें नम हो गईं। उसने धीरे से कहा, “अकेली ही तो हूँ रोहन… बहुत अकेली।” उसकी आवाज़ में दबा हुआ दर्द और अनकही इच्छाएँ साफ झलक रही थीं। रोहन का हाथ उसकी बांह से फिसलकर कमर पर पहुँच गया। कामिनी ने अपने होठों को भींच लिया, पर उसे रोका नहीं। कमरे में अचानक गरमी बढ़ गई थी। पसीने की बूंदें कामिनी के माथे पर चमक उठीं।
“आज आपकी यह उदासी मैं दूर कर दूंगा, भाभी,” रोहन ने फुसफुसाते हुए कहा। उसके शब्दों में एक गहरा वादा था। उसने कामिनी को अपनी ओर खींचा और उसके सूखे होठों पर अपने होठ रख दिए। कामिनी पहले तो हिचकी, फिर उसकी सारी शिकायतें, सारी तन्हाई, उस एक चुंबन में घुल गई। उसने रोहन को कसकर जकड़ लिया, जैसे सदियों की प्यास बुझाने के लिए तड़प रही हो।
रोहन के हाथ अब कामिनी के ब्लाउज के हुकों पर थे। एक-एक करके हुक खुले और कामिनी के भारी स्तन आज़ाद हो गए। उसने अपने अधरों से कामिनी के गर्दन को सहलाना शुरू किया, फिर नीचे उतरते हुए उसके उभरे हुए निप्पलों को अपनी जीभ से छूना शुरू किया। कामिनी की आहें कमरे में गूँज उठीं। “आह… रोहन…!”
रोहन ने बिना देर किए कामिनी की साड़ी और पेटीकोट उतार फेंका। कामिनी की गोरी देह अब उसके सामने पूरी तरह नग्न थी। उसकी जाँघों के बीच की नमी रोहन को अपनी ओर खींच रही थी। रोहन ने अपने कपड़े भी उतार दिए, और कामिनी ने उसकी मर्दानगी को अपनी आँखों में समेट लिया। एक युवा, दृढ़ शरीर, जो उसकी प्यास बुझाने को बेताब था।
रोहन ने कामिनी को उठाया और उसे अपने ऊपर लिटा दिया। कामिनी ने अपनी टांगें उसके कमर के इर्द-गिर्द कस लीं। रोहन ने धीरे-धीरे अपने दृढ़ अंग को कामिनी की गीली योनि पर रखा। कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी साँस ली। वह तैयार थी, वर्षों से तैयार थी। रोहन ने एक गहरा धक्का दिया और कामिनी के भीतर प्रवेश कर गया।
“आहहहह…!” कामिनी की चीख खुशी और दर्द के मिश्रण से निकली। रोहन ने रुककर उसे सहलाया, उसके होठों को चूमा। फिर उसने लयबद्ध तरीके से धक्के लगाने शुरू किए। कामिनी भी अब पूरी तरह से साथ दे रही थी। उसकी कमर ऊपर उठ रही थी, उसके स्तन रोहन के सीने से रगड़ खा रहे थे। वह चिल्ला रही थी, “और… और तेज़… रोहन… आह्ह्ह्ह!”
रोहन ने अपनी गति और तेज़ कर दी। कमरे में उनके शरीरों की टक्कर से एक मादक संगीत पैदा हो रहा था। कामिनी के पैरों में, उसकी कमर में, उसके पेट में एक मीठी-सी टीस उठ रही थी, जो धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलती जा रही थी। वह अपनी आँखें बंद कर चरम सुख की ओर बढ़ रही थी। रोहन ने उसकी तनहा औरत की प्यास बुझाने वाली कहानी को अपनी मर्दानगी से पूरा कर दिया। एक अंतिम, गहरा धक्का और कामिनी का शरीर काँपने लगा। उसके मुँह से सिसकियाँ और आहें निकल रही थीं। वह पूरी तरह से निढाल होकर रोहन से चिपक गई।
कुछ देर बाद, जब उनके शरीर शांत हुए, कामिनी ने आँखें खोलीं। उसकी आँखों में अब उदासी नहीं थी, बल्कि एक गहरी तृप्ति और चमक थी। उसने रोहन के माथे पर चूमा और फुसफुसाते हुए कहा, “आज तुमने मुझे फिर से जीना सिखा दिया, रोहन।” कामिनी ने महसूस किया कि उसकी वर्षों पुरानी तनहा औरत की प्यास बुझाने वाली कहानी आखिरकार आज पूरी हो गई थी, और उसकी हर एक बूंद आज रोहन ने अपनी मर्दानगी से भर दी थी।
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