बंद दरवाज़ों के पीछे: ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान

उसकी निगाहें मेरे जिस्म पर ऐसे टिकती थीं, जैसे किसी प्यासे मुसाफ़िर को रेगिस्तान में पानी दिख जाए – और हर बार मेरे बदन में एक मीठी-सी सिहरन दौड़ जाती।

आदित्य, मेरा बॉस, और मैं, निशा, पिछले कुछ महीनों से इस आग में जल रहे थे, जिसे हम दोनों ने ही दफ़न कर रखा था। लेकिन कब तक? आज रात जब आखिरी सहयोगी भी ऑफिस से निकल चुका था, तो खामोश गलियारों में सिर्फ हमारी धड़कनों की गूँज थी। मैं अपनी डेस्क पर एक फाइल में उलझी थी, जब आदित्य मेरे करीब आया। उसकी साँसों की गर्म फुहार मेरी गर्दन पर पड़ी और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

“निशा, ये काम कल भी हो सकता है,” उसकी भारी आवाज़ मेरे कानों में गूँजी।

मैंने पलटकर देखा। उसकी आँखें लाल थीं, उनमें एक अजीब-सी चमक थी, जो मैं अच्छे से पहचानती थी – वासना की चमक।

“सर, बस थोड़ा सा…” मैंने आवाज़ में संयम लाने की कोशिश की, पर वो खुद ब खुद थरथराने लगी थी।

आदित्य ने धीरे से मेरी कुर्सी के हैंडल पर हाथ रखा और झुक गया। अब हमारी साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं। उसकी मर्दाना खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी।

“और कितना तड़पाओगी, निशा?” उसने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी उंगलियाँ मेरी बांह पर रेंगने लगीं।

एक पल के लिए मैं पत्थर हो गई। फिर मेरी आँखों ने भी उसकी आँखों में वही बेताबी देखी, जो मेरे भीतर मचल रही थी। मैंने चुपचाप अपनी गर्दन उसके होंठों की तरफ झुका दी।

एक पल की देरी किए बिना, उसने मेरे होंठों पर हमला कर दिया। ये कोई साधारण चुम्बन नहीं था, ये सालों की प्यास थी, दबे हुए अरमानों का सैलाब था। मेरे होंठ दर्द से सिहर उठे, फिर मदहोशी में डूब गए। उसकी जीभ मेरी जुबान से उलझ गई, एक गहरा, जोशीला चुम्बन। मेरी आँखें मुँद गईं और मेरा शरीर उसके हाथों में ढीला पड़ गया।

उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया, जैसे मैं कोई हल्की गुड़िया हूँ, और कॉन्फ्रेंस रूम की तरफ बढ़ चला। कमरे के दरवाज़े पर ‘मीटिंग इन प्रोग्रेस’ का बोर्ड लगा दिया गया और अंदर की सारी लाइटें बुझा दी गईं, सिर्फ बाहर की स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी शीशे से छनकर अंदर आ रही थी। उसने मुझे धीरे से कॉन्फ्रेंस टेबल पर बिठाया। मेरा कुर्ता पहले ही उसके हाथों में सिमट चुका था। उसकी उंगलियाँ मेरे पेट पर रेंगती हुई मेरी कमर तक पहुंचीं और मेरी साड़ी का पल्लू एक झटके में उसके हाथों से आज़ाद हो गया। मेरी साड़ी भी सरककर ज़मीन पर आ गिरी।

“तुम कितनी हसीन हो, निशा,” उसकी आवाज़ उत्तेजना से भरी थी।

मेरी ब्रा और पेटीकोट ही मेरा आखिरी कवच थे। उसने मेरी ब्रा के हुक को खोला और मेरे स्तन उसके हाथों में आ गए। मेरे जिस्म में एक ज़ोरदार सिहरन दौड़ गई। उसने मेरी छाती पर अपना मुँह रख दिया और मेरे निप्पलों को चूसा, जैसे कोई बच्चा माँ का दूध पी रहा हो। मेरी साँसें तेज़ हो गईं, मेरे होंठों से सिसकारियाँ निकलने लगीं। मेरा शरीर आग में तप रहा था। मैंने उसकी शर्ट के बटन खोले और उसकी चौड़ी छाती पर अपने नाखून गढ़ा दिए।

अब वो मेरे पेटीकोट को भी नीचे खींच चुका था। मैं पूरी तरह से नग्न उसके सामने थी। मेरे पैरों के बीच एक अजीब-सी सनसनाहट थी। आदित्य ने अपने कपड़े उतारे और मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी मर्दानगी तनी हुई, पूरी तरह तैयार थी। मैंने शरम से आँखें झुका लीं, पर मेरे भीतर की आग भड़क चुकी थी।

“आज तक जो दबी हुई थी, वो अब अपनी पहचान बनाएगी, निशा,” उसने कहा, “ये हमारी **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** है।”

उसने मुझे टेबल के किनारे पर किया और मेरे पैर फैला दिए। मेरी साँसें थम गईं। उसने धीरे-धीरे अपने पुरुषत्व को मेरे भीतर उतारा। एक पल को मुझे लगा जैसे मेरा जिस्म फट जाएगा, पर फिर एक मीठा-सा दर्द और उसके बाद अतुलनीय आनंद की लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई।

उसने लयबद्ध तरीके से मेरे भीतर आना-जाना शुरू किया। हर धक्के के साथ मेरे होंठों से चीखें निकल रही थीं, जो उसके चुम्बनों में दब जाती थीं। मेरी कमर मचल रही थी, मैं अपनी पूरी ताकत से उसे अपनी तरफ खींच रही थी, जैसे मैं उसे अपने अंदर समा लेना चाहती हूँ। उसकी पसीने से भीगी त्वचा मेरी त्वचा से रगड़ खा रही थी। हम दोनों एक-दूसरे में खो चुके थे। उस खाली, शांत ऑफिस में, हमारी साँसों की गति, शरीर के मिलने की आवाज़ और हमारी उत्तेजित सिसकारियाँ ही गूँज रही थीं।

कुछ देर बाद, जब हम दोनों अपनी चरम सीमा पर पहुँच गए, उसके शरीर से गर्माहट मेरे अंदर उतर गई और मेरे पूरे बदन में एक सुखद थरथराहट फैल गई। हम दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए टेबल पर ही बेजान से पड़े थे। यह हमारी **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** का सिर्फ पहला पन्ना था। हम दोनों जानते थे कि यह सिलसिला अभी लंबा चलेगा और हर रात का सन्नाटा हमारे इस चोरी छिपे इश्क का गवाह बनेगा। यह हमारी सबसे प्यारी और सबसे खतरनाक सीक्रेट थी, जो ऑफिस के बंद दरवाज़ों के पीछे, हमारी धड़कनों में ज़िंदा रहेगी। अगली बार जब ऑफिस में लोग हमें सामान्य होते देखेंगे, उन्हें क्या पता कि हम एक ऐसे प्रेम की दास्तान लिख रहे हैं, जिसकी कल्पना भी उनकी सोच से परे है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *