आज उस खाली ऑफिस में सिर्फ मैं और अर्जुन थे, और हवा में एक अजीब सी उत्तेजना घुली हुई थी। देर रात के सन्नाटे में, सिर्फ एसी की हल्की घरघराहट और हमारे दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। प्रोजेक्ट खत्म करने के बहाने हम दोनों यहीं रुक गए थे, पर सच तो यह था कि हमारी आँखों में कुछ और ही प्रोजेक्ट चल रहा था – एक ऐसा प्रोजेक्ट जिसका जिक्र ना जुबान पर था, ना ही फाइलों में।
अर्जुन मेरे मैनेजर थे, पर पिछले कुछ हफ्तों से हमारे बीच की पेशेवर दीवारें टूट रही थीं। लिफ्ट में उनके हाथ का स्पर्श, उनकी निगाहों का मेरी कमर पर ठहरना… हर चीज मेरी अंदर की प्यास को बढ़ा रही थी। आज रात, लग रहा था कि वो प्यास बुझने वाली है।
“रीना, ये आखिरी सेक्शन थोड़ा कॉम्प्लेक्स है,” अर्जुन ने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा। उनकी आवाज़ में वो पेशेवर गंभीरता नहीं थी, बल्कि एक धीमी, मादक फुसफुसाहट थी। “चलो, मेरे कैबिन में चलते हैं। वहाँ कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।” मैंने जानबूझकर अपना लैपटॉप धीरे से बंद किया, ताकि उन्हें मुझे करीब आने का मौका मिले। जैसे ही मैं उठी, उनकी उँगलियाँ मेरी पीठ को छूती हुई निकल गईं – एक बिजली सी दौड़ गई मेरे बदन में।
हम कैबिन में आए। अर्जुन ने दरवाज़ा बंद कर दिया, और फिर वो घुमाकर लॉक कर दिया। उस ‘क्लिक’ की आवाज़ ने मेरे अंदर एक अजीब सी घबराहट और एक उससे भी बड़ी उत्तेजना भर दी। मैं खड़ी थी, मेरी साँसें तेज़ हो चुकी थीं। उन्होंने लैपटॉप टेबल पर रखा और मेरी तरफ बढ़े। उनकी आँखों में वही भूख थी जो मेरी आँखों में थी।
“रीना…” उन्होंने धीरे से मेरा नाम लिया, और मेरा दिल धक-धक करने लगा। उनका एक हाथ मेरी कमर पर आया, और दूसरे हाथ से उन्होंने मेरी ठोड़ी पकड़कर मेरा चेहरा ऊपर उठाया। पलक झपकते ही, उनके होंठ मेरे होंठों पर थे। वो कोई हल्की सी चूमना नहीं था, बल्कि एक भूखी, गहरी, बेबाक चूमना थी जो मेरे पूरे अस्तित्व को हिला गई। मेरे हाथ अनायास ही उनकी गर्दन से लिपट गए, और मैं खुद को पूरी तरह उस पल में खो बैठी।
उनकी जीभ ने मेरे मुँह के हर कोने को टटोला, और मेरी जीभ ने भी उनका साथ दिया। हमारी साँसें एक हो गईं, और मैं उनके सीने से चिपक गई। उन्होंने मुझे और कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जैसे कोई मेरा वजूद ही मिटाना चाहता हो। उनके हाथ मेरी साड़ी के पल्लू पर फिसलने लगे, और फिर मेरी नंगी कमर पर। उनकी उँगलियों का स्पर्श मेरे रोंगटे खड़े कर गया।
“बहुत इंतजार किया है मैंने इस पल का, रीना,” उन्होंने मेरे होंठों से दूर हटते हुए फुसफुसाया, उनकी साँसें गरम और तेज़ थीं।
“मैंने भी, अर्जुन,” मैं बस इतना ही कह पाई, मेरी आवाज़ काँप रही थी।
उन्होंने मुझे धीरे से घुमाया और कैबिन की दीवार से सटा दिया। उनके होंठ एक बार फिर मेरे होंठों पर थे, और उनके हाथ अब मेरे ब्लाउज के हुक खोलने में व्यस्त थे। मैंने कोई विरोध नहीं किया, बस अपनी आँखें बंद करके उस पल का आनंद लिया। ब्लाउज खुला, और मेरी गर्म साँसों के साथ ही उन्होंने मेरी ब्रा भी एक झटके में हटा दी। मेरे भरे हुए स्तन उनके हाथों में आ गए, और उन्होंने उन्हें प्यार से सहलाना शुरू कर दिया। उनके होंठ मेरी गर्दन से होते हुए मेरे स्तनों की ओर बढ़े, और जैसे ही उन्होंने मेरे एक निप्पल को अपने मुँह में लिया, मेरे मुँह से एक मदहोश सिसकी निकल गई।
मेरी साड़ी अब बदन से उतर चुकी थी, सिर्फ पेटिकोट और पैंटी बची थी। अर्जुन ने घुटनों के बल बैठकर मेरे पैरों पर हाथ फेरना शुरू किया, और फिर मेरी पैंटी के भीतर अपनी उँगलियाँ घुसेड़ दीं। मैं पहले से ही गीली थी, और उनके स्पर्श से मेरा शरीर एक अजीब सी बेचैनी से तड़पने लगा। उनकी उँगलियाँ मेरे भीतर गहरे उतरने लगीं, और मैं अपने आप को रोकने में असमर्थ थी।
“अब और इंतजार नहीं होता, रीना,” उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ में तीव्र वासना थी। उन्होंने अपनी पेंट की ज़िप खोली, और उनका कठोर, मांसल लिंग बाहर आ गया। मैंने उसे देखा, वह पूरी तरह खड़ा था और मुझे अपनी ओर खींच रहा था।
उन्होंने मुझे उठाया और अपनी मेज पर बिठा दिया। मेरी टाँगें उनकी कमर पर थीं। उन्होंने मेरे पेटिकोट को ऊपर सरकाया और एक ही झटके में मेरी पैंटी उतार दी। अब मैं पूरी तरह से उनके सामने नग्न थी, मेरी योनि उनके लिंग को छूने को आतुर थी। उन्होंने मुझे थोड़ा सा ऊपर उठाया, अपने लिंग को मेरी गीली योनि के द्वार पर टिकाया, और फिर एक गहरी साँस लेकर मुझे भीतर धकेल दिया।
एक सुखद दर्द की लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई, मेरे मुँह से एक चीख निकली जिसे मैंने अपने होंठों में ही दबा लिया। वह पूरा का पूरा मेरे भीतर था। अर्जुन की आँखों में जीत और वासना का मिश्रण साफ दिख रहा था। उन्होंने अपनी कमर हिलाना शुरू किया, और हर वार के साथ, मेरे भीतर एक नई लहर उठती थी। ‘धप, धप, धप’ की आवाज़ उस खाली कैबिन में गूँजने लगी। मैं अपनी कमर ऊपर उठा रही थी, हर धक्के का जवाब दे रही थी। मेरा शरीर पसीने से भीग चुका था, और मेरे मुँह से सिर्फ मदहोश कर देने वाली सिसकियाँ निकल रही थीं।
यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, यह **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** का चरमोत्कर्ष था। वह पल था जब हमने सारी हदें तोड़ दी थीं।
अर्जुन की रफ़्तार तेज़ होती गई, और मैं भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही थी। मेरा शरीर एक अद्भुत सुख से भर गया था। मैं अब सिर्फ चिल्लाना चाहती थी, और जब उन्होंने मुझे एक अंतिम, गहरा धक्का दिया, तो मेरी चीख निकल ही गई – एक मीठी, सुखद चीख। मेरा शरीर काँप उठा, और मैं उनके ऊपर निढाल होकर गिर गई।
हम दोनों एक दूसरे की बाहों में लिपटे थे, साँसें तेज़ थीं, शरीर पसीने से लथपथ। ऑफिस की वो रात, जिसने हमारी छिपी हुई इच्छाओं को एक नाम दिया था। हमने एक-दूसरे को देखा, और उनकी आँखों में वही सवाल था जो मेरी आँखों में था – “क्या यह फिर होगा?” मेरी मुस्कान ने कह दिया, “हाँ, ज़रूर।” क्योंकि यह सिर्फ शुरुआत थी, **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** की एक लंबी, रोमांचक शुरुआत। उस रात हमने सिर्फ अपने शरीर ही नहीं मिलाए थे, बल्कि अपनी आत्माओं को भी एक कर लिया था, एक ऐसे गुप्त बंधन में जो ऑफिस के हर नियम से परे था। यह हमारा रहस्य था, हमारा अपना, निजी स्वर्ग।
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