आज तक रोहन उस दिन को नहीं भूला था, जब भरी हुई बस की धक्कम-पेल में उसकी नज़र पहली बार प्रिया पर पड़ी थी और उसका दिल धड़क उठा था।
भीड़ से खचाखच भरी एक पुरानी, खटारा बस गाँव के उबड़-खाबड़ रास्ते पर हिचकोले खाती आगे बढ़ रही थी। रोहन खिड़की के पास बैठी अपनी सीट पर बैठा था, जब एक अचानक झटके से ठीक उसके सामने खड़ी प्रिया उसके ऊपर आ गिरी। “संभलकर!” रोहन ने कहा, और उसके हाथ स्वतः ही प्रिया की कमर को थाम लिया। प्रिया ने शर्माते हुए अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, जिसकी वजह से उसकी गहरी साँसें रोहन के कानों में साफ सुनाई दीं। उसकी मुलायम त्वचा का स्पर्श रोहन की उँगलियों में सनसनी पैदा कर गया। बस में थोड़ी जगह बनी और प्रिया ठीक रोहन के बगल में बैठ गई। उनके घुटने टकरा रहे थे, और हर झटके के साथ उनके जिस्म एक दूसरे से और करीब आ रहे थे।
रोहन ने चोरी-छिपे प्रिया को देखा। उसकी साँवली रंगत, घनी पलकें, और गुलाबी होंठ उसे मदहोश कर रहे थे। प्रिया ने महसूस किया कि कोई उसे देख रहा है, और उसने अपनी आँखें उठाईं। उनकी निगाहें मिलीं और उस पल में एक बिजली सी दौड़ गई। “आप कहाँ जा रही हैं?” रोहन ने धीरे से पूछा। “गाँव से आगे मेरा घर है,” प्रिया ने जवाब दिया, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी ललक थी। “मैं भी उधर ही जा रहा हूँ, किसी काम से।” रोहन ने झूठ बोला, पर वह जानता था कि अब उसे अपना रास्ता मिल गया है। यह “बस में हुई पहली मुलाकात का प्यार” अब एक नई राह ले रहा था।
गाँव के बस स्टॉप पर प्रिया उतरी तो रोहन भी उसके पीछे-पीछे उतर गया। प्रिया ने हैरानी से देखा। “मैंने कहा था न, मेरा भी उधर ही काम है।” रोहन ने मुस्कुराते हुए कहा। प्रिया थोड़ी झिझकी, पर उस मुस्कान में कुछ ऐसा था कि वह खुद को रोक नहीं पाई। “क्या आप मेरे घर तक छोड़ देंगे, सामान भारी है?” प्रिया ने पूछा। रोहन का दिल उछल पड़ा। “बेशक!”
प्रिया का घर गाँव के किनारे पर था, शांत और एकांत। उसके माता-पिता किसी रिश्तेदार के यहाँ गए हुए थे। घर पहुँचते ही प्रिया ने रोहन को पानी के लिए पूछा। रोहन ने पानी पिया, पर उसकी आँखें प्रिया के एक-एक हाव-भाव को पढ़ रही थीं। प्रिया को भी महसूस हो रहा था कि यह मुलाकात सिर्फ एक बस यात्रा से कहीं ज़्यादा है। “थोड़ा आराम करेंगे?” प्रिया ने अपने बेडरूम की ओर इशारा करते हुए कहा। उस आवाज़ में एक अनकहा निमंत्रण था।
बेडरूम में घुसते ही, हवा में एक अजीब सी गर्मी घुल गई। रोहन ने दरवाज़ा बंद किया और प्रिया की तरफ मुड़ा। बिना एक शब्द बोले, उसने धीरे से प्रिया का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनकी उँगलियाँ एक-दूसरे में उलझ गईं। रोहन ने प्रिया की कमर पर अपना हाथ रखा और उसे अपनी तरफ खींच लिया। उनके होंठ एक-दूसरे से मिले। यह एक नर्म, सहमी हुई शुरुआत थी, पर जल्द ही यह एक तूफानी समंदर में बदल गई। रोहन के होंठ प्रिया के होंठों पर, गर्दन पर, कानों के पास हर जगह प्यासे भँवरे की तरह भटक रहे थे। प्रिया ने अपनी आँखें मूँद लीं, उसकी उँगलियाँ रोहन के बालों में उलझ गईं।
रोहन ने प्रिया की साड़ी खोली, एक-एक परत उसके जिस्म से अलग होती गई। फिर उसका ब्लाउज, और फिर पेटीकोट। प्रिया अब सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। रोहन की निगाहें उसकी सुडौल देह पर ठहर गईं। उसने झुककर प्रिया के पेट पर, फिर नाभि के पास, और फिर उसकी पैंटी के ऊपर से उसकी योनिकमल पर चुंबन दिया। प्रिया एक धीमी आह के साथ रोहन के बालों में हाथ फेरने लगी। रोहन ने उसकी पैंटी हटाई और प्रिया की रसीली देह उसके सामने थी। रोहन ने घुटनों के बल बैठ कर प्रिया की योनि पर अपने होंठ रख दिए। प्रिया के जिस्म में एक सिहरन दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और वह रोहन के सिर को अपनी ओर खींचने लगी।
कुछ देर बाद, रोहन उठा और प्रिया को बिस्तर पर लिटा दिया। उसने खुद अपने कपड़े उतारे और उसके ऊपर आ गया। प्रिया की टाँगें उसके कमर के इर्द-गिर्द लिपट गईं। रोहन ने धीरे से अपने लिंग को प्रिया की योनि के द्वार पर रखा और एक हल्के धक्के से अंदर प्रवेश किया। प्रिया की साँस अटक गई, एक मीठी पीड़ा और तीव्र आनंद ने उसे घेर लिया। “आह… रोहन…” उसकी आवाज़ लगभग एक फुसफुसाहट थी। रोहन ने अपनी गति बढ़ाई, एक लय में वह प्रिया के अंदर-बाहर हो रहा था। हर धक्के के साथ, उनकी आत्माएं एक-दूसरे में विलीन हो रही थीं। पसीने की बूँदें उनके जिस्म पर चमक रही थीं। कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़ और प्रिया की मदहोश कर देने वाली आहें गूँज रही थीं।
कुछ देर के तीव्र मिलन के बाद, दोनों एक साथ चरम सुख पर पहुँचे। प्रिया ने रोहन को कसकर अपनी बाँहों में भर लिया, और रोहन उसके ऊपर निढाल हो गया। उनकी साँसें तेज़ थीं, दिल ज़ोरों से धड़क रहे थे, और उनके जिस्म एक-दूसरे में गहरे समाए हुए थे। यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, यह “बस में हुई पहली मुलाकात का प्यार” था जिसने उन्हें एक-दूसरे की आत्मा से जोड़ दिया था। उस रात, गाँव के उस छोटे से घर में, दो अजनबियों ने अपने जिस्मों और रूहों को एक-दूसरे में ढूँढ़ लिया, एक ऐसा मीठा अंत जिसकी शुरुआत एक भीड़ भरी बस में हुई थी।
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