बेकाबू जवानी का गरमा गरम प्यार: जब दहकी प्रिया की देह राजीव के स्पर्श से

गर्मी से बेहाल प्रिया की चोली भी आज उसे बंधन लगने लगी थी।

गांव की उस तपती दोपहर में सूरज आग बरसा रहा था और प्रिया को लग रहा था, उसके भीतर भी कोई आग धधक रही है। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक जाता, तो वह उसे खींचकर कस लेती, पर मन की बेचैनी कम नहीं होती। उसकी बेकाबू जवानी भीतर ही भीतर उफान मार रही थी, और उसे महसूस हो रहा था जैसे आज वह हर बंधन तोड़ देना चाहती है। तभी दरवाजे से राजीव ने भीतर कदम रखा। पसीने से तरबतर उसका बलिष्ठ शरीर और गहरी सांसें, प्रिया को और भी उत्तेजित कर गईं।

“अरे, इतनी गर्मी में कहाँ थे?” प्रिया ने जानबूझकर बेपरवाही से पूछा, पर उसकी आंखें राजीव के हर अंग पर ठहर रहीं थीं।

राजीव ने मुस्कुराते हुए कहा, “खेत पर था। पर यहां तो तुमसे भी ज़्यादा गरमी है।” उसकी नज़र प्रिया की धड़कती छाती पर थी जो चोली में कैद, ऊपर-नीचे हो रही थी।

प्रिया झेंप गई, पर मन ही मन खुश भी हुई। “ज्यादा बको मत, जाओ नहा लो।”

राजीव एक कदम और करीब आया, “नहा तो लूंगा, पर क्या तुम भी मेरे साथ नहाओगी, प्रिया?” उसकी आवाज़ में शरारत और वासना दोनों थीं।

प्रिया का चेहरा सुर्ख हो गया, “छिः! कैसी बातें करते हो!”

राजीव ने एक झटके में प्रिया का हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। प्रिया का नर्म शरीर उसके कठोर जिस्म से टकराया तो एक सिहरन दौड़ गई। राजीव के पसीने से लथपथ बदन से आती मर्दाना गंध प्रिया को मदहोश कर रही थी। उसने प्रिया की कमर पर अपनी उंगलियां फेरनी शुरू कीं। “तुम्हारी यह बेकाबू जवानी मुझे पागल कर देगी, प्रिया।”

प्रिया की सांसें तेज़ हो गईं। उसने आंखें मूंद लीं। राजीव ने उसकी गर्दन पर, उसके कानों के पीछे, और फिर उसके नरम होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उनकी पहली चुंबन धीमी थी, फिर गहरी होती गई, और फिर एक दूसरे को निगलने वाली हो गई। प्रिया के हाथ खुद-ब-खुद राजीव की गर्दन के इर्द-गिर्द लिपट गए।

राजीव ने एक हाथ से प्रिया की साड़ी और फिर ब्लाउज के बटन खोलने शुरू कर दिए। एक-एक करके कपड़े शरीर से अलग होते गए, और प्रिया की गोरी, सुडौल देह राजीव के सामने आ गई। राजीव ने अपनी धोती भी खोल दी, और प्रिया की आँखें उसके मर्दाने अंग पर ठहर गईं, जो उत्तेजना से फड़फड़ा रहा था। इस तपती दोपहर में उनकी देह की आग अब और भी तेज़ हो चुकी थी। यह था उनकी बेकाबू जवानी का गरमा गरम प्यार, जो हर बंधन तोड़ चुका था।

राजीव ने प्रिया को बांहों में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। उसके होंठ फिर से प्रिया के होंठों पर, गर्दन पर, और फिर धीरे-धीरे नीचे उतरते गए। प्रिया की सांसें अब हिचकियों में बदल चुकी थीं। राजीव के होंठ जब उसके उभारों पर आए तो प्रिया के मुंह से एक सिसकारी निकल गई। वह उसके स्तनों को चूसता रहा, उन्हें सहलाता रहा, मानो अमृतपान कर रहा हो। प्रिया अपने बिस्तर पर छटपटा रही थी, उसकी उंगलियां राजीव के बालों में उलझ गईं।

फिर राजीव ने प्रिया की जांघों को फैलाया और धीरे-धीरे अपने अंग को उसके भीतर प्रवेश कराया। प्रिया की आंखें खुशी और दर्द के मिले-जुले भाव से बड़ी हो गईं। उसने अपने होंठों पर दांत गड़ा लिए, ताकि कोई आवाज़ न निकल सके। राजीव ने धीरे-धीरे, फिर तेज़ी से गति पकड़ी। बिस्तर की चरमराहट, प्रिया की मदहोश कर देने वाली आहें और राजीव की भारी सांसें पूरे कमरे में गूंज रही थीं। दोनों एक-दूसरे में समा रहे थे, देह से देह का मिलन एक चरम आनंद की ओर बढ़ रहा था। प्रिया ने अपनी कमर ऊपर उठा दी, और राजीव ने अपनी गति और तेज़ कर दी। हर धक्के के साथ प्रिया एक गहरी आह भरती, और राजीव और भी जोशीला होता जाता।

“राजीव… और… और तेज़…” प्रिया ने अपने वश से बाहर होकर पुकारा।

राजीव ने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया और प्रिया के भीतर ही सारा प्यार उंडेल दिया। प्रिया भी उसी पल चरम सुख की उस ऊंची चोटी पर पहुंच गई, जहां से नीचे सिर्फ आनंद का सागर था। दोनों हांफते हुए एक-दूसरे से चिपक गए, उनके शरीर पसीने से तर थे, पर भीतर तक तृप्त। उनका बेकाबू जवानी का गरमा गरम प्यार उन्हें एक-दूसरे में पूरी तरह डुबो चुका था। आज की दोपहर ने उन्हें हमेशा के लिए एक कर दिया था।

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