गर्मी की उस दोपहर, प्रिया के तन पर लिपटा पसीना और भी कुछ गीला कर रहा था, जो अब तक सिर्फ़ सपनों में होता था। पति की अनुपस्थिति में, ससुराल के बंद कमरे और भी बोझिल लगने लगे थे, पर आज कुछ अलग ही बेचैनी थी। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार फिसल रहा था, और उसका मन जाने क्यों देवर, विकास, की तरफ खिंचा चला जा रहा था। विकास, जो उससे उम्र में छोटा था, पर उसकी आँखों में प्रिया ने हमेशा एक अजीब सी चमक देखी थी।
आज दोपहर, घर में सब सो रहे थे या बाहर गए थे। प्रिया अपने कमरे में बैठी, पंखे की धीमी हवा में भी खुद को शांत नहीं कर पा रही थी। तभी दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। विकास था। “भाभी, सब सो रहे हैं। आपको गर्मी लग रही होगी, मैं पानी ले आया।” उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था, जो प्रिया को और बेचैन कर गया।
विकास अंदर आया और ग्लास प्रिया के हाथ में थमाया। उसकी उंगलियों का स्पर्श प्रिया की हथेली पर हुआ और एक सिहरन उसके पूरे बदन में दौड़ गई। प्रिया ने नज़रें झुका लीं, पर उसे पता था कि विकास की आँखें उसे ही घूर रही हैं। “ध… धन्यवाद विकास,” प्रिया ने अटकते हुए कहा।
विकास प्रिया के पास ही ज़मीन पर बैठ गया। “भाभी, आप इतनी परेशान क्यों लग रही हैं? कुछ बात है?” उसकी आवाज़ में हमदर्दी थी, पर आँखों में साफ़ दिख रही कामुकता ने प्रिया के दिल की धड़कनें तेज़ कर दीं। प्रिया ने हिम्मत करके अपनी नज़रें उठाईं और विकास की आँखों में देखा। उन आँखों में प्रिया को अपनी ही प्यास का अक्स दिखा। यह एक ऐसी ससुराल में चोरी का प्यार हिंदी कहानी थी, जो उसने कभी सोची भी न थी।
“बस… ऐसे ही… मन नहीं लग रहा,” प्रिया ने धीरे से कहा। विकास का हाथ धीरे से प्रिया के घुटने पर आया और एक पल के लिए रुक गया। प्रिया का शरीर अकड़ गया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। विकास ने प्रिया के चेहरे पर फैले बालों को धीरे से हटाया और उसके गाल को सहलाया। प्रिया की पलकें झुक गईं, उसके होंठ हल्के से खुले रह गए।
विकास ने बिना कुछ कहे, प्रिया की गर्दन पर अपना होंठ रखा और एक गहरी साँस ली। प्रिया की बंद आँखों से एक आह निकली। विकास का हाथ प्रिया की साड़ी के अंदर गया और उसके पेट पर महसूस हुआ। प्रिया का बदन आग की तरह जल रहा था। उसने अपने होंठ विकास के होंठों पर रख दिए। एक तेज़, मदहोश कर देने वाला चुंबन शुरू हुआ। विकास ने प्रिया को अपनी बाहों में उठा लिया और धीरे से बिस्तर पर लिटा दिया।
साड़ी का पल्लू, फिर ब्लाउज़, और फिर पेटीकोट… एक-एक करके कपड़े ज़मीन पर गिरते गए। प्रिया का जिस्म, जो अब तक सिर्फ़ अपने पति के लिए आरक्षित था, आज देवर के हाथों में पिघल रहा था। विकास की उंगलियाँ प्रिया के वक्रों पर घूम रही थीं, उसे हर स्पर्श से और भी उत्तेजित कर रही थीं। प्रिया का सारा संकोच अब कामवासना में बदल चुका था। वह विकास के सीने से चिपक गई और उसके कानों में फुसफुसाई, “और… और नहीं सहा जाता विकास।”
विकास ने अपने कपड़े भी उतार फेंके। उनके नग्न शरीर एक-दूसरे से चिपक गए। पसीने और वासना की गंध ने कमरे को भर दिया। विकास प्रिया के ऊपर झुका। प्रिया ने अपनी टांगें विकास की कमर में कस लीं और उसे अपनी ओर खींचा। उस दोपहर, उन्होंने जिस ‘ससुराल में चोरी का प्यार हिंदी कहानी’ की शुरुआत की थी, वह उनके जिस्मों को एक नई आग दे रही थी। दर्द और आनंद का एक अजीब मिश्रण प्रिया के अंदर फैल गया। उनकी साँसें तेज़ हो गईं, उनकी आवाज़ें कमरे में गूँजने लगीं। एक दूसरे में समाते हुए, उन्होंने उस क्षण को जिया, हर सीमा को तोड़ते हुए, हर वर्जना को जलाते हुए। जब वे शांत हुए, तब दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे, पर उनके दिलों में एक अनकही संतुष्टि थी। यह तो बस शुरुआत थी, उनके चोरी के प्यार की, जिसकी आग अब बुझने वाली नहीं थी।
Leave a Reply