उसकी निगाहें जब मेरी साड़ी के पल्लू से फिसलकर, कमर की नाजुक लकीर पर टिकतीं, तो मेरे भीतर एक आग सी सुलग उठती। समीर, मेरा बॉस, न सिर्फ तेज़-तर्रार और आकर्षक था, बल्कि उसकी आँखों में वो गहरा जादू था जो किसी भी औरत को मदहोश कर दे। मैं, रीना, एक मेहनती कर्मचारी थी, पर उसकी एक झलक से मेरी धड़कनें बेकाबू हो जातीं। यह हमारे **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** की शुरुआत थी, एक ऐसी कहानी जो दफ्तर की बंद दीवारों के पीछे पनपी, जहाँ हर निगाह, हर स्पर्श, एक चोरी थी।
शुरुआत में तो सब कुछ पेशेवर था। देर रात की मीटिंग्स, अर्जेंट प्रोजेक्ट्स पर साथ काम करना। पर धीरे-धीरे काम की आड़ में एक नया रिश्ता पनपने लगा। फाइलों को समेटते हुए उसका हाथ मेरे हाथ को छू जाता, कॉफी के कप थमाते हुए उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों से टकरा जातीं। हर स्पर्श में एक अजीब सी बिजली दौड़ जाती, जो सीधा मेरी रूह तक उतरती। एक रात, जब ऑफिस पूरी तरह खाली था और सिर्फ हम दोनों बचे थे, समीर ने मुझे अपने केबिन में बुलाया। “रीना, यह रिपोर्ट थोड़ी देर से भेज देना,” उसने कहा, पर उसकी आँखों में रिपोर्ट से कहीं ज़्यादा कुछ और था। मैंने रिपोर्ट देखी, पर मेरा ध्यान उसकी खुली शर्ट के बटन और उसके सीने पर था।
“आज बहुत देर हो गई, क्या यहीं रुकोगी?” समीर ने अपनी कुर्सी से उठते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना थी। मेरा गला सूख गया। मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया। वह मेरे करीब आया, इतना करीब कि उसकी साँसों की गर्म हवा मेरे चेहरे पर पड़ने लगी। उसकी आँखें मेरी आँखों में गहरे उतर गईं और फिर धीरे-धीरे मेरे होंठों पर आ गईं। “तुम कितनी खूबसूरत हो, रीना,” उसने फुसफुसाया। मेरे भीतर की सारी बंदिशें टूट गईं। मेरा जिस्म उसकी ओर खिंच गया। उसके होंठ मेरे होंठों से टकराए, पहले धीमे, फिर भूखे, प्यासे। उसकी जीभ ने मेरे मुंह का स्वाद चखा और मेरे शरीर में एक ऐसी लहर दौड़ गई जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
उसने मुझे अपनी बाहों में उठा लिया और अपनी डेस्क पर बिठा दिया। मेरी साड़ी कब सरकी, कब उसका पल्लू ज़मीन पर गिरा, मुझे कुछ खबर नहीं रही। उसके हाथ मेरी कमर पर से फिसलकर, मेरे नितंबों को सहलाने लगे। मेरी गरदन पर उसके चुंबनों की बौछार से मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने अपनी उंगलियां उसकी घनी जुल्फों में फंसा लीं और उसे और करीब खींच लिया। मेरे ब्लाउज़ के बटन कब खुले, मुझे पता ही नहीं चला। उसके गर्म होंठों ने मेरे उभारों को ढँक लिया और मेरे मुंह से एक मदहोश कर देने वाली चीख़ निकली। ऑफिस की ठंडी हवा में मेरे जिस्म की आग तेज़ी से सुलग उठी थी। उसके चुंबन और स्पर्श से मेरे अंग-अंग में बिजली दौड़ रही थी।
उस रात, ऑफिस की डेस्क ही हमारा बिस्तर बन गई। हमारे कपड़े अस्त-व्यस्त पड़े थे और हमारी साँसों की तेज़ आवाज़ें खाली दफ्तर की दीवारों से टकरा रही थीं। उसका हर वार मेरे जिस्म को झकझोर रहा था, और मैं सिर्फ़ उसे और करीब खींचना चाहती थी। हमारी प्यास ऐसी थी जो कभी बुझने वाली नहीं थी। जब वह मुझमें गहराई तक उतरता, तो मेरे मुंह से बेकाबू सिसकियां निकलतीं, और मैं उसकी बाहों में पूरी तरह पिघल जाती।
यह सिलसिला फिर कभी नहीं रुका। दफ्तर के खाली केबिन, देर रात की मीटिंग्स, स्टोर रूम के कोने, यहां तक कि कभी-कभी तो लंच ब्रेक में भी, हमारे जिस्म एक दूसरे में खो जाते। हर दिन एक नया रोमांच होता। समीर की गहरी चाहत और मेरी अनकही प्यास ने मिलकर एक ऐसी **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** लिख डाली थी, जो जोखिमों से भरी थी, पर उसकी हर साँस में एक अलग ही नशा था। हमें पता था कि यह गलत है, पर इस forbidden thrill में जो मज़ा था, वो किसी और चीज़ में नहीं था। हमारी आँखें जब मिलतीं, तो उनमें वही आग, वही प्यास नज़र आती जो हमें बार-बार एक दूसरे की ओर खींचती। यह एक ऐसा मीठा गुनाह था जिसे हम कभी छोड़ना नहीं चाहते थे, और हर रात दफ्तर की दीवारें हमारी कामुक चीखों और मदहोश कर देने वाली साँसों की गवाह बनतीं।
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