जब नेहा अपनी काली साड़ी में मेरी बालकनी के सामने से गुज़री, तो एक पल को लगा जैसे शहर की सारी चकाचौंध फीकी पड़ गई हो। उसकी कमर की पतली गोलाई और भीगी ज़ुल्फ़ों से टपकती बूँदें सीधे मेरे सूखे गले में उतर गईं। नई पड़ोसन नेहा क्या आई, मेरी बेरंग ज़िंदगी में जैसे इंद्रधनुष के सारे रंग घुल गए। अगले दिन, लिफ़्ट में हमारी आँखें मिलीं। “आप रजत, है ना?” उसकी आवाज़ में शहद घुला था, “मैं नेहा, नई किराएदार।” उस छोटी सी मुलाकात ने मेरे अंदर दबी इच्छाओं को जैसे भड़का दिया था। रात भर मैं सिर्फ उसी के बारे में सोचता रहा, उसकी भूरी आँखें, उसके होंठों पर वो हल्की सी मुस्कान।
कुछ ही दिनों में हमारी दोस्ती बढ़ती गई। कभी शाम की चाय, कभी कॉलोनी के पार्क में मुलाक़ात। और हर मुलाक़ात में एक अनकहा रोमांच घुलता जाता। एक शाम, बारिश अचानक तेज़ हो गई। नेहा मेरे दरवाज़े पर खड़ी थी, “रजत, क्या आपकी बालकनी का दरवाज़ा अटक गया है? मेरी बालकनी में पानी भर रहा है।” यह एक बहाना था, और हम दोनों जानते थे। जब वो मेरे घर के अंदर आई, उसके बदन से भीनी-भीनी खुशबू उठ रही थी। उसकी हल्की गीली साड़ी उसके उभारों से चिपकी हुई थी, जो मेरे दिल की धड़कनों को बेकाबू कर रही थी। “बैठो नेहा,” मैंने काँपते हाथों से चाय ऑफर की। उसकी आँखें शरारत से चमक रही थीं। मैंने महसूस किया कि ये तो बस शुरुआत थी **नई पड़ोसन के साथ इश्क की शरारतें** की।
चाय की चुस्कियों के साथ बातों का सिलसिला चला, लेकिन हमारी नज़रें कुछ और ही कह रही थीं। हवा में एक अजीब सी उत्तेजना थी। “रजत,” नेहा ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कशिश थी, “क्या आप मेरे लिए कुछ देर रुक सकते हैं? मेरा मन नहीं कर रहा अकेला रहने का।” उसका यह प्रस्ताव मेरे लिए किसी अमृत से कम नहीं था। रात ढल रही थी, और कमरे में हल्की डिम लाइट थी। हम सोफे पर बैठे थे, मेरे हाथ अनजाने में उसके कंधे पर जा पहुंचे। उसके रेशमी बालों को छूते ही एक सिहरन दौड़ गई। उसने पलकें झुकाईं और अपने होंठ मेरे होंठों के करीब ला दिए। एक पल की हिचकिचाहट के बाद, मैंने उसकी कमर को अपनी बाहों में भरा और उसके लबों को अपने लबों से भिड़ा दिया। वो मीठा, प्यासा चुंबन गहराता गया।
हमारी साँसें एक दूसरे में घुल रही थीं। मैंने उसे अपने ऊपर खींच लिया, और वो बेखौफ होकर मेरी गोद में आ बैठी। उसके नरम शरीर का स्पर्श मेरे रोंगटे खड़े कर रहा था। उसके हाथों ने मेरी कमीज़ के बटन खोले और उसकी उंगलियां मेरे सीने पर घूमने लगीं। मेरी जीभ उसके मुँह के हर कोने को तलाश रही थी, और उसकी आहें मेरे कानों में संगीत घोल रही थीं। मैंने उसे उठाया और बेडरूम की तरफ ले गया, जहाँ बिस्तर पर उसे धीरे से लिटा दिया। उसकी साड़ी का पल्लू पहले ही कब सरक चुका था, और अब उसका ब्लाउज़ और पेटीकोट मेरे हाथों की गिरफ्त में था। एक-एक करके कपड़े उतरते गए, और उसके कामुक शरीर की हर वक्र मेरे सामने उजागर होती गई। उसकी छाती के उभार, उसकी नाभि की गहराई, उसके मुलायम जांघें… मैं बस उसे निहारता रह गया।
“बहुत देर कर दी आपने,” नेहा ने फुसफुसाते हुए कहा, और अपने हाथों से मुझे अपनी ओर खींचा। मैंने उसके बदन को अपने गर्म होठों से सहलाना शुरू किया, उसकी गर्दन से लेकर छाती तक, और फिर धीरे-धीरे उसके पेट तक। वो हर स्पर्श पर आहें भर रही थी। जब मेरी उंगलियां उसकी जांघों के बीच की गरमाहट तक पहुंचीं, तो वो छटपटा उठी। उसकी आँखें बंद थीं, और उसके मुँह से सिसकियाँ निकल रही थीं। मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था। मैंने अपने कपड़े उतारे और उसके ऊपर झुक गया। हमारी आँखें मिलीं, और उस पल में मैंने देखा कि वो भी उतनी ही प्यासी थी जितनी मैं। धीरे-धीरे मैंने खुद को उसमें उतारा। एक गहरी, सुखद सिसकी उसके होठों से निकली। हम दोनों एक साथ उठे और गिरे, एक लय में, एक जुनून में। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ और बिस्तर की चरमराहट थी। यह **नई पड़ोसन के साथ इश्क की शरारतें** हदों से पार जा चुकी थीं। हम एक दूसरे में इस कदर खो चुके थे कि बाहर की दुनिया का कोई होश नहीं था। उसकी कसक और मेरी बेचैनी एक होकर चरम सुख की ओर बढ़ रही थी। अंत में, एक तीव्र आवेग के साथ, हम दोनों का शरीर अकड़ा और फिर ढीला पड़ गया, एक गहरी संतुष्टि के साथ। हम दोनों एक दूसरे से लिपटकर हांफते रहे, उस अद्भुत अहसास में डूबे हुए। नेहा ने मेरे सीने पर सिर रखकर कहा, “यह तो बस शुरुआत है, रजत।” और मैंने मुस्कुराकर उसकी पीठ सहलाई, जानता था कि हमारी **नई पड़ोसन के साथ इश्क की शरारतें** अभी और गहरी होने वाली हैं।
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