उसकी साड़ी का पल्लू जब हवा में लहराता, तो मेरी साँसें वहीं अटक जातीं। यह प्रिया थी, मेरी नई पड़ोसन, जो दो दिन पहले ही हमारे फ्लैट के ठीक सामने शिफ्ट हुई थी। उसकी हर अदा में एक अजीब-सी कशिश थी, जो मुझे अपनी ओर खींच रही थी। मैं अपनी बालकनी से अक्सर उसे अपने काम में व्यस्त देखता। कभी फूलों को पानी देती, तो कभी घर का सामान जमाती, और हर बार उसकी हलकी सी मुस्कान मेरे दिल में एक आग लगा जाती। मेरा मन बस यही सोचता रहता था कि काश, **नई पड़ोसन के साथ इश्क की शरारतें** शुरू हो जाएँ।
एक शाम, जब मैं अपने काम से लौटा, तो देखा कि प्रिया अपने दरवाजे के पास खड़ी थी, चेहरा परेशान था। “राकेश जी, मेरा लैपटॉप अंदर रह गया है और चाबी कहीं मिल नहीं रही।” उसकी आवाज़ में एक मीठी-सी घबराहट थी। मैंने तुरंत पेशकश की, “चलो, मैं देखता हूँ, शायद खिड़की से कुछ हो जाए।” हम उसके फ्लैट में एक खुली खिड़की के रास्ते दाखिल हुए। लैपटॉप मिलते ही उसने राहत की साँस ली, और फिर मेरी ओर मुड़कर एक ऐसी मुस्कान दी, जिसने मेरे दिल की धड़कनें तेज़ कर दीं। कमरे में एक धीमी, मदहोश करने वाली खुशबू फैल रही थी – चंदन और गुलाब का मिश्रण।
“थैंक यू, राकेश जी। आप नहीं होते तो पता नहीं क्या करती।” वह मेरे करीब खड़ी थी, इतनी करीब कि मैं उसकी साँसों की गर्माहट महसूस कर सकता था। उसके गुलाबी होंठ, उसकी आँखों में चमक, और उसके हल्के भीगे बाल… मैं खुद को रोक नहीं पाया। मेरा हाथ अनायास ही उसकी कमर पर चला गया। वह पलभर के लिए ठिठकी, पर फिर उसकी आँखों में एक अलग तरह की चमक आई – एक निमंत्रण, एक स्वीकारोक्ति। मेरे होंठ उसके होंठों पर उतर गए। एक मीठी, गहरी चूसने वाली चुंबन। उसके होंठ नर्म थे और उनका स्वाद किसी स्वर्ग जैसा था। उसने अपनी बाँहें मेरी गर्दन में डाल दीं और खुद को पूरी तरह मेरे हवाले कर दिया। यह चुंबन गहरा होता चला गया, हमारी जीभें एक-दूसरे में उलझ गईं, हर साँस में एक मीठी आग भर रही थी।
मैंने उसे अपनी बाँहों में उठा लिया और वह सहजता से लिपट गई। उसे बेडरूम की ओर ले जाते हुए मैंने दरवाजे को बंद कर दिया। उसके शरीर का हर अंग मेरे स्पर्श के लिए मचल रहा था। मेरे हाथ उसकी साड़ी का पल्लू हटाने लगे, और फिर ब्लाउज के बटन खुलने लगे। हर एक कपड़ा हटने के साथ, उसका बदन और ज्यादा कामुक होता जा रहा था। जब उसकी साड़ी और पेटीकोट उसकी कमर से नीचे खिसके, तो मैंने उसकी चिकनी, गोरी जांघें देखीं। उसकी पैंटी उसकी योनि पर तनी हुई थी, जो पहले ही गीली हो चुकी थी। मेरी उंगलियाँ उस कपड़े के ऊपर से ही उसकी उभारदार योनि को सहलाने लगीं। उसने एक गहरी आह भरी और मेरा नाम बुदबुदाया।
मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर झुक गया। उसके बड़े, सुडौल स्तन मेरी आँखों के सामने थे, उसके गुलाबी निप्पल पूरी तरह से तने हुए थे, मुझे उन्हें चूसने का सीधा निमंत्रण दे रहे थे। मैंने एक निप्पल को अपने मुँह में लिया और उसे धीरे-धीरे चूसना शुरू कर दिया, जबकि दूसरे को अपनी उंगलियों से मसल रहा था। प्रिया खुशी से सिसकने लगी, “आह्ह्ह… राकेश… और तेज… और।” मेरे हाथ उसकी पैंटी को नीचे उतारने लगे, और अब उसकी पूरी योनि मेरे सामने थी – गुलाबी, फुली हुई और पूरी तरह से भीगी हुई। उसकी कामोत्तेजना की खुशबू मेरे नथुनों में भर गई।
मैं अब और सब्र नहीं कर सकता था। मैंने अपनी पैंट हटाई और अपना तना हुआ लिंग उसकी योनि के द्वार पर रखा। उसकी आँखें बंद थीं, होंठ खुले थे, और वह मुझे अपने अंदर लेने के लिए पूरी तरह तैयार थी। मैंने एक गहरा धक्का दिया और मेरा पूरा लिंग एक ही बार में उसके अंदर उतर गया। “आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!” प्रिया की चीख खुशी और दर्द का एक मीठा मिश्रण थी। उसकी कसक इतनी तीव्र थी कि मुझे लगा जैसे मैं स्वर्ग में पहुँच गया हूँ। मैंने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई, हर धक्के के साथ उसके शरीर में और गहराई तक उतरता गया। बिस्तर की चरमराहट, हमारी साँसों का तेज़ होना, और उसकी सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं।
हम एक-दूसरे में खो चुके थे। हर धक्के के साथ, हमारे शरीर एक दूसरे में समाते जा रहे थे। उसकी जांघें मेरी कमर पर कसकर लिपटी हुई थीं, और वह मेरे हर वार का जवाब उतनी ही शिद्दत से दे रही थी। मेरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था, और मैं महसूस कर सकता था कि वह भी अपने चरम पर पहुँचने वाली है। “राकेश… मैं आ रही हूँ… आअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!” उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा कम्पन था। मैंने अपनी सारी ताकत लगाकर आखिरी कुछ धक्के दिए, और फिर मेरे शरीर में एक तेज कंपकंपी उठी, मेरा सारा रस उसके अंदर भर गया। हम दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे पर गिर पड़े।
रात ढल चुकी थी, और हम एक-दूसरे की बाहों में थे, पूरी तरह से संतुष्ट। यह हमारी **नई पड़ोसन के साथ इश्क की शरारतें** थीं, जिन्होंने हमारे जीवन में एक अनूठी मिठास घोल दी थी, और हम जानते थे कि यह शरारतें अभी बहुत आगे तक जाने वाली थीं। उस रात के बाद, प्रिया और मैं सिर्फ़ पड़ोसी नहीं रहे, बल्कि हमारे बीच का बंधन देह और आत्मा दोनों से जुड़ चुका था। हर अगली रात एक नई शरारत का वादा लेकर आती थी।
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