उसकी साड़ी का पल्लू जब मेरे हाथ से टकराया, मेरे रूह में एक सिहरन दौड़ गई। प्रिया, नई भर्ती, अपनी मासूमियत और शरारती आँखों से सबकी नज़र में थी, पर मेरी नज़र में कुछ और ही था। देर शाम थी, ऑफिस लगभग खाली हो चुका था। सर्वर रूम में कुछ काम था, और मैं (रोहन) अकेला था जब प्रिया अचानक वहां आ गई। उसने पसीना पोंछते हुए कहा, “सर, फाइल में कुछ दिक्कत आ रही है।” उसकी आवाज़ में एक हल्की सी घबराहट थी, या शायद कुछ और।
मैंने उसे अपनी तरफ खींचा, “इतनी रात में तुम अकेली क्यों हो? कहाँ है तुम्हारा असिस्टेंट?” मेरे हाथ उसके कमर पर टिक गए, और मैंने महसूस किया कि उसके शरीर में एक कंपन दौड़ गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और आँखें शर्म से झुक गईं। मैंने धीरे से उसके गाल पर हाथ रखा, “प्रिया, तुम जानती हो कि यह सिर्फ फाइल की बात नहीं है, है ना?” उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसमें डर भी था और एक उमड़ती हुई प्यास भी। यह थी हमारी **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** की पहली साँस।
उस रात, सर्वर रूम की ठंडी हवा में भी हमारे जिस्म आग से तप रहे थे। मैंने उसे अपने करीब खींचा, और हमारे होंठ मिल गए। शुरुआत में वह सहमी, फिर उसने भी मेरा साथ दिया। उसकी मुलायम ज़बान मेरे मुँह में अपनी जगह तलाश रही थी। मैंने उसकी साड़ी का पल्लू गिराया, और उसके वक्ष पर हाथ रखा। ब्लाउज के भीतर उसके उठे हुए पयोधर मेरी हथेली में समा गए। उसने एक गहरी साँस ली, और मैंने महसूस किया कि उसकी ब्रा के नीचे से उसकी उभरी हुई निप्पलें कितनी कड़क थीं। मैंने उसके कान में फुसफुसाया, “तुम कितनी हसीन हो, प्रिया।”
हमने धीरे-धीरे एक-दूसरे के कपड़े उतारने शुरू किए। मेरा जैकेट और शर्ट ज़मीन पर गिर चुके थे, और उसकी साड़ी भी पैरों के पास एक ढेर बन गई थी। उसका ब्लाउज मैंने खोला, और उसकी ब्रा को एक झटके में उतार दिया। उसके स्तन, पूर्ण और गोल, मेरी आँखों के सामने थे। मैंने झुककर उन्हें चूसा, एक-एक करके, और प्रिया की जुबान से मीठी आह निकली। वह अपने हाथों से मेरे बालों को सहला रही थी, और उसकी उँगलियाँ मेरे सर पर एक अजीब सा जादू कर रही थीं। मेरी पैंट भी खुल चुकी थी, और मेरा उत्तेजित अंग उसके गर्म पेट को छू रहा था। प्रिया ने मेरे अधनंगे शरीर को छुआ, और उसके हाथ मेरे पीठ से होते हुए मेरे नितंबों तक पहुँच गए। “आह, रोहन… मुझे और चाहिए,” उसकी आवाज़ में मदहोशी थी।
मैं उसे अपने बगल वाले खाली केबिन में ले गया, जहाँ अंधेरा और चुप्पी थी। टेबल पर फाइलों को हटाकर, मैंने उसे धीरे से उस पर लिटा दिया। उसकी भीगी आँखों में वासना और समर्पण का अद्भुत मिश्रण था। मैंने उसकी सलवार को नीचे किया, और फिर उसकी पैंटी भी हट गई। उसकी योनि, अब पूरी तरह से मेरे सामने थी, रस से लबालब, मेरी मर्दानगी को पुकारती हुई। मैंने अपनी कमर झुकाई, और एक ही झटके में उसके भीतर प्रवेश कर गया। प्रिया की एक चीख निकली, जो उसने अपने होंठों पर हाथ रखकर दबा ली। उसकी आँखें बंद थीं, और वह अपने होंठों को काट रही थी।
हमने अपनी रफ़्तार बढ़ाई, एक-दूसरे में खोकर। उसके जिस्म का हर हिस्सा मेरे स्पर्श से सिहर रहा था, और मेरी हर धक्के के साथ वह और गहराती जा रही थी। केबिन की दीवारें हमारी वासना की गवाह बन रही थीं। पसीने से तरबतर हम दोनों एक-दूसरे में इतने डूब चुके थे कि बाहर की दुनिया का कोई होश नहीं था। उसकी योनि से निकलने वाला रस मेरी मर्दानगी को और चिकना बना रहा था, और हम दोनों चरम सुख की ओर बढ़ रहे थे। जब हमारी वासना चरम पर पहुँची, तो हम दोनों एक साथ चीख पड़े। मेरा सारा रस उसकी गहराई में समा गया, और हम दोनों थककर एक-दूसरे पर गिर पड़े।
कुछ देर बाद, जब हम दोनों की साँसें सामान्य हुईं, तो हमने एक-दूसरे को देखा। उसकी आँखों में एक नई चमक थी, और होंठों पर एक संतोष भरी मुस्कान। हमने चुपचाप अपने कपड़े पहने, और एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराए। यह हमारी **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** का सिर्फ़ एक अध्याय था, जो अब हमारे खून में दौड़ता था। बाहर निकलने से पहले, प्रिया ने मेरे गाल पर एक हल्की सी चुम्बन दी और फुसफुसाई, “कल रात, फिर से?” और मैं जानता था कि इस राज़ को हम ताउम्र छुपाए रखेंगे, क्योंकि **ऑफिस में चोरी छिपे इश्क की दास्तान** का अपना ही एक अलग मज़ा था।
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