आज फिर छत पर उसकी नजरें मुझसे टकराईं, और इस बार आँखों में सिर्फ भूख थी, सम्मान नहीं। प्रिया की शादी को पाँच साल हो गए थे, पर उसके भीतर की स्त्री आज भी अधूरी थी। पति, रवि, कारोबार में इतना व्यस्त रहता कि बेडरूम में आते-आते उसकी सारी चाहतें जैसे दम तोड़ देतीं। बिस्तर पर भी उसकी मौजूदगी एक रस्म-अदायगी से ज्यादा कुछ नहीं थी, बेजान और ठंडी। प्रिया की जवानी का जोश, उसकी देह की गरमाहट, सब कुछ एक अनदेखे सूखे में तड़प रहा था। उसकी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** एक अजीब से बेचैनी में बदल गई थी, एक ऐसी भूख जो उसे हर पल खाए जा रही थी।
पड़ोस में नया आया राहुल, जो अपने तनी हुई देह और बेबाक मुस्कान से प्रिया के भीतर कुछ जगाने लगा था। उनकी आँखें जब मिलतीं, तो प्रिया को अपने शरीर में एक अजीब सी सिहरन महसूस होती। राहुल की आँखों में वो ललक थी जो रवि की आँखों में कभी नहीं दिखी। आज जब राहुल ने उसकी साड़ी से झांकती कमर पर अपनी नजरें टिकाईं, तो प्रिया के गाल सुर्ख हो उठे, पर उसने नजरें हटाईं नहीं।
“आपके पति कब लौटेंगे, प्रिया जी?” राहुल की आवाज़ में एक अजीब सी गर्माहट थी, जो प्रिया के कानों से होते हुए उसके नस-नस में उतर गई।
प्रिया ने दिल की धड़कनों को काबू करते हुए कहा, “कल सुबह तक।”
राहुल ने एक पल को प्रिया की आंखों में देखा और फिर धीरे से मुस्कुराया, “तो आज रात आप अकेली हैं?”
प्रिया ने अपनी पलकें झुकाईं और बस ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। वह जानती थी यह बात कहाँ जा रही है, और आज वह इसे रोकना नहीं चाहती थी।
आधी रात हो चुकी थी। रवि के जाने के बाद घर की खामोशी प्रिया को और बेचैन कर रही थी। तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। प्रिया जानती थी कौन है। उसने दिल थाम कर दरवाजा खोला, और सामने राहुल खड़ा था, उसकी आँखों में वही बेबाक चाहत, वही इंतज़ार। प्रिया ने बिना एक शब्द कहे उसे अंदर आने दिया। दरवाज़ा बंद होते ही, राहुल ने प्रिया को अपनी बाहों में भर लिया। उनके होंठ मिले, एक ऐसी प्यास को बुझाने के लिए जो बरसों से सुलग रही थी। प्रिया ने खुद को पूरी तरह राहुल के हवाले कर दिया, उसकी उंगलियाँ राहुल के बालों में उलझ गईं और उसकी साँसें राहुल की साँसों में घुलने लगीं।
राहुल के हाथों ने प्रिया की कमर पर सरकते हुए धीरे-धीरे साड़ी के पल्लू को नीचे गिराया। प्रिया की धड़कनें तेज हो गईं, उसकी आँखें मदहोशी में बंद हो रही थीं। राहुल ने उसके ब्लाउज के हुक खोले, और प्रिया की गोरी, सुडौल पीठ पर अपनी गर्म उंगलियां फेरने लगा। ब्रा खुलने के साथ ही, प्रिया के भरे हुए स्तन आज़ाद हो गए, और राहुल ने बिना देर किए उन्हें अपने मुँह में भर लिया, जैसे कोई भूखा बच्चा दूध के लिए तड़प रहा हो। प्रिया के मुँह से सिसकियाँ निकल पड़ीं, एक मीठी पीड़ा और आनंद का मिला-जुला एहसास।
एक-एक करके उनके वस्त्र ज़मीन पर गिरे, और दो शरीर एक दूसरे में ऐसे खो गए, जैसे कभी अलग थे ही नहीं। राहुल ने उसे उठाया और बेडरूम की तरफ ले गया, जहाँ उनकी साँसें और धड़कनें एक हो चुकी थीं। बिस्तर पर गिरते ही, प्रिया ने अपनी टांगें उसके इर्द-गिर्द कस लीं। राहुल का हर स्पर्श, हर चुंबन प्रिया को जैसे एक नई दुनिया में ले जा रहा था। उसकी रगों में एक आग दौड़ रही थी, एक ऐसी आग जिसे सिर्फ राहुल ही बुझा सकता था।
राहुल ने प्रिया की जांघों को फैलाया और धीरे-धीरे अपने मर्दानापन को उसके भीतर उतारा। प्रिया की चीख उसके होंठों से निकलती, पर राहुल ने उसे तुरंत अपने होंठों से दबा लिया। उनकी धड़कनें एक ताल में धड़कने लगीं, और प्रिया को हर धक्के के साथ एक ऐसा सुख मिल रहा था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसकी **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** आज राहुल की बाहों में पूरी हो रही थी। यह अहसास, यह चरम सुख उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
उनकी देह पसीने से भीग चुकी थी, पर चाहत अभी भी अधूरी थी, जैसे वह कभी खत्म होने वाली नहीं थी। हर बार जब राहुल थोड़ा थमता, प्रिया उसे अपनी ओर और खींचती, उसकी आँखों में एक अजीब सी भूख और तृप्ति का संगम था। जब वे आखिरकार शांति से एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़े, तो प्रिया ने राहुल की छाती पर अपना सिर रख लिया। बाहर सूरज ढल रहा था, और अंदर प्रिया की ज़िंदगी का एक नया सूरज उग रहा था, जो अब **अधूरी शादीशुदा जिंदगी की चाहत** से कहीं आगे बढ़ चुका था। उसे पता था कि अब उसकी ज़िंदगी कभी पहले जैसी नहीं रहेगी, और उसे इसका कोई अफसोस नहीं था। यह उसका सच था, उसकी अपनी चुनी हुई चाहत की पूर्ति।
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