बाहर मूसलाधार बारिश प्रकृति को धो रही थी, पर अंदर राधिका और समीर के तन-मन में एक अलग ही आग सुलग रही थी। बिजली कटी हुई थी और कमरे में सिर्फ एक टिमटिमाती मोमबत्ती का पीला प्रकाश था, जो उनके चेहरों और कमरों की दीवारों पर अजीब सी परछाइयाँ बना रहा था। राधिका ने अपनी नम साड़ी का पल्लू थोड़ा सरका लिया था, जिससे उसके भीगे कंधे और वक्षस्थल का हल्का उभार समीर को साफ़ दिख रहा था। समीर, जो अब तक अपने बिस्तर पर लेटा बारिश की आवाज़ सुन रहा था, उसकी नज़र उस पर ठहर गई।
“ठंड लग रही है क्या, राधिका?” समीर की आवाज़ में एक मीठी शरारत थी। राधिका ने पलटकर देखा, उसकी आँखों में वही पुरानी, जानी-पहचानी ललक थी, जो हर बार ऐसी रातों में तेज़ हो जाया करती थी। उसने हौले से सर हिलाया। “नहीं, बस… आज की यह बारिश की रात का उत्तेजक रोमांस कुछ और ही रंग ले रहा है।”
समीर मुस्कुराया, और बिना कुछ कहे उठकर राधिका के पास आ गया। उसका हाथ धीरे से राधिका की गीली कमर पर फिसला और एक कंपकंपी राधिका के पूरे बदन में दौड़ गई। समीर ने उसे अपनी ओर खींच लिया, उसकी साँसें राधिका की गर्दन पर महसूस हो रही थीं, गरम और उत्तेजक। राधिका ने आँखें मूँद लीं, और जब समीर के होंठ उसकी गर्दन पर उतरे, तो उसकी एक धीमी सी आह निकल पड़ी।
समीर के होंठ धीरे-धीरे ऊपर उठे, राधिका के कानों की लबों को सहलाते हुए, फिर उसके गालों से होते हुए सीधे उसके रसीले होंठों पर आ टिके। एक नर्म शुरुआत हुई, जो जल्द ही एक उग्र, प्यासी चुंबन में बदल गई। राधिका ने भी उतनी ही शिद्दत से जवाब दिया, अपने हाथ समीर की गर्दन में डाल दिए और उसे और कसकर अपनी ओर खींच लिया। उनकी जीभें एक-दूसरे से गुंथीं, जैसे सदियों की प्यास बुझा रही हों। कपड़े उनके जिस्मों के बीच बाधा बन रहे थे, और दोनों ही इस बाधा को जल्द से जल्द हटाना चाहते थे।
समीर ने चुंबन तोड़े बिना ही राधिका की साड़ी का आँचल कंधे से सरका दिया, फिर उसके ब्लाउज के हुक खोलने लगा। राधिका ने भी इसमें मदद की, उसके हाथ समीर की शर्ट के बटन पर थे। कुछ ही पलों में, उनके कपड़े ज़मीन पर पड़े थे, और दोनों के भीगे, दमकते जिस्म मोमबत्ती की रोशनी में एक-दूसरे के सामने थे। समीर की नज़र राधिका के भरे हुए वक्ष पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं। उसने धीरे से अपने होंठ राधिका की छाती पर रखे, और उसके गुलाब जैसी गुलाबी निप्पलों को प्यार से सहलाने लगा। राधिका के मुँह से दर्द और आनंद का मिश्रण निकला, उसकी उंगलियाँ समीर के बालों में फँस गईं।
समीर नीचे खिसकता गया, राधिका के पेट को चूमता, उसकी नाभि में अपनी जीभ फिराता। राधिका का शरीर एक गरम तवे पर रखे आटे की तरह मचल रहा था। वह चाह रही थी कि यह पल कभी ख़त्म न हो, पर साथ ही वह उसकी चरम सीमा तक पहुँचने को आतुर थी। समीर ने उसके जांघों को खोला और उसकी योनि के द्वार पर अपने होंठ रख दिए। राधिका का दम ही घुट गया, वह पूरी तरह से समीर के समर्पण में खो गई। समीर अपनी जीभ और होंठों से उसे उस हद तक ले गया जहाँ राधिका के पूरे बदन में एक तीव्र गुदगुदी फ़ैल गई।
जब राधिका और अधिक इंतज़ार न कर सकी, उसने समीर को ऊपर खींचा। “अब और नहीं, समीर… अब…” उसकी आवाज़ कामुकता से थर्रा रही थी। समीर ने एक मुस्कान दी और अपने लिंग को राधिका की योनि के द्वार पर टिकाया। एक गहरी साँस ली और धीरे-धीरे अंदर प्रवेश किया। राधिका की आँखों से आँसू छलक पड़े – ये दर्द के नहीं, बल्कि परम सुख के आँसू थे। उनकी गहरी, मीठी चीखें बारिश की आवाज़ में दब गईं।
समीर की धड़कनें और राधिका की आहें एक ताल में बज रही थीं। हर धक्के के साथ, उनकी आत्माएं एक-दूसरे में समाती जा रही थीं। कमरे में वासना की भीनी-भीनी ख़ुशबू फैल गई थी। उनके लिए यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि बारिश की रात का उत्तेजक रोमांस की पराकाष्ठा थी। समीर ने अपनी गति बढ़ाई, और राधिका भी उतनी ही तीव्रता से उसे जवाब दे रही थी, उसकी कमर ऊपर उठ रही थी, उसके नाखून समीर की पीठ पर अपने निशान छोड़ रहे थे।
एक तीव्र कंपन उनके पूरे शरीर में फैला, और दोनों एक साथ चरम सुख की गहराइयों में डूब गए। उनकी साँसें फूल रही थीं, और उनके जिस्म पसीने से भीगे हुए थे। समीर राधिका के ऊपर ही पड़ा रहा, उसके माथे पर पसीने की बूंदें थी। राधिका ने उसे कसकर अपनी बाहों में भर लिया। बाहर बारिश अभी भी बरस रही थी, पर उनके भीतर की आग बुझ चुकी थी, और उसकी जगह एक गहरी, अद्भुत शांति ने ले ली थी। यह एक ऐसी रात थी, जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे – बारिश की रात का उत्तेजक रोमांस, जिसने उनके दिलों को हमेशा के लिए एक कर दिया था। वे जानते थे कि हर अगली बारिश की रात उन्हें इस पल की याद दिलाएगी।
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