Story 725

उसकी नजरों में जब से मैंने खुद को देखा था, मेरी बंजर देह में एक नई आग सी लग गई थी। रवि से शादी के बाद, मेरा मन हमेशा एक अनजाने सूनेपन से घिरा रहता था। वो अपना काम, अपने दोस्त… और मैं, इस बड़े से घर की खाली दीवारों के साथ अकेली। फिर आया मोहन, रवि का छोटा भाई। उसकी आँखें मेरे जिस्म पर ऐसे टिकती थीं, जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार पर।

एक दिन, रसोई में काम करते हुए मेरा पल्लू गिरा और उसकी उंगलियां मेरे कमर पर सरक गईं। “भाभी, थोड़ा ध्यान से,” उसकी धीमी, गहरी आवाज़ ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए। वो सिर्फ एक बहाना था, मैं जानती थी। उस स्पर्श में एक ऐसी हवस थी जिसने मेरी नस-नस को जगा दिया। शाम ढलते ही, पूरे घर में एक अजीब सी खामोशी छा जाती थी। रवि देर रात तक खेत से नहीं लौटते थे। यही वो समय था जब मोहन की आहट मेरे दिल की धड़कनों को तेज़ कर देती थी।

एक रात, बारिश की फुहारें खिड़की से अंदर आ रही थीं और मेरा मन एक अजीब बेचैनी में डूब रहा था। तभी मेरे कमरे के दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। मैंने डरते-डरते दरवाज़ा खोला। सामने मोहन खड़ा था, उसकी आँखें लाल, साँसें तेज़। “भाभी… ठंड लग रही है,” उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, पर उसकी निगाहें मेरे भीगे हुए गाउन पर टिकी थीं। मैं जानती थी कि यह सिर्फ ठंड का बहाना नहीं था। यह ससुराल में चोरी का प्यार हिंदी कहानी का वो पल था, जिसे मैं बरसों से अनदेखा कर रही थी।

उसने बिना कुछ कहे, दरवाज़ा बंद कर दिया और मुझे अपनी बाहों में भर लिया। मेरे जिस्म से एक सिहरन दौड़ गई। उसकी गर्म साँसें मेरी गर्दन पर पड़ते ही, मेरा सारा विरोध, सारा डर हवा हो गया। उसने मेरे होंठों पर कब्ज़ा कर लिया, एक कामुक और भूखा चुंबन। मेरे होंठ, जो रवि के स्पर्श से कभी इतने प्यासे नहीं हुए थे, अब मोहन की हवस में भीग रहे थे। उसकी उंगलियां मेरे गीले बालों में उलझ गईं और फिर धीरे-धीरे मेरे बदन पर नीचे सरकने लगीं।

उसने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया, और मेरे ऊपर झुक गया। उसके भारी जिस्म का वज़न मुझे एक अजीब-सा सुकून दे रहा था। उसने मेरा गाउन फाड़ दिया, मेरे नग्न बदन पर अपनी हथेली फिराते हुए। मेरे स्तनों पर उसके कठोर हाथ ऐसे महसूस हो रहे थे जैसे आग की लपटें। मैं दर्द और आनंद के मिश्रण में चीख उठी, जब उसने अपने होंठों से मेरे निप्पलों को चूसा। मेरे बदन का हर रोम-रोम जाग उठा था, इस चोरी के प्यार की आग में जलकर राख होने को तैयार।

“भाभी… तुम इतनी हसीन हो,” उसकी आवाज़ कामुकता से भरी थी। उसने मेरे पैरों को फैलाया और मेरे भीतर अपनी गरम ज़ुबान से खेलना शुरू कर दिया। एक बिजली सी मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। मेरा बदन ऐंठने लगा, हर सांस के साथ एक मदहोश कर देने वाली आह निकल रही थी। जब मेरी कामुकता चरम पर थी, उसने खुद को मेरे ऊपर स्थापित किया। एक गहरे धक्के के साथ, वो मेरे अंदर समा गया।

मेरी योनि से एक चीख निकली, जो तुरंत उसके होंठों में दब गई। दर्द, फिर तीव्र आनंद, फिर सिर्फ वासना। हम दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए थे, जैसे दो प्यासे जिस्म पानी की तलाश में हो। उसकी हर धक्के के साथ, मेरे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था। मैं अपनी कमर उठा-उठा कर उसका साथ दे रही थी, खुद को इस वर्जित आनंद के हवाले करते हुए। यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, यह मेरी आत्मा का वो प्यास था जो रवि कभी बुझा नहीं पाया था।

जब हम दोनों तृप्ति की गहराई में डूब चुके थे, और हमारे जिस्म पसीने में लथपथ एक दूसरे से चिपके हुए थे, तो मोहन ने मेरे कान में फुसफुसाया, “यह ससुराल में चोरी का प्यार हिंदी कहानी… अब कभी खत्म नहीं होगी, मेरी प्यारी भाभी।” उसकी आवाज़ में एक अजीब सा अपनापन था, एक वादा था। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, अपने अंदर उस गर्माहट को महसूस करते हुए। बाहर बारिश अब भी धीमी हो रही थी, पर मेरे अंदर एक तूफ़ान थम चुका था, सिर्फ नए तूफानों की प्रतीक्षा में।

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