उसकी साड़ी से उठती पसीने की खुशबू ने रमेश के सीने में आग लगा दी थी, जो अब तक बुझाने की लाख कोशिशों के बाद भी धधक रही थी। दोपहर की तपती धूप में सीमा अपने छोटे से गाँव के घर में अकेली थी। पति शहर गया हुआ था, और उसकी अकेली रातों, अकेली दोपहरों ने उसके जिस्म में एक ऐसी तड़प जगा दी थी, जिसकी आग अब बर्दाश्त के बाहर हो रही थी। उसका बदन, हर कोने से, हर रेशे से एक मर्दाने स्पर्श के लिए प्यासा था। यह थी एक *तनहा औरत की प्यास बुझाने वाली कहानी* की शुरुआत, जिसका अंत न तो सीमा जानती थी, न ही रमेश।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। सीमा ने अपनी धड़कनें संभालते हुए दरवाजा खोला। सामने रमेश खड़ा था, वही मजबूत कद-काठी वाला जवान, जिसे उसने पिछले हफ्ते पंखा ठीक करने के लिए बुलाया था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो सीमा के भीगे हुए जिस्म को अंदर तक भेद रही थी। सीमा ने बिना कुछ कहे उसे अंदर आने का इशारा किया। गर्मी और उमस से लथपथ उसका जिस्म, उसकी पतली सूती साड़ी से साफ झलक रहा था। ब्लाउज के भीतर उसके उठे हुए स्तन और नाभि के पास पसीने की बूंदें रमेश की नज़र से छुपी नहीं थीं।
रमेश ने औजारों का बक्सा रखा और पंखे की तरफ बढ़ा, पर उसकी आँखें बार-बार सीमा की ओर मुड़ रही थीं। सीमा की आँखों में भी उतनी ही तलब थी। वह जानती थी कि आज कुछ होने वाला है। उसकी आत्मा, उसका शरीर आज इस भूख को शांत करने पर तुला हुआ था। “अकेली कब तक तड़पूँगी,” उसने मन ही मन सोचा। “आज तो बुझानी ही है यह प्यास!”
रमेश ने पंखे का तार खींचा, और अचानक बिजली चली गई। अँधेरे में कमरा और भी गरम हो गया। सीमा ने आह भरी, “लगता है आज पंखा ठीक नहीं होगा।” रमेश उसकी तरफ पलटा, उसकी आँखों में अँधेरे में भी चमकती हुई एक गहरी इच्छा थी। “कुछ और ठीक हो सकता है, भाभी,” उसने धीमी, भारी आवाज में कहा।
सीमा के जिस्म में सिहरन दौड़ गई। वह समझ गई। उसकी बेकाबू इच्छाओं ने उसे कमजोर कर दिया था। रमेश ने दो कदम बढ़ाए और सीमा के करीब आ गया। उसकी गर्म साँसें सीमा के चेहरे पर पड़ रही थीं। सीमा ने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इस पल के लिए सदियों से इंतजार कर रही थी। रमेश का मजबूत हाथ धीरे से सीमा की कमर पर फिसला, उसकी पतली साड़ी को दरकिनार करते हुए। सीमा की नरम, पसीने से तर त्वचा को छूते ही रमेश के जिस्म में आग लग गई।
वह झुका, और उसके होंठ सीमा के होंठों पर ऐसे टूट पड़े, जैसे एक प्यासा यात्री कुएं पर। सीमा ने भी पूरे जुनून से उसका साथ दिया, अपने सूखे होंठों से रमेश के होंठों को चूसते हुए, उसकी जुबान को अपने मुँह में खींचते हुए। उसकी साड़ी कब कंधे से गिरी, उसे पता ही नहीं चला। रमेश के हाथ उसकी कमर से होते हुए उसकी पीठ पर गए, और उसने ब्लाउज के हुक खोल दिए। सीमा ने खुद ही ब्लाउज उतार फेंका। उसके उभरे हुए, भारी स्तन रमेश की आँखों के सामने थे।
रमेश ने बिना देर किए एक स्तन को अपने मुँह में भर लिया, उसे चूसते हुए, हल्के से काटते हुए। सीमा के मुँह से दर्द और आनंद से भरी एक सिसकी निकली। “आह… रमेश…” उसकी आवाज़ चरम सुख की आहट थी। वह उसके बालों को सहला रही थी, अपना जिस्म उसके साथ रगड़ रही थी। रमेश ने दूसरे स्तन को भी नहीं बख्शा, उन्हें अपनी उंगलियों से मसलते हुए, कभी एक को चूसते हुए, कभी दूसरे को। सीमा की पैंटी पहले ही पसीने और कामजल से गीली हो चुकी थी।
रमेश ने उसे गोदी में उठा लिया और बिस्तर पर लिटा दिया। अब बस पेटीकोट और पैंटी ही बची थी। रमेश ने धीरे-धीरे पेटीकोट का नाड़ा खोला, और उसे एक झटके में खींच दिया। सीमा की नंगी जांघें, काम से भरी हुईं, उसके सामने थीं। उसकी पैंटी भी ज्यादा देर नहीं टिक पाई। जैसे ही वह हटी, सीमा की योनि का गुलाब रमेश की आँखों के सामने था, फूला हुआ, लाल और पूरी तरह भीगा हुआ।
रमेश ने बिना देर किए अपनी पैंट उतारी, और सीमा के पैरों के बीच आ गया। उसका मोटा, कठोर लिंग सीमा की आँखों के सामने लहरा रहा था, जिसे देखकर सीमा की आँखों में एक नई चमक आ गई। वह जानती थी कि यह वही है जो उसकी सदियों पुरानी प्यास बुझाएगा। “आह… रमेश… अब और इंतजार नहीं होता…” सीमा ने उसके बालों को खींचते हुए कहा।
रमेश ने धीरे से अपने लिंग का फन सीमा की योनि के द्वार पर लगाया, और एक झटके में उसे अंदर धकेल दिया। “आहह्ह्ह्ह्ह्!” सीमा की मुँह से एक चीख निकली, जो दर्द और आनंद का मिश्रण थी। रमेश का पूरा लिंग अंदर जा चुका था। उसने कुछ देर वहीं रुककर सीमा को इस नए एहसास से रूबरू होने दिया। फिर, उसने अपनी कमर हिलाई, और तेजी से झटके मारने शुरू किए।
बिस्तर चरम सुख की आहों और धमकियों से गूँज उठा। सीमा अपने पैरों को रमेश की कमर पर कसकर लपेटे हुए थी, हर धक्के के साथ उसकी पीठ ऊपर उठ रही थी। “और तेज़… और तेज़ रमेश… आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्!” वह चिल्लाई। रमेश ने अपनी गति और बढ़ा दी। पसीना दोनों के बदन से टपक रहा था, उनकी त्वचा एक-दूसरे से चिपक रही थी।
कई मिनटों तक चले इस बेकाबू मिलन के बाद, सीमा का बदन काँप उठा। उसकी योनि से एक गर्म धार निकली, और वह चरम सुख की पराकाष्ठा पर पहुँच गई। “आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्!!!” वह चिल्लाती हुई रमेश की पीठ पर अपने नाखूनों से खरोंच रही थी। रमेश ने भी उसके साथ ही अपना सारा वीरय उसकी गर्म योनि में उगल दिया।
दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे से चिपक गए, उनके बदन पसीने में लथपथ थे। सीमा की आँखें बंद थीं, उसके होंठों पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। उसकी तड़पती हुई आत्मा, उसका प्यासा शरीर आज पूरी तरह तृप्त हो चुका था। यह थी सचमुच एक *तनहा औरत की प्यास बुझाने वाली कहानी*, जिसकी हर बूँद ने सीमा को अंदर तक भिगो दिया था। आज के बाद, शायद उसकी रातों की नींद और दोपहर की बेचैनी, दोनों ही शांत हो चुकी थीं।
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