देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस: चोरी-छिपे जिस्मों का संगम

गर्मी की दोपहरी में जब पूरा गाँव गहरी नींद में डूबा था, सरिता भाभी की जवानी अंगारों पर जल रही थी।

सरिता अपने कमरे में दुपट्टा हटाकर, पसीने से भीगी देह को पंखे की हवा से सुकून देने की कोशिश कर रही थी। शादी को अभी कुछ ही महीने हुए थे, लेकिन पति रोहन का काम उसे अक्सर शहर से दूर रखता था। घर में सिर्फ़ वो और रोहन का छोटा भाई, विकास, ही होते थे। विकास, जो अपनी जवानी की दहलीज पर खड़ा था, उसकी आँखें अक्सर भाभी के सुडौल जिस्म पर अटक जाया करती थीं। सरिता को भी उसकी नज़रें महसूस होती थीं, और कहीं-न-कहीं उसे यह अच्छा भी लगता था। आज की दोपहर कुछ और ही कहानी कहने वाली थी।

दरवाजे पर हल्की-सी खटखटाहट हुई। सरिता ने सोचा रोहन होगा, लेकिन आवाज विकास की थी, “भाभी, पानी है क्या? प्यास लगी है।” सरिता उठी, हल्की साड़ी उसके बदन से चिपकी हुई थी। उसने दरवाजा खोला। विकास सामने खड़ा था, उसकी आँखें सरिता के खुले गले और भीगे बदन पर टिक गईं। सरिता ने झट से दुपट्टा खींचकर कंधे पर डाला, पर तब तक जो दिखना था, दिख चुका था।

“आओ विकास, अंदर आ जाओ। मैं पानी लाती हूँ।” सरिता ने कहा, उसकी आवाज़ में हल्की सी घबराहट थी। विकास अंदर आया, और उसकी नज़रें कमरे की हर चीज़ से होती हुई फिर सरिता पर आ टिकीं। सरिता जब पानी लेकर आई, तो विकास की उँगलियाँ गिलास लेते हुए जानबूझकर उसकी उँगलियों से टकराईं। एक बिजली सी सरिता के जिस्म में दौड़ गई। विकास ने पानी पिया, और खाली गिलास सरिता को देते हुए उसका हाथ पकड़ लिया।

“क्या हुआ विकास?” सरिता की साँसें तेज़ हो गई थीं।

“कुछ नहीं भाभी, बस… बस यूँ ही।” विकास ने सरिता का हाथ अपनी उँगलियों में कस लिया। उसका स्पर्श सरिता को आग लगा रहा था।

“कोई देख लेगा…” सरिता ने बुदबुदाया।

“कोई नहीं देखेगा भाभी। सब सो रहे हैं।” विकास ने सरिता को धीरे से अपनी ओर खींचा। उनका जिस्म एक दूसरे के करीब आ गया। सरिता के स्तन विकास की छाती से टकरा गए, और एक सिहरन दोनों के आर-पार हो गई।

विकास ने अपने होंठ सरिता के माथे पर रखे, फिर धीरे-धीरे गालों से होते हुए उसके अधरों तक ले गया। सरिता की आँखों से एक पल के लिए शर्म टपकी, फिर उसने आँखें मूँद लीं। विकास ने उसके रसभरे होंठों को चूमना शुरू कर दिया, पहले धीरे से, फिर बेताबी से। यह देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस अब हदें पार कर रहा था।

विकास के हाथ सरिता की कमर पर फिसल गए और उसने उसे और करीब खींच लिया। सरिता की पतली साड़ी का आँचल उसके कंधे से सरक गया, और विकास के गर्म हाथों ने उसकी नग्न कमर को थाम लिया। सरिता का जिस्म एक अलग ही आग में जल रहा था। उसने अपने हाथ विकास की गर्दन पर डाल दिए और उसकी शर्ट के बटन खोलने लगी। विकास भी पूरी तरह बेकाबू हो चुका था।

उसने सरिता को गोद में उठाया और बिस्तर की ओर बढ़ चला। सरिता ने विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी बाहों में सिमट गई। बिस्तर पर लेटते ही विकास ने बिना किसी देरी के सरिता की साड़ी और पेटीकोट उतार फेंका। अब सरिता सिर्फ़ ब्लाउज और अधोवस्त्र में थी। विकास की आँखें उसकी गोरी, सुडौल देह पर ठहर गईं। उसने ब्लाउज के हुक खोले, और सरिता के भारी स्तन उसके सामने उजागर हो गए। विकास ने एक स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा, जैसे कोई भूखा बच्चा। सरिता के मुँह से दर्दभरी आह निकल गई, उसके नाखूनों ने विकास की पीठ को खरोंचना शुरू कर दिया।

विकास ने सरिता के अधोवस्त्र को भी खींचकर नीचे गिरा दिया। सरिता की जवानी पूरी तरह से उसके सामने थी। विकास की उँगलियाँ सरिता की योनि पर फिराए, जो पहले से ही गीली और गरम हो चुकी थी। सरिता अपनी कामवासना में पूरी तरह डूब चुकी थी। “और नहीं सहा जाता विकास,” उसने फुसफुसाया। विकास ने अपने कपड़े उतारे, और अपने पूरे मर्दानगी के साथ सरिता के ऊपर आ गया।

उनकी प्यासी नज़रें मिलीं, और फिर विकास ने एक ही झटके में सरिता के भीतर प्रवेश कर लिया। सरिता की चीख उसके होंठों में ही दबकर रह गई। उनके जिस्म एक-दूसरे में समा गए। एक-दूसरे की गर्मी, उनकी साँसें, उनके पसीने की खुशबू, सब मिलकर उस दोपहर को एक यादगार बना रहे थे। यह सिर्फ़ एक शारीरिक संबंध नहीं था, यह देवर भाभी का छुप-छुप कर रोमांस था, एक भावनात्मक जुड़ाव जो चोरी-छिपे पनप रहा था। विकास सरिता के अंदर पूरी तरह डूब चुका था, और सरिता भी उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़े हुए थी। उनके हर धक्के के साथ बिस्तर चरमरा रहा था, और उनके मुँह से निकलती कामुक आवाज़ें कमरे की दीवारों से टकराकर लौट रही थीं।

कुछ देर बाद, जब दोनों थक कर चूर हो गए, तो विकास सरिता के बगल में लेट गया। सरिता ने अपना सिर विकास की छाती पर रख लिया। दोनों की साँसें अभी भी तेज़ थीं, और उनके जिस्म पसीने से भीगे हुए थे। यह एक ऐसा गहरा राज़ था जो अब उन दोनों के बीच हमेशा रहेगा। सूरज ढलने लगा था, और उनकी हवस की आग अभी भी सुलग रही थी, जो हर आने वाले दिन के साथ और भी तेज़ होती जाएगी। यह उनका अपना, गुप्त संसार था, जहाँ हर सीमा टूट चुकी थी, और हर पल बस इसी चोरी-छिपे मिलन का इंतज़ार था।

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