प्रिया के गोरे बदन की महक पहली बार मेरे घर के आँगन में घुसी, और मेरे दिल में आग लग गई। वह नई-नई पड़ोस में रहने आई थी, और उसकी हर चाल, हर मुस्कान में एक मदहोश कर देने वाला आकर्षण था। मैं, राहुल, पिछले कई सालों से अकेला था, और प्रिया को देखते ही लगा जैसे सूखे रेगिस्तान में पानी की बूँद मिल गई हो। उसकी भरी हुई छाती जब दुपट्टे से झाँकती, और उसके नितम्बों की थिरकन जब वो काम करती, तो मेरी साँसें अटक जातीं। मुझे एहसास भी नहीं हुआ कि कब मेरी इस **नई पड़ोसन से बढ़ा नजदीकियां** मेरे दिल और दिमाग पर हावी होने लगी।
एक दिन शाम को जब बिजली गुल हो गई, तो प्रिया ने घबराकर मुझे आवाज दी। वह अकेली थी, और अँधेरे से डरती थी। मैं टॉर्च लेकर उसके घर गया। मोमबत्ती की पीली रोशनी में प्रिया का चेहरा और भी मादक लग रहा था। उसने एक पतली सी रेशमी नाईटी पहन रखी थी, जो उसके बदन से चिपकी हुई थी। हम बातें करने लगे, पहले मौसम की, फिर अपनी-अपनी जिंदगियों की। मेरी निगाहें बार-बार उसके अधरों पर जा टिकतीं, जो हल्के से खुले हुए थे। जब उसने पानी का गिलास पकड़ाते हुए मेरा हाथ छुआ, तो एक बिजली सी मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई।
उसकी आँखों में भी मुझे वही प्यास दिखी जो मेरी आँखों में थी। मैं हिम्मत करके उसके और करीब आया, और उसके गालों पर अपनी उंगली फेर दी। उसकी साँसें तेज हो गईं। “राहुल…” उसने काँपते हुए कहा। मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वह पहले तो थोड़ी हिचकिचाई, फिर खुद को मेरे हवाले कर दिया। वह चूमना इतना गहरा था कि मैं दुनिया-जहान भूल गया। मेरी जीभ उसकी जीभ से मिली, और हम एक-दूसरे की मिठास पीने लगे। मैंने उसे अपनी बांहों में कस लिया, और महसूस किया कि उसके स्तन मेरे सीने से कितनी बेताबी से दब रहे हैं।
मैंने उसे अपनी गोद में उठाया और सीधा बेडरूम में ले गया। मोमबत्ती की मंद रोशनी में, मैंने धीरे-धीरे उसकी नाईटी की डोरियाँ खोलीं। उसके कपड़े उतरते ही, प्रिया का पूरा शरीर मेरे सामने एक अनमोल खजाने की तरह जगमगा उठा। उसके भरे हुए गुलाबी स्तन, जिनकी निपलें सख्त हो चुकी थीं, मुझे अपनी ओर खींच रही थीं। उसके सपाट पेट से होती हुई मेरी नजरें उसकी योनि पर गईं, जो हल्की सी गीली और फुर्तीली लग रही थी। मैं खुद को रोक नहीं पाया और उसके वक्षों पर टूट पड़ा, एक-एक निप्पल को चूसने लगा, जैसे कोई भूखा बच्चा माँ का दूध पी रहा हो। प्रिया की आहें पूरे कमरे में गूँजने लगीं। “आह… राहुल… और… और तेज…”
मैं उसके बदन को सहलाता रहा, उसकी जंघाओं के बीच अपनी उंगलियां फेरता रहा। प्रिया बेचैन हो उठी। उसने मेरी शर्ट उतार दी, और मेरे बदन पर अपने नाखूनों से हल्के-हल्के खरोंच मारे। जब हमारे बदन एक-दूसरे से पूरी तरह चिपक गए, तो गर्माहट की एक लहर दौड़ गई। मैंने अपनी पैंट उतारी, और मेरा उत्तेजित लिंग उसके सामने फन फैलाए खड़ा था। प्रिया ने उसे देखा, और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उसने धीरे से मेरे लिंग को अपने हाथ में लिया और सहलाने लगी। मेरे मुँह से दर्द भरी मीठी चीख निकल गई। “प्रिया…”
उस रात, जब अँधेरे ने हमें एक कर दिया, तब असली मायने में **नई पड़ोसन से बढ़ा नजदीकियां** का एहसास हुआ। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, और उसके पैरों को अपने कंधे पर रखकर अपनी पैनी धार को उसकी योनि के द्वार पर लगाया। प्रिया की आँखें बंद हो गईं, और उसने एक गहरी साँस ली। मैंने धीरे से अंदर प्रवेश करना शुरू किया। पहली बार में थोड़ी सी रुकावट आई, लेकिन फिर उसका शरीर मुझे अंदर खींचने लगा। जब मैं पूरा का पूरा उसके अंदर समा गया, तो वह एक साथ चिल्ला उठी, “आह्ह्ह्ह्ह्ह… राहुल… हाँ!”
हमारी धड़कनें एक हो गईं, और हमारे शरीर ताल में हिलने लगे। मैं उसे तेज और गहरा धक्के देने लगा। बिस्तर की चरमराहट, हमारे बदन के टकराने की आवाजें और प्रिया की कामुक आहें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। मैं उसके कान में फुसफुसाया, “तुम्हें कैसा लग रहा है, मेरी जान?” उसने मेरी पीठ को अपने नाखूनों से कसकर पकड़ लिया और कहा, “जैसे स्वर्ग में हूँ राहुल… और तेज… मुझे और चाहिए…” मैं उसकी बात मानकर अपनी गति और बढ़ाता गया। हर धक्के के साथ, हम दोनों एक-दूसरे में और गहराई से समाते जा रहे थे। जब हमारी पराकाष्ठा आई, तो हम दोनों एक साथ काँप उठे, और हमारे शरीरों से गर्म तरल का झरना बह निकला। हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में निढाल होकर गिर पड़े।
सुबह की पहली किरण खिड़की से कमरे में झाँक रही थी। प्रिया मेरे बगल में नग्न लेटी हुई थी, उसकी साँसें धीमी और गहरी थीं। उसने अपनी आँखें खोलीं और मुझे देखकर मुस्कुराई। उस मुस्कान में संतोष था, और एक वादा भी। मैंने उसके माथे पर चूम लिया। **नई पड़ोसन से बढ़ा नजदीकियां** सिर्फ एक शुरुआत थी, एक ऐसी शुरुआत जिसकी दहकती रातें हमारे जीवन का नया अध्याय बन चुकी थीं। अब हर दिन, हर रात, हम एक-दूसरे में खो जाने के लिए बेताब रहते थे, और मुझे पता था कि हमारी यह आग कभी बुझने वाली नहीं थी।
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