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गीत मेरे होंठों पर-2

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अंजू ने बिंदास जवाब दिया- यार, आराम से तो पति भी चोदता है, थोड़ा रगड़ के अंदर तक चुदाई हो, और थ्री सम या ग्रुप भी हो जाये तो आनंद आ जायेगा। मैं चाहती हूँ कि मर्द मुझे बड़े-बड़े लंडों से घंटों तक चोदते रहें, जब तक मैं थक कर गिर ना जाऊं। ध्यान देने वाली बात है कि, मैंने कहा- ठीक है रानी, तुझे तो अब ऐसे ही चोदूंगा. ये लिखने के साथ ही मैंने उसकी चूत और वक्ष की तस्वीर मांगी. पर उसने चूत या बोबे की पिक नहीं दी. आप लोग तो जानते ही हैं कि लड़कियां अपनी चूत या बोबे की पिक देने के लिए ऐसे डरती हैं, जैसे उनकी चूत पूरी दुनिया के लोग पहचानते हों. फिर जब मैंने उसकी कहानी लिखने की सोची, तब कहानी के लायक मूड ही नहीं बन पाता था, ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि मुझे उसके बारे में ज्यादा जानकारी ही नहीं थी. मैंने कहानी को अच्छी तरह से लिखने के लिए कुछ और चीजें अंजू जी से पूछीं, जैसे … कहानी में आपका नाम क्या होगा, आपने अपनी सील कब तुड़वाई थी, आपके पति कैसा सेक्स करते हैं, आपको सेक्स में क्या-क्या करना पसंद है, शादी के पहले किससे चुदी हो … और चुदी भी हो या नहीं, वगैरह वगैरह. मेरे बार-बार ऐसा प्रश्न करने से वो चिढ़ गई और उसने मैसेज कर दिया कि मुझे कुछ नहीं बताना है और आप मेरी कहानी भी मत लिखो. मैं जान गया कि अब ज्यादा कहना ठीक नहीं है, फिर मैंने उसे समझाते हुए एक मैसेज किया- ओके जान … आप कुछ मत बताओ, मैं कहानी लिख लूंगा. पर आपको काल्पनिक कहानी ही पढ़नी है … तो अंतर्वासना पर हजारों अच्छी कहानियां पड़ी हैं. परंतु अगर आप चाहती हो कि मैं आपकी सच्ची कहानी लिखूँ, तो उसके लिए मुझे आपके बारे में कुछ जानना भी तो जरूरी होना ही चाहिए. मेरी इस बात का तुरंत तो कोई जवाब नहीं आया, पर थोड़ी देर से जवाब आया कि कहानी में मेरा नाम गीत लिखना, मैं शादीशुदा हूं, पति के साथ सेक्स लाईफ अच्छी है, पर वो बाहर रहते हैं, इसलिए कम ही सेक्स होता है. उम्र 28 है, मेरा साइज 32-28-34 है. फिर उसने अंत में लिखा कि यार कहानी में थ्रीसम तो करवा ही देना. मुझे अच्छा लगा कि उसने मेरी बातों को समझ कर अपने बारे में मुझे इतनी सारी बातें कहीं और उसने कहानी के लिए जो नाम कहा, उसने तो मेरे मन को तरंगित ही कर दिया. मुझे नहीं पता कि कहानी में उसने अपना नाम गीत रखने के लिए क्यों कहा, पर जुबां पर इस नाम के आते ही मेरी धड़कनों ने गुनगुनाना शुरू कर दिया. गीत … गीत … गीत … ओ मेरी गीत … आई लव यू गीत … आई मिस यू सो मच गीत … मेरे मन में ऐसे शब्दों की बाढ़ सी आ गई … और मैंने मैसेज करके उसे भी ये सब कहा. अब जब से कहानी लिखने की बात हुई थी, तब से हमारी बातचीत बढ़ गई थी. मैंने कहानी लिखना शुरू भी कर लिया था, पर भूमिका से आगे कुछ लिख ही नहीं पा रहा था. अब मैं अंजू को गीत के नाम से पुकारने लगा, अब मेरी दीवानगी बढ़ने लगी थी, तो मैंने एक रोज गीत को मैसेज किया कि क्या कर रही हो जान … थोड़ा पास आओ ना, आपकी बहुत याद आ रही है. मेरी उम्मीद के विपरीत तुरंत ही जवाब आ गया कि मैं तो आपके पास ही हूँ. तो मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए उसे सेक्स चैट की ओर मोड़ना चाहा. उसने कुछ हद तक मेरा साथ भी दिया. पर अचानक रुककर उसने मुझसे कहा- यार सुनो ना … मुझे माफ कर दो, अभी मेरा सेक्स वाला मूड नहीं है. आप मेरा एक काम करोगे क्या? मैंने विनम्रता के साथ कहा- कोई बात नहीं जानेमन … अभी मन नहीं है, तो फिर कभी कर लेंगे. अब बताइए कि क्या काम है आपको? तो उसने कहा- यार, मेरे लिए एक कविता लिख दो ना! ये संदेश लिखने के साथ ही उसने मुझे कविता के लिए पूरी थीम भी भेज दी. थीम में उसने अपनी लाईफ जो उसने बायफ्रेंड के साथ बिताई थी, उसे लिख भेजी थी. वो सब पढ़ कर मैंने कहा- यार, कविता तो लिख दूंगा, परन्तु मेरा इनाम कहां है? उसने पहली बार पूरे चेहरे वाली अपनी एक तस्वीर भेजी, जिसे मैंने देखा, तो देखते ही रह गया … और साथ ही उसने लिख भेजा कि ये बातें किसी को मत बताना. आप दो कविताएं लिखना. उसमें एक ऐसी कि पढ़ कर जी आंखों से आंसू आ जाएं … और दूसरी ऐसी की चूत रस बहा दे. अच्छी कविता लिखने पर आखिर में इससे अच्छा गिफ्ट मिलेगा. मैंने भी खुशी से हां कहते हुए अच्छी कविता लिखने का वादा किया. कविता तो मैंने थोड़ी देरी से लिखी, परन्तु उससे पहले मैं उसकी तस्वीर और उसके नाम में खो गया. सबसे पहले तो मेरी नजर उसके आंखों में जाकर ठहर गई … जैसा उसका नाम था, वैसी ही आभा उसके चेहरे में नजर आ रही थी … आहहह … बस दिल में बस सी गई थी वो. गीत की आंखों में संगीत. काश मैं होता उसका मीत.. गर मिल जाए वो मुझको, तो मैं ये दुनिया लूंगा जीत… गीत की आंखों में संगीत … काश मैं होता उसका मीत.. मैं आशिक उसका हूँ मुरीद, मेरी प्यारी सोनी कुड़ी गीत. तोड़ दूँ बस एक इशारे पर, मैं इस दुनिया की सारी रीत. गीत की आंखों में संगीत.. काश मैं होता उसका मीत.. ना जाने मेरे मन में ऐसी और कितनी ही बातें, शायरी और ख्वाब उमड़ने लगे. उसने आंखों में काजल लगा रखा था और तस्वीर में पोजीशन ऐसी थी कि मानो वह मुझसे ही नजरें मिला रही हो, बड़ी बड़ी चमकीली आंखें, चमन में अपनी कशिश तरंगित कर रही थीं. हां एक बात और बताना तो मैं भूल ही गया, उसने अपनी भौंहें (आइब्रो) भी नहीं बनावाई थीं. शायद वो ये बात भलिभांति जानती है कि उसकी सुंदरता किसी सौंदर्य प्रसाधन या किसी उपक्रम की मोहताज नहीं है. कुछ सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल तो वो करती ही है, पर बहुत ज्यादा लीपापोती से उसे परहेज है, क्योंकि मेरी गीत के लिए उसकी सादगी ही उसका शृंगार है. जब किसी बहुत सुंदर मूर्ति या चित्र को कलाकार अपनी कल्पना से बनाता है, तब उसकी कल्पना में ऐसी ही कोई अपसरा की छवि मुद्रित रहती होगी. मेरी गीत पर चार चांद लगा रहे थे, उसकी चंदा जैसी बिंदिया. उसने गोल सामान्य आकार की बिंदी लगा रखी थी, जो उसके मुखमंडल को और भी आकर्षित बना रही थी. फिर मेरी नजर उसके शरबती लबों तक पहुंची. कसम से यार उसके गुलाब के पंखुड़ियों जैसे होंठ देख कर मैंने भी अपने होंठों पर जीभ को फेर लिया. मन तो किया कि मैं उस तस्वीर में दिख रही मेरी गीत के लबों को ऐसे चूसूं … ऐसे चूसूं … ऐसे चूसूं कि क्या बताऊं कि कैसे चूसूं! मैं एक साहित्यकार हूं, फिर भी मेरे पास इस बात को बताने के लिए शब्द नहीं है. हां जीवन में मैंने बहुत सारी लड़कियों के लबों को महसूस किया है, पर इस बार जो अहसास मेरे अंतर्मन को हुआ, वो सच में अवर्णनीय है. उसके लालिम कपोल … किसी को भी पल में आकर्षित कर सकते थे, उसे देख कर लगा कि यार अगर कोई बेचारा मर्द ऐसी युवती को कहीं अकेले में देख ले, तो चांस तो मारेगा ही, ऐसे केस में उसे दोष देना भी गलत होगा. जब किसी की अदा ही इतनी कातिलाना हो, तो भला कोई क्या कर सकता है. उसका रंग तो ऐसा था कि दूध और उसमें कोई फर्क ही पता ना चले. रंग के मामले में ये कहा जा सकता है कि ये पिक या कैमरे का कमाल हो सकता है, पर मैंने भले उसके चेहरे को नहीं देखा था. अब तक मैंने उसकी दस बारह तस्वीरें देख ली थीं, उस आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि मेरी गीत बहुत गोरी और एकदम दमकती साफ त्वचा वाली लड़की है. आप लोगों ने एक बात गौर किया होगा कि गीत को मैंने शादीशुदा बताया है, फिर भी उसे हर बार युवती ही कह रहा हूँ. उसका कारण यह है कि उसे देख कर कोई भी यही कहेगा कि ये 20-21 साल की चंचल बाला है. मृगनयनी तो वह थी, पर उसकी ठोड़ी के बीच में हल्का गहरापन … उसकी मोरनी जैसी सुराहीदार गर्दन और सुंदर रेशमी केश उस अपसरा को और भी लाजवाब बना रहे थे. उसके चेहरे पर आ रहे लट ऐसे लग रहे थे … मानो कि वो मेरी गीत के लिए वाद्ययंत्र पर संगीत देने के लिए आतुर हो रहे हों. अब मेरा बेइमान मन खुद पर कब तक काबू कर पाता, तो उसने भी अपने मतलब की चीज ढूंढनी चाही. अब मेरा ध्यान मेरी गीत के वक्ष स्थल पर गया और मैंने उस स्थान को बड़े सम्मान के साथ देखा, क्योंकि ये औरत का वह ऐसा अंग होता है, जिससे गौरव, अभिमान, सुंदरता, परिपक्वता, सृजनता, कामुक्ता, ममत्व, सुडौलता का भान होता है. वास्तव में इन्हीं कारणों से ही औरत के सभी अंगों में लोगों के मुख्य ध्यान या आकर्षण का केन्द्र वक्ष स्थल होता है. फिर मेरे गीत के वक्ष की तो बात ही कुछ और थी. मैंने जितनी बातें ऊपर लिखी हैं, उनमें से सारी खूबी मेरी गीत के उन्नत उभारों में मौजूद थे, मैंने उसकी संपूर्ण गोलाई को महसूस किया, उसके काल्पनिक स्पर्श के अहसास मात्र ने ही मुझे अन्दर तक रोमांचित कर दिया, लंडदेव ने उसकी सुंदर घाटी में सैर करने की इच्छा जाहिर करते हुए फुंफकार मारी, तो मेरे होंठों और हाथों की उंगलियों में उसके आकर्षक चूचुकों को सोचकर थिरकन हो गई. मेरी नजर जब अन्दर की ओर धंसी हुई सुंदर सपाट उदर से होती हुई उसकी बल खाने को तैयार कमर पर पहुंची. तब मेरा मन एक बार फिर आहह किए बिना नहीं रह पाया. गीत के हर अंग में कटाव था, सुडौल बदन और सुंदर मन की मलिका, अपने हुस्न की अदाओं की बिजली गिराने लगी. कोई उन्हें साक्षात अपने सामने ऐसे कातिल रूप में देख ले, तो कसम से यार उसके लंड का जल उसी समय बाहर आ जाएगा, जैसा कि मेरा आ गया. मैंने अपनी गीत के पूरे बदन का अनुमान उस एक पिक से लगा लिया था. अब जरा सोचिए कि जब मुलाकात होगी, तब क्या होगा. फिर मैंने अपने मोबाइल को ही चूम कर अपनी जानेमन का अहसास किया. उन्हीं अहसासों में खोये रहकर उसकी बताई थीम के आधार पर कविता लिख भेजी. मैंने पहली कविता उदासी वाली भेजी, जिस पर उसका काफी अच्छा रेस्पोंस आया. फिर उसने कहा कि अब जल्दी से मुझे हॉट कर देने वाली कविता भी भेज दो. मुझे सबसे ज्यादा उसी का इंतजार है. मैंने कहा- हां जान … मैं उसी काम में लगा हूँ. फिर थोड़ी मेहनत के बाद मैंने एक बहुत अच्छी मन में कामुकता भर देने वाली कविता लिख कर भेजी. इस बार भी मेरी कविता गीत को बहुत पसंद आई, पर उसने कहा कि कविता तो बहुत अच्छी है, पर इसमें मेरी थीम वाली बात नहीं आ पाई. मैंने उससे दुबारा लिखने का वादा किया. इस पर उसने थीम को … मतलब अपनी आपबीती को थोड़ा और बारीकी से बताया. फिर मैंने और मेहनत करके एक बहुत गर्म कविता लिखी … और इस बार मेरी गीत भी बहुत खुश हुई. उस खुशी के बदले मुझे मेरा इनाम मेरी गीत की एक बहुत अच्छी पिक के रूप में मिला. मैंने उसे बहुत सारा धन्यवाद दिया और पहले पिक की तरह इस दूसरी पिक में भी खो गया. गीत की इस पिक में उसकी ब्रा की पट्टी हल्की सी नजर आ रही थी, इसलिए लंडदेव ने सलामी और जोरों से दी और निशा को मैंने अपनी गीत को याद करके अपनी पत्नी को कसके चोदा. फिर दूसरे रोज ये बात मैंने अपनी गीत को बताई. उसे भी ये सुनकर अच्छा लगा. फिर मैंने बातों ही बातों में उससे कहा कि यार जब तुमने मुझे अपने बारे में इतना बता ही दिया है, तो अब थोड़ा खुल कर सब बता दो, तो फिर कहानी में आनंद ही आ जाएगा. पता नहीं उसने क्या सोचा, परन्तु जवाब आया कि ठीक है … अब जब भी निशा को हमारी बात होगी, मैं आपको सब कुछ बता दिया करूंगी. फिर आप कहानी लिख लेना. मैं अपनी सफलता पर खुश हो गया और दूसरे रोज निशा होने का इंतजार करने लगा. रात लगभग दस बजे उसका मैसेज आया- हाय क्या कर रहे हो? मैंने जवाब दिया- आपका इंतजार कर रहा हूँ, आज आप कुछ बताने वाली थी ना! फिर उसका मैसेज आया कि अच्छा हां … तो बताओ कहां से शुरू करें? मैंने भी लिखा कि आपकी जहां से मर्जी हो, वहां से बता दो. फिर उसने बताना शुरू किया: मैं आज भले ही दिल्ली में रहती हूँ, पर मेरा मायके एक दूसरे बड़े शहर में है. अच्छा चलो सब कुछ शुरू से ही बताती हूँ. मैं एक खानदानी युवती हूँ. बचपन से ही धन दौलत और मान सम्मान की कोई कमी नहीं रही है, परिवार में मम्मी पापा के अलावा एक बड़ा भाई है और बहुत से करीबी रिश्तेदार हैं, जिनसे हमारा मधुर संबंध है. घर में छोटी होने की वजह से मुझे शुरू से ही सबने बहुत ज्यादा लाड़ दुलार के साथ रखा. मेरी हर इच्छा मेरे कहने से पहले ही पूरी कर दी जाती थी, इसीलिए मेरा स्वभाव भी चंचल हो गया. मुझे एक शहर के सबसे बड़े और नामी गर्ल्स स्कूल में भर्ती कराया गया था. वहां मेरी बहुत अच्छी सहेलियां बनी, जैसे सबकी होती हैं. मैं पढ़ाई में भी अच्छी थी, अब यूँ ही मस्ती करते रोज बीत रहे थे. हमारे स्कूल के आसपास बहुत से मंदिर और गार्डन थे. शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, माँ दुर्गा का मंदिर और बहुत से सामाजिक भवन भी थे. ये सब मैं इसलिए बता रही हूँ क्योंकि जब मैं थोड़ा घूमने फिरने लायक बड़ी हुई, तब इन जगहों पर मैं सहेलियों के साथ अकसर घूमने चले जाया करती थी. सभी मंदिर भव्य और आकर्षक बने हुए हैं, आसपास घूमने बैठने लायक व्यवस्था की गई है, सुरक्षा इंतजाम भी तगड़े होते हैं. फूलों फलों से लदे पेड़ों के नीचे कब हमारा समय व्यतीत हो जाता था, कुछ पता ही नहीं चलता था. मैं उस समय बड़ी कक्षा में पहुंच चुकी थी, मेरी खास सहेलियों की गिनती उंगलियों में की जा सकती थी. कुल तीन ही तो सहेलियां मेरी खास थीं, जिनसे मेरा दिल का संबंध था … और ऐसे हंसने बोलने वाली सहेलियां तो कितनी रही होंगी, बताना भी मुश्किल है. परन्तु बढ़ती उम्र के साथ रसूखदार घरों की लड़कियों पर पाबंदियां भी बढ़ने लगती हैं. मैं अपने घर के लिए उनकी ऊंची नाक थी, इसलिए मुझे रोकना टोकना अपनी इन्हीं कक्षाओं से ही शुरू हो गया था. इसीलिए मैं अपनी सहेलियों को भी अपने घर किसी खास मौके पर ही बुला पाती थी. कुछ तो उन्हें मेरे बिगड़ जाने का डर था और उसकी वजह से अपनी इज्जत की चिंता रहती थी और कुछ डर, मेरी खूबसूरती और जमाने में हो रहे अपराधों को लेकर भी था. चूंकि मैं बचपन से ही बहुत ज्यादा सुंदर रही हूँ, कुछ लोग मेरी सुंदरता देखकर मुझे परी कहकर पुकारते थे. पर बढ़ती उम्र के साथ मुझे लगने लगा कि लोग मेरी झूठी तारीफ करते हैं, या रिश्तेदार यूँ ही स्नेहवश परी कह देते हैं. मैं ऐसा इसलिए सोचती थी क्योंकि जब मैं अपनी सहेलियों को देखती थी, तब मुझे अपना बदन कमजोर सा लगता था. मेरी तीन सहेलियों में मीता मेरे जैसी ही पतली दुबली और लंबी युवती थी, उसमें और मुझमें अंतर ये था कि मैं ज्यादा गोरी थी और वो मुझसे थोड़ा कम, परन्तु चेहरे की बनावट और खूबसूरती में हम दोनों ही एक दूसरे से कम ना थे. मेरी दूसरी सहेली परमीत जिसे देखकर हम सबको ही कभी-कभी जलन होने लगती थी, उसकी ऊंचाई मेरे जैसी ही थी, पर उसके सीने पर उभार हम लोगों से ज्यादा थे. वो सुंदरता में भी ठीक ही थी और बदन का हर अंग भरा पूरा था. उसके गोल तंदुरुस्त बदन को देख कर खुद से तुलना करना और भी बुरा लगता था. मेरी तीसरी सहेली तो और भी गजब की थी, सुंदरता में भी आगे, पढ़ाई में भी आगे और शारीरिक बनावट में भी सबसे आगे रहती थी. उसका नाम मेनका था, पर हम सब उसे मनु पुकारते थे. उसकी हाईट हम लोगों से थोड़ी कम थी, पर उसके सीने के उभार, पैरों की गुंदाज पिंडलियां, मांसल शरीर, फूले हुए गाल … उसका सब कुछ काफी आकर्षक था. तभी तो लड़के जब भी छेड़ते थे, तो उनका पहला शिकार मनु ही होती थी. हमारे स्कूल के पीछे थोड़ी ही दूरी पर लड़कों का हॉस्टल था और उससे थोड़ी ही दूरी पर लड़कों का भी स्कूल था, तो घूमने फिरने वाली सभी जगहों पर यदाकदा लड़कों से भी हमारा सामना हो ही जाता था. कुछ लड़के तो बहाना करके हमसे बातें भी कर लिया करते थे और कुछ शरारती लड़के हमें दूर से छेड़ने लगते थे. उनको देखकर लगता था कि वे उम्र में हमसे बड़े हैं. खैर … अगर वो हमारी उम्र के भी होते, तब भी हमारा व्यवहार वैसा ही होता जैसा उनके साथ था, रूखा और काम से काम रखने वाला. वैसे हमें ऐसी छेड़खानियां कम ही झेलनी पड़ती थीं, क्योंकि हमसे और बड़ी लड़कियां, जो हमारे ही स्कूल की होती थीं, उनके साथ छेड़खानी ज्यादा होती थी. उनमें से कुछ लड़कियां तो अब किसी-किसी लड़के के संपर्क में भी आ चुकी थीं … और कहीं-कहीं ऐसे लड़की-लड़के साथ बैठे भी नजर आ जाते थे. उनको देख कर हम सहेलियां आपस में बात करती थीं कि देखो ये युवती कैसे बिगड़ गई है. पर कभी-कभी हम मजाक भी करते थे कि देखो युवती कैसे मजे ले रही है. वैसे उस समय हम ऐसे किसी भी विषय में ज्यादा नहीं जानती थीं … या कहिए कि उम्र का वह पड़ाव सीखने का था. हमारी रूचि इन विषयों पर मासिक धर्म के शुरू होने बाद होने लगी. हमारी जानकारी में सबसे पहले परमीत को ही मासिक धर्म आये थे. बात तब की है जब हमने अपनी क्लास की अर्धवार्षिक परीक्षा दी थी, उसके तुरंत बाद परमीत तीन रोज स्कूल नहीं आई थी. हम सबको ये पता चला था कि उसकी तबीयत खराब है. हम उसकी चिंता कर रहे थे. पर जब भरे-पूरे मस्त बदन वाली परमीत स्कूल आई, तब उसके चेहरे से नहीं लगा कि उसकी तबीयत खराब रही होगी, बल्कि वो और भी निखर गई थी. हम सबने उससे कहा- वाहह रे, तू तो अब तबीयत का बहाना बना के छुट्टी भी लेने लगी है. उसने मुँह बंद रखने का इशारा करते हुए कहा- शशश … अभी चुप रहो … स्कूल के बाद हम कॉफ़ी शॉप में जाएंगे, वहां मैं सब अच्छे से बताऊंगी. अब तक हम सब स्कूल बस से ही स्कूल आया करते थे, पर इसके बाद हम अपनी-अपनी लेडीज साइकलों से स्कूल आने लगे थे, इसलिए थोड़ा समय हम घूमने-फिरने या चाय कॉफी की पार्टी के लिए निकाल लेते थे. हमारे स्कूल के दो दिशाओं से होकर रास्ते गुजरते थे. बगल वाला रास्ता थोड़ा कम चौड़ा था, पर सामने हाईवे पड़ता था, जिसे पार करके ही व्यापारिक जोन पड़ता था. हाईवे पर तेज मोटर गाडिय़ों के डर से वहां हम किसी काम का बहाना करके ही जा सकते थे. जहां चाय कॉफी की केंटीन, बुक स्टाल, स्टेशनरी शॉप, जूस कार्नर, डेली नीड्स और साईबर कैफे जैसी सभी जरूरत की छोटी-बड़ी चीजें हमें हाईवे पार करने के बाद ही मिलती थीं. पास के सभी स्कूल कॉलेजों और हॉस्टलर लड़के लड़कियों के लिए वह जोन अपनी जरूरत को पूरा करने के साधन के अलावा आकर्षण और मौज मस्ती का भी केंद्र बन गया था. किसी की बर्थडे पार्टी हो, या अच्छे रिजल्ट की प्रसन्नता हो … या जवानी की मस्ती को चख चुके लड़की-लड़कों को मिलना हो … सबको ही वह जोन बहुत पसंद आता था. परमीत भी छुट्टी के बाद हमें वहीं ले गई, ऐसे भी हम वहां जाते ही थे. पर हमारा वहां जाना अभी कम ही हो पाता था. वहां जाकर हम चारों केंटीन में बैठे. वहां कुछ लड़के बर्थडे पार्टी कर रहे थे. परमीत उन सबके शोरगुल के बीच कुछ बता पाने में फ्री महसूस नहीं कर रही थी. पता नहीं ऐसी क्या बात थी, जिसके लिए वो इतना डर रही थी. हमने तय किया कि यहां से निकलकर हम सब रास्ते में पड़ने वाले छोटे गार्डन में बैठकर बात करेंगे. बस हम वहां से चाय पीकर ही निकल गए. हम अपने घरों की ओर आगे बढ़ गए और रास्ते में पड़ने वाले गार्डन में रुक गए. हम सभी के मन में कौतूहल था कि आखिर परमीत हमें क्या बतायेगी. हम सब गद्देदार घास पर पास-पास बैठ गए और उस सूनी जगह पर भी हम किसी गुप्त चर्चा करने जैसा अपने सिर को और पास ले आए. अब मुझसे रहा नहीं गया, तो मैंने कहा- जल्दी बता ना कुतिया … और कितना तड़पाएगी. तब परमीत ने कहा- मेरे नीचे से खून आता है. मीता ने कहा- नीचे से … मतलब कहां से? तब परमीत ने अपनी चुत की तरफ इशारा करके दिखाया और हम सबके चेहरे के रंग ही बदल गए. कहानी जारी रहेगी. अपनी राय इस पते पर दें. 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