एक बेवा का शिकार-2
एक शाम मैंने फिर मुठ्ठ मार कर उसकी चड्डी में पोंछ कर टांग दिया तथा अपने कमरे की खिड़की से उसकी प्रतिक्रिया देखने लगा। उसने जब वस्त्र समेटे तभी महसूस कर लिया कि मैंने फिर वही हरकत की थी परन्तु इस बार उसने नीम अँधेरे में चड्डी को गौर से देखा, फिर मुड़ कर मेरे कमरे की दिशा में देख कर मेरा अंदाज़ा लगाया तथा फिर चड्डी को नाक के पास ले जाकर सूंघने लगी तथा सूंघते हुए ही नीचे चली गई। मैंने राहत की मील भर लम्बी सांस ली कि मेरा मिशन अब सफल होने वाला था। दो रोज बाद मुझे अपने कमरे के बंद दरवाज़े के नीचे एक चिट्ठी पड़ी मिली। जिसमे लिखा था:
“मैं भी वही चाहती हूँ जो तुम चाहते हो परन्तु मेरी लाज मुझे ऐसा करने से रोकती है। आज शाम सभी लोग फ़िल्म देखने जाने वाले हैं, मैं कोई बहाना करके घर रुक जाऊँगी, तुम आओगे तो दरवाज़ा खुला मिलेगा, मैं अपने कमरे में रहूँगी परन्तु बिल्कुल अँधेरे में, मेरी हिम्मत नहीं कि मैं रोशनी में ऐसा कर सकूँ। तुम्हें भी याद रखना होगा कि अँधेरे को कायम रहने दोगे। ”
उस रोज़ काम पर मेरा मन बिल्कुल न लगा तथा मैं शाम होते ही घर की तरफ भागा, परन्तु फिर भी पहुँचते-पहुँचते सात बज गए। दरवाज़ा वाकई खुला मिला जो मैंने अन्दर होते ही बंद कर लिया,घर में सन्नाटा छाया हुआ था। असल में, मैंने निदा के कमरे की तरफ देखा, अँधेरा कायम था। मैं आहिस्ता से उसके कमरे में घुसा, कपड़ों कि सरसराहट बता गई कि वह मेरे इंतज़ार में थी, बाहर की रोशनी में बेड पर एक साया पसरा दिखा। मैं आहिस्ता से चल कर उसके पास बैठ गया। “मैं कब से इस पल के इंतज़ार में था। ”
“बोलो मत, वक़्त इतना भी नहीं है। ” उसने सरसराते हुए कहा। फिर मैंने देर करने के बजाय उसे दबोच लिया। वह लता की तरह मुझसे लिपट गई। मैंने अपनी गर्म हथेलियों की छुअन से उसकी चूचियाँ तथा कमर सब रगड़ डाली। उसने भी बड़ी बेकली से मेरे होंठों से अपने होंठ चिपका दिए तथा एक प्रगाढ़ चुम्बन की शुरुआत हो गई। मैंने अपनी ज़ुबान उसके मुँह में दे दी जिसे वह बड़ी मस्ती में चूसने लगी। फिर अपनी ज़ुबान उसने मुझे दी तो मैंने भी उसके होंठ तथा ज़ुबान जी भर के चूस लिए। ध्यान देने वाली बात है कि, मेरा एक हाथ उसकी दाहिनी चूची पर रेंग रहा था तथा दूसरा उसके बालों को थामे था। फिर मैंने उसे खुद से अलग किया। “कपड़े उतारो। असल में, ”
उसने कोशिश नहीं की, मैंने ही जल्दी-जल्दी उसके सारे वस्त्र उतार फेंके, यहाँ तक कि चड्डी भी न रहने दी तथा फिर खुद के भी सारे वस्त्र उतार डाले। ध्यान देने वाली बात है कि, अब बेड पर हम दोनों नंग-धडंग एक-दूसरे से लिपटने लगे, मैं उसे बुरी तरह चूम रहा था चुभला रहा था तथा वो उसी बेकरारी से मुझे चूम कर जवाब दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे बरसों की प्यासी हो तथा आज सारी प्यास बुझा लेना चाहती हो। उसकी नरम-नरम चूचियाँ.. उसकी उम्र के हिसाब से कुछ ज्यादा ही मुलायम थीं, शायद वैधव्य में अपने हाथों से ही मसलती रहती थी परन्तु निप्पल मज़ेदार थे तथा किशमिश जैसे मस्त थे जिन्हें चूसने में मज़ा आ गया। जिस वक़्त मैं एक हाथ से उसके एक चूचे को चूस रहा था तथा दूसरे को मसल रहा था, वह पैरों से मुझे जकड़ने की कोशिश करती, मेरे बालों को मुट्ठियों में भींचे थी तथा सिसकारते हुए अपने हाथ से ही अपनी चूची मेरे मुँह में ठूँसने को ऐसे तत्पर थी, जैसे खिला ही देना चाहती हो। चूचियों को चूसते हुए मैंने अपना घुटना उसकी जांघों के जोड़ पर लगाया तो चिपचिपा हो गया, तब मैंने एक हाथ नीचे ले जाकर उसकी चूत को छुआ तो वहाँ से कामरस की धारा बह रही थी। अब उसकी चूची छोड़ कर मैंने उसे चूमते हुए नीचे सरका तथा वहीं रुका जहाँ उसके कामरस के ख़रबूज़े जैसी महक मेरे नथुनों से टकराई। मैंने वहीं मुँह घुसा दिया। अब ज़ुबान से जो कामरस चाटना शुरू किया तो उसकी सीत्कारें तथा तेज़ हो गई तथा बदन में ऐंठन पड़ने लगी। उसकी कलिकाएँ मध्यम आकर की थीं, जिन्हें मैं ज़ुबान तथा अपने होंठ से दबा के पकड़ कर खींचने लगा तथा साथ में उसके क्लिटोरिस हुड को भी छेड़े जा रहा था तथा वो किसी नागिन की तरह मचलने लगी थी। फिर मैंने अपनी बिचल्ली ऊँगली उसके गीले छेद में अन्दर सरका दी, वह एकदम से तड़प उठी तथा उसके मुँह से एक ज़ोर की ‘आह’ जारी हुई। मुँह से लगातार उसकी चूत पर हमला करते मैंने अपनी ऊँगली अन्दर-बाहर करनी शुरू की तो उसकी कराहें तथा तेज़ हो गयीं। उसने एक हाथ से सेज की चादर दबोच ली थी, तो दूसरे हाथ से मेरे सर के बाल नोचे जा रही थी। जब मुझे लगा कि अब वो जाने वाली है, तो मैंने मुँह हटा लिया तथा ऊँगली भी निकाल ली। सच कहूं तो, ऐसा लगा जैसे उसकी जान निकल गई हो, पर जल्दी ही मैंने उसकी खुली बुर के छेद पर अपना लंड रख कर अन्दर सरका दिया। उसने मुझे दबोचना चाहा परन्तु मैंने उसे दूर ही रखा तथा बाकायदा उसकी टांगों के बीच बैठ कर दो तीन बार में लंड गीला कर के पूरा अन्दर ठांस दिया। ध्यान देने वाली बात है कि, वह होंठ भींचे ज़ोर-ज़ोर से कराह रही थी तथा मैंने उसके पांव पकड़ कर धक्के लगाने शुरू किये। ऐसा लग रहा था जैसे हर धक्के पर उसके अन्दर कोई करेंट प्रवाहित हो रहा हो। अपनी तरफ से वह कमर उचका-उचका कर हर धक्के का जवाब देने की कोशिश कर रही थी। फिर उसी पोजीशन में वह ऐंठ गई तथा मुझे अपने ऊपर खींच कर दबोच लिया तथा कांप-कांप कर ऐसे झड़ने लगी, जैसे बरसों का दबा लावा अब फूट-फूट कर निकल रहा हो। पर अभी मेरा नहीं हुआ था, मैंने उसे फिर से चूमना, सहलाना शुरू किया तथा लंड बाहर निकाल कर फिर अपनी ऊँगली से उसकी कलिकाओं को छेड़ने लगा तथा चूचियों को चूसने लगा। जल्दी ही वह फिर तैयार हो गई तथा मैंने इस बार उसे बेड से नीचे उतार लिया। सच कहूं तो, एक पांव नीचे तथा एक पांव ऊपर तथा इस तरह हवा में खुली चूत में मैंने अपना लंड ठूंस कर उसके नरम गद्देदार चूतड़ों पर, जो धक्के मारने शुरू किये, तो उसकी ‘आहें’ निकल गईं तथा जल्दी ही वह खुद भी अपनी गाण्ड आगे-पीछे करके सहयोग करने लगी। यकीन मानिए, इसी तरह वह सिस्कार-सिस्कार कर चुदती रही तथा मैंने हांफते हुए चोदता रहा तथा जब लगा के अब निकल जाएगा तो लंड उसकी बुर से बाहर निकाल कर उसके चूतड़ पर दबा दिया तथा जो ‘फच-फच’ करके माल निकला, वह उसके चूतड़ों पर मल दिया। फिर दोनों सेज पर गिर कर हाँफ़ने लगे। “सुनो, मैं बिना गाँड मारे नहीं रह सकता। सच कहूं तो, तुम्हें अच्छा लगे या बुरा, दर्द हो या छेद फट ही क्यों न जाए मैं बिना मारे छोड़ूँगा नहीं। ”
उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह पड़ी रही तथा मैं उसी हालत में उठ कर कमरे से निकला तथा रसोई में आ गया। तेल ढूंढने में ज्यादा देर न लगी, मैं उसे लेकर वापस उसके पास पहुँचा तथा उस पर चढ़ कर फिर उसे उत्तेजित करने लगा। ध्यान देने वाली बात है कि, थोड़ी ही कोशिश में वह मचलने लगी तथा बुर जो उसने पोंछ ली थी, वो फिर से रसीली हो गई। मैंने इस बार सीधे अर्ध उत्तेजित लंड को उसकी बुर में डाला तथा धक्के लगाने लगा। आपको बता दूं कि, वह गर्म होने लगी तथा उसकी बदन की लहरें मुझे बताती रही। असल में, जब उसे चुदने में खूब मज़ा आने लगा तथा मेरा लंड भी पूर्ण उत्तेजित हो गया तो मैंने लंड निकल कर उसे कुतिया की तरह चौपाया बना लिया तथा अब तेल में ऊँगली डुबा डुबा कर उसकी गा्ण्ड के कसे छेद में करने लगा। शुरू में वह कसमसाई पर फिर एडजस्ट कर लिया तथा य़ू ही एक के बाद दो तथा दो के बाद तीन ऊँगलियाँ तक उसके कसे चुन्नटों से भरे छेद में डाल दी। जब मुझे लगा कि अब लंड जाने भर का रास्ता बन गया है, तो लंड को तेल से नहला कर मैंने ठूँसना शुरू किया.
जैसे ही सुपाड़ा अन्दर गया, वह जोर से कराह कर आगे खिसकी.. परन्तु मैं भी होशियार था। यकीन मानिए, मैंने उसकी कमर थाम ली थी तथा निकलने नहीं दिया, उलटे तेल की चिकनाहट के साथ पूरा लंड अन्दर ठेल दिया। “उई ई ई .. ऊँ ऊँ …ओ..!
“बस हो गया, डरो मत, तुम अपने हाथ से अपनी क्लिटोरिस सहलाओ, चूत उत्तेजित रहेगी तो मरवाने का भी मज़ा आएगा। यकीन मानिए, ”
उसने ऐसा ही किया तथा फिर जब मैंने उसके गुदाज नरम चूतड़ों पर थाप देते हुए उसकी गाँड़ में लंड पेलना शुरू किया, तो थोड़ी ही देर में उसे मज़ा आने लगा तथा इसके बाद फिर उसे नीचे चित लिटा कर, फिर उसकी टांगें उठा कर उसके घुटने पेट से मिला दिए तो उसकी गाँड़ का छेद इतना ढीला हो चुका था कि उसने मेरे लंड का कोई विरोध ना किया तथा आसानी पूरा अन्दर निगल लिया। फिर कुछ ज़ोर-ज़ोर के धक्कों के बाद मेरा फव्वारा छूट ही पड़ा तथा मैंने पूरी ‘ट्यूब’ उसकी गाण्ड में खाली कर दी तथा उसके बगल में गिर कर हाँफ़ने लगा। सच कहूं तो, इतनी मेहनत तथा दो बार के डिस्चार्ज ने इतनी हालत खस्ता कर दी कि होश ही न रहा। होश जब आया जब बाहर घन्टी बजी। जल्दी-जल्दी दोनों ने वस्त्र पहने तथा मैं ही बाहर निकल कर दरवाज़ा खोलने पहुँचा, पर ये देख कर हैरान रह गया कि बाहर असलम भाई के साथ उनके दोनों बच्चे तो थे परन्तु उनकी बीवी ज़रीना के बजाय उनकी बहन निदा भी मौजूद थी। असल में, “अरे तुम… ज़रीना कहाँ है?”
मेरी एक ठंडी सांस छूट गई तथा मैंने आहिस्ता से सर हिला कर कमरे की तरफ इशारा किया तथा जीने से ऊपर बढ़ आया। मेरे लिए समझना मुश्किल नहीं था कि कमरे में मेरे लौड़े के नीचे जरीना थी तथा मेरे साथ क्या हुआ था, परन्तु अजीब कमीनी औरत थी कि इतना चुदने के बाद भी हेकड़ी बरक़रार थी तथा क्या मज़ाल कि उसके चेहरे से ऐसा लगता कि मुझसे चुद चुकी हो। बहरहाल जो मेरा शिकार थी, वह पच्चीस साल की बेवा, वो वैसे ही नरमी तो दिखा रही थी परन्तु चुदने जैसा कोई इशारा नहीं दे रही थी, उसके चक्कर में ही मैं निशा को अपने कमरे का दरवाज़ा खुला रख के ही सोता था कि उसे आने में दिक्कत न हो तथा अँधेरे में ही अपनी लाज छुपा कर चली आए। फिर आंटी की चुदाई के चार रोज़ बाद एक निशा ऐसा मौका भी आया… जब निशा के किसी पहर मेरी आँख खुल गई। आपको बता दूं कि, खुलने का कारण मेरे लंड का खड़ा होना तथा उसका गीला होना था। ध्यान देने वाली बात है कि, मैंने अपनी इंद्रियों को सचेत कर के सोचा तो समझ में आया कि कोई मेरे लंड को अपने गीले-गीले मुँह में लिए लॉलीपॉप की तरह चूसे जा रहा था। मैंने देखने की कोशिश की पर साये से ज्यादा कुछ न दिखा। कहानी जारी रहेगी। यकीन मानिए, मुझे आप अपने विचार यहाँ मेल करें। What did you think of this story