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मैं और मेरी मामी-1

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प्रतीक के जीवन में मामी मंजू एक ऐसी उपस्थिति थी जो हमेशा एक नरम, रेशमी धुंध की तरह मंडराती रहती थी। यकीन मानिए, उनकी उम्र लगभग अड़तीस के करीब थी। ध्यान देने वाली बात है कि, पर उनके भरे-पूरे बदन पर ढीली-ढाली, चिकनी साड़ियाँ कुछ इस तरह लिपटती थी कि उनकी हर चाल में एक मादक प्रवाह होता था। साड़ी हमेशा उनकी नाभि के ठीक नीचे बँधी होती, तथा हर थोड़े समय पर वह उसे हल्के से ऊपर खींच कर या कमर पर उँगलियों से छू कर एडजस्ट करती रहती, मानो अपने अस्तित्व के इस अनकहे आकर्षण को बार-बार पुष्ट कर रही हो। प्रतीक, जो अपनी युवावस्था की दहलीज पर खड़ा था, अक्सर अनजाने में ही उनकी इस देहयष्टि तथा उनके सहज हाव-भाव पर ठहर जाता। एक दोपहर, जब सूरज की तपिश सड़कों को झुलसा रही थी, मंजू ने स्कूटी सीखने की इच्छा जताई। “प्रतीक, ये स्कूटी चलाना सिखा दो ना, कब तक दूसरों पर निर्भर रहूँगी?” उनकी आवाज़ में एक हल्की सी मनुहार थी, जो प्रतीक को मना करने का कोई मौका ही नहीं देती। “ठीक है मामी, चलो,” प्रतीक ने कहा, उसके मन में एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ रही थी। वे घर के पीछे वाली शांत सड़क पर पहुँचे। मंजू स्कूटी पर आगे बैठी, उनके हाथ एक्सिलरेटर तथा ब्रेक पर थे। प्रतीक उनके ठीक पीछे बैठा, उसकी साँसें उनकी पीठ से आ रही गर्मी को महसूस कर रही थी। उसने अपने हाथ उनके हाथों के ऊपर रखे, “ऐसे पकड़ो मामी, ये एक्सिलरेटर है, तथा ये ब्रेक। यकीन मानिए, ” जैसे ही उसके हाथ उनके नरम, गोल हाथों पर टिके, एक हल्की सी सिहरन दोनों में दौड़ी। मंजू ने एक पल के लिए अपनी साँस रोकी। स्कूटी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। प्रतीक के हाथ, अब उनके हाथों के ऊपर से फिसल कर, अनजाने में ही उनके वक्षस्थल को छूने लगे थे। साड़ी का पतला कपड़ा, उनकी देह की गरमाहट, तथा उनके स्तनों की हल्की सी गोलाई, सब कुछ एक साथ प्रतीक की उंगलियों में सिमट आया। एक पल को उसे लगा जैसे उसके हाथ में कोई नरम, उत्तेजित गुब्बारा आ गया हो। उसके भीतर कुछ जागृत होने लगा। उसके पैंट के भीतर, उसका लिंग, जो अब तक शांत था, धीरे-धीरे कठोर होने लगा। एक हल्की सी रगड़, फिर एक और, जैसे ही स्कूटी थोड़ी डगमगाती, उसके हाथ तथा करीब आ जाते। मंजू ने एक गहरी साँस ली, “ओह! ये तो बड़ा मुश्किल है। ” उनकी आवाज़ में एक हल्की घबराहट थी, पर प्रतीक को लगा जैसे उसमें एक अनकही उत्तेजना भी छिपी थी। असल में, “बस धीरे-धीरे सीख जाओगी मामी,” प्रतीक ने कहा, उसकी आवाज़ थोड़ी भारी हो गई थी। उसने अपने हाथ उनके वक्ष से हटाकर धीरे से उनके कंधों पर रखे। अब उसकी उंगलियाँ उनके ब्लाउज के कपड़े को महसूस कर रही थी। सड़क में जगह-जगह गड्ढे थे। हर गड्ढे पर स्कूटी उछलती, तथा प्रतीक का बदन मंजू के बदन से तथा चिपक जाता। एक बड़ा गड्ढा आया, तथा स्कूटी बुरी तरह हिली। प्रतीक ने संतुलन बनाने के लिए अपने हाथों को कस लिया। कंधे से फिसल कर उसके हाथ उनकी कमर तक आ पहुँचे। ध्यान देने वाली बात है कि, उसकी उंगलियाँ उनकी कमर की नाजुक गोलाई को महसूस कर रही थी, जहाँ साड़ी तथा त्वचा का मिलन होता था। एक तथा गड्ढा आया, गहरा तथा अप्रत्याशित। स्कूटी इस बार इतनी ज़ोर से उछली कि प्रतीक को लगा वे गिर जाएँगे। उसने बिना सोचे-समझे, अपने दोनों हाथों से मंजू को कस कर पकड़ लिया। एक हाथ उनकी कमर पर मजबूती से टिका था, उनकी त्वचा की गर्माहट सीधे उसकी हथेली में समा रही थी। दूसरा हाथ, गलती से या नियतिवश, उनके भरे हुए स्तन पर जा टिका। उसकी उंगलियाँ स्तन की ऊपरी गोलाई को छू रही थी, जहाँ साड़ी का ढीलापन उसे एक नरम, लचीला एहसास दे रहा था। ध्यान देने वाली बात है कि, मंजू के मुँह से एक हल्की सी चीख निकली, पर वह चीख डर की कम तथा किसी तथा एहसास की ज़्यादा थी। उनकी साँसें तेज़ हो गईं। प्रतीक ने अपने हाथ तुरंत हटाए नहीं। सच कहूं तो, उसे लगा जैसे उसकी हथेली में एक धड़कन महसूस हो रही है, मंजू के दिल की धड़कन या शायद उसकी अपनी। “संभाल कर मामी, गिर जाती अभी,” प्रतीक ने कहा, उसकी आवाज़ में एक बनावटी चिंता थी, पर उसकी आँखों में एक अलग चमक थी। “हाँ-हाँ, संभाल कर ही चलाओ,” मंजू ने फुसफुसाया, उनकी पीठ प्रतीक के सीने से लगी थी, तथा उसे उनकी दिल की धड़कनें स्पष्ट सुनाई दे रही थी। यह घटना बार-बार दोहराई गई। यकीन मानिए, हर बार जब स्कूटी किसी गड्ढे में जाती, प्रतीक के हाथ अनजाने में ही मंजू के बदन के उन हिस्सों को छू जाते, जो अब तक उसके लिए वर्जित थे। असल में, हर बार एक हल्की सी सिहरन, एक अनकहा रोमांच दोनों के बीच दौड़ जाता। मंजू जानती थी, प्रतीक भी जानता था, पर दोनों में से कोई भी इस खेल को रोकना नहीं चाहता था। कुछ हफ्तों बाद, एक नई मुसीबत ने घर में दस्तक दी। मामा की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें तेज बुखार तथा लगातार खांसी हो रही थी। ध्यान देने वाली बात है कि, कई दिनों तक घर पर इलाज चला, पर जब कोई सुधार नहीं हुआ, तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। असल में, अस्पताल में कई टेस्ट हुए, डॉक्टरों ने कई जाँचें की। बीमारी का पता चलने में समय लगा, तथा यह समय प्रतीक तथा मंजू को एक-दूसरे के करीब ले आया। प्रतीक रोज मंजू को अपनी बाइक पर अस्पताल ले जाता। सुबह-शाम का यह सफर, जो कभी सिर्फ एक ज़रूरत था, अब उनकी ज़िंदगी का एक अभिन्न अंग बन गया था। मंजू प्रतीक के पीछे बैठती, उसके कंधे पर हाथ रखकर। रास्ते में, शहर की टूटी-फूटी सड़कें, वही पुराने गड्ढे, एक बार फिर उनके बीच की दूरी मिटा देते। सच कहूं तो, जैसे ही बाइक किसी गड्ढे में उतरती, मंजू का बदन प्रतीक से टकराता। उनके स्तन, जो साड़ी के भीतर ढीले से झूल रहे थे, प्रतीक की पीठ पर आकर दब जाते। हर बार एक नरम, गरमाहट भरा दबाव। प्रतीक को उनकी पीठ पर, अपने बदन पर, उनके स्तनों का आकार महसूस होता। यकीन मानिए, एक हल्की सी रगड़, जैसे कोई रेशमी चीज़ उसके बदन से फिसल रही हो। वह जान-बूझ कर कुछ गड्ढों से बाइक को धीरे करता, ताकि यह स्पर्श कुछ पल तथा लंबा खिंच सके। “उफ़! ये सड़कें भी ना,” मंजू फुसफुसाती, पर उनकी आवाज़ में अब उतनी घबराहट नहीं थी। अब उसमें एक स्वीकार्यता थी, एक हल्की सी आहट, जिसे प्रतीक बखूबी समझता था। “हाँ मामी, शहर में सड़कें कहाँ ठीक हैं,” प्रतीक जवाब देता, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी शांति थी। वह अपनी बाइक को तथा धीमा कर देता, ताकि मंजू के स्तन उसके पीठ पर तथा देर तक टिके रहें। ध्यान देने वाली बात है कि, वह उनकी सुगंध महसूस कर पाता था, हल्की सी गुलाब तथा पसीने की मिली-जुली कोमल, जो उसे अपनी ओर खींचती थी। अस्पताल में, वे मामा के कमरे में घंटों बैठे रहते। जब मामा सो जाते, तो वे बाहर गलियारे में बैठते, या अस्पताल के छोटे से बगीचे में। वे एक-दूसरे से बातें करते, मामा की बीमारी, घर की परेशानियाँ, भविष्य की चिंताएँ। इन बातों के बीच, उनके दिल एक-दूसरे के करीब आते गए। यकीन मानिए, मंजू अपनी कमजोरियों को प्रतीक के सामने रखतीं, तथा प्रतीक उसे सांत्वना देता, सहारा देता। आपको बता दूं कि, एक शाम, जब वे अस्पताल से लौट रहे थे, आसमान में काले बादल छाए हुए थे। प्रतीक ने अपनी बाइक की गति बढ़ा दी। एक सुनसान सड़क पर, तेज़ बारिश शुरू हो गई। “ओह! प्रतीक, अब क्या करें?” मंजू ने घबरा कर कहा। “कोई बात नहीं मामी, यहीं पास में एक पुरानी दुकान है, वहाँ रुक जाते है,” प्रतीक ने कहा, तथा बाइक को एक बंद दुकान के सामने रोका। वे दुकान के छज्जे के नीचे खड़े हो गए। बारिश की बूँदें तेज़ हवा के साथ अंदर आ रही थी। मंजू की साड़ी बारिश से भीगने लगी थी। प्रतीक ने देखा, साड़ी उनके बदन से चिपक गई थी, उनके वक्षों की गोलाई, उनकी कमर का उभार, सब कुछ स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी उठने लगी। “ठंड लग रही है मामी?” प्रतीक ने पूछा। “हाँ, थोड़ी सी,” मंजू ने अपने हाथों को अपनी बाहों पर रगड़ते हुए कहा। प्रतीक ने अपनी जैकेट उतारी, “ये पहन लो। ध्यान देने वाली बात है कि, ” “नहीं, तुम पहन लो, तुम्हें ठंड लग जाएगी,” मंजू ने मना किया। “नहीं मामी, मैं ठीक हूँ। यकीन मानिए, तुम पहन लो,” प्रतीक ने ज़ोर दिया। मंजू ने जैकेट ले ली तथा उसे पहना। जैकेट प्रतीक की थी, जो मंजू के लिए थोड़ी बड़ी थी, पर उसने उसे एक अजीब तरह से घेर लिया। बारिश की आवाज़, उनकी साँसों की आवाज़, तथा उनके दिलों की धड़कनें, सब एक साथ गूँज रही थी। “मामी, तुम काफी परेशान लग रही हो,” प्रतीक ने धीरे से कहा। मंजू ने उसकी ओर देखा, उनकी आँखों में नमी थी। “क्या करूँ प्रतीक, सब कुछ इतना मुश्किल हो गया है। मामा की तबीयत, घर की चिंता…” उनकी आवाज़ भर्रा गई। प्रतीक ने धीरे से अपना हाथ उनके कंधे पर रखा। “सब ठीक हो जाएगा मामी, मैं हूँ ना। ” इसके आगे की कहानी अगले पार्ट में।