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जिस्मानी रिश्तों की चाह-50

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यकीन मानिए, सम्पादक जूजा तीन रोज से आपी हमारे कमरे में नहीं आई थी। चौथे रोज भी जब वक्त बीत गया तो मैं आपी को देखने निकला। आपी अपने कमरे में अम्मी तथा हनी के साथ थी। आपी ने मुझे देख लिया तथा आपी बाहर आई, मैंने वासना से उनको छुआ तो वो कुछ गुस्सा हुई तथा मुझे अपने कमरे में जाने को कहा। आपी ने मेरी तरफ एक फ्लाइंग किस की.. परन्तु मैं बुरा सा मुँह बना कर घूम कर सीढ़ियों की तरफ चल दिया। मैंने पहली सीढ़ी पर क़दम रखा ही था कि मुझे पीछे दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई.. आपी कुछ देर तक वहीं रुकी.. मुझे देखती रही थीं। परन्तु मैंने पलट कर नहीं देखा.. तो वो अन्दर चली गईं। यकीन मानिए, मैं भी अपने कमरे में वापस आया तो फरहान सो चुका था.. मुझे आपी पर काफी गुस्सा आ रहा था तथा मैं उसी गुस्से तथा बेबसी की ही हालत में लेटा तथा फिर पता नहीं कब मुझे भी नींद ने अपने आगोश में ले लिया। यकीन मानिए, सुबह फरहान ने उठाया तो कॉलेज जाने का दिल नहीं चाह रहा था.. इसलिए मैंने फरहान को मना किया तथा फिर सो गया। दूसरी बार मेरी आँख खुली तो 10 बज रहे थे। मैं नहा धो कर फ्रेश हुआ तथा नीचे आया तो अम्मी टीवी लाऊँज में बैठी टीवी देखते हुए साथ-साथ मटर भी छीलती जा रही थीं। मैंने अम्मी को सलाम किया तथा डाइनिंग टेबल पर बैठा ही था कि आपी भी मेरी आवाज़ सुन कर अपने कमरे से निकल आईं तथा उसी वक़्त अम्मी ने भी मटर के दाने निकालते हुए आवाज़ लगाई- रुहीई..! बाहर आओ बेटा.. भाई को नाश्ता दे दो.. ‘जी अम्मी आ गई हूँ.. देती हूँ अभी..’ आपी ने अम्मी को जवाब देकर किचन की तरफ जाते हो मुझे देखा। आपको बता दूं कि, मैंने भी आपी को देखा तथा गुस्से में मुँह बना कर नज़र फेर लीं। इस एक नज़र ने ही मुझे आपी में आज एक खास परन्तु काफी प्यारी तब्दीली दिखा दी थी.. आपी ने हमेशा की तरह अपने सिर पर स्कार्फ बाँधा हुआ था तथा बड़ी सी चादर ने उनके बदन के नशेबोफ़राज़ को हमारी नजरों से छुपा रखा था.. लेकिन खास तब्दीली थी कि आपी की बड़ी-बड़ी सुंदर आँखों में झिलमिलता काजल.. आपी ने आज आँखों में काजल लगा रखा था तथा उससे आपी की सुंदर आँखें मज़ीद हसीन तथा बड़ी नज़र आ रही थीं। आपी नाश्ते की ट्रे लेकर आईं तथा टेबल पर मेरे सामने रखते हुए आहिस्ता- आवाज़ में बोलीं- अल्ल्लाआअ मेरी जान.. नाराज़ है मुझसे.. मैंने आपी को कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने ट्रे से निकाल कर ऑमलेट परांठा मेरे सामने रखा तथा मेरे गाल पर चुटकी काट कर अपने दाँतों को भींचते हुए बोलीं- गुस्से में लगता बड़ा प्यारा है.. मेरा सोहना भाई। मैंने बुरा सा मुँह बना कर आपी के हाथ को झटका.. परन्तु मुँह से कुछ ना बोला तथा ना ही नज़र उठा कर उनको देखा। मुझे यह खौफ भी था कि अगर मैंने नज़र उठाई तो आपी के सुंदर गुलाबी गाल तथा उनकी हसीन आँखें.. जो काजल की वजह से मज़ीद सितम ढा रही हैं.. मुझे ऐसे क़ैद कर लेंगी कि मैं अपनी नाराज़गी कायम रखना तो दूर की बात.. दुनिया ओ माफिया ही से बेखबर हो जाऊँगा। मैंने चुपचाप नज़र झुकाए हुए ही नाश्ता करना शुरू कर दिया। आपी कुछ देर वहाँ ही खड़ी रहीं.. फिर अम्मी के पास जाकर मटर छीलने में उनकी मदद करने लगीं। मैंने नाश्ता खत्म किया ही था कि आपी ने पौधों को जल देने वाली बाल्टी उठाई तथा अम्मी को कुछ कहते हुए बाहर गैराज में रखे गमलों को जल लगाने के लिए चली गईं। मैं टीवी लाऊँज के दरवाज़े पर पहुँचा ही था कि अम्मी की आवाज़ आई- सगीर मोटर चला दो.. ये युवती पौधों को जल लगाते-लगाते पूरी टंकी ही खाली कर देगी। आपको बता दूं कि, टीवी लाऊँज के दरवाज़े से निकल कर राईट साइड पर हमारे घर का छोटा सा लॉन है.. तथा लेफ्ट साइड पर गाड़ी खड़ी करने के लिए गैरज है। ध्यान देने वाली बात है कि, गैरज के अन्दर वाले सिरे पर ही मोटर लगी हुई है तथा गैरज के बाहर वाले सिरे पर तो ज़ाहिर है हमारे घर का मेन गेट ही है। मैं मोटर का बटन ऑन करके मुड़ा ही था कि आपी ने मेरा हाथ पकड़ कर झटका दिया तथा अपने दोनों हाथ अपनी कमर पर रख कर बोलीं- ये क्या ड्रामा है सगीर.. बात क्यों नहीं कर रहे हो मुझसे? मैंने अभी भी आपी की तरफ नहीं देखा तथा नज़र झुकाए हुए ही नाराज़ अंदाज़ में कहा- बस नहीं करनी मैंने बात.. मेरी मर्ज़ी.. आपी ने मेरी ठोड़ी को अपने हाथ से ऊपर उठाया तथा मुहब्बत भरे अंदाज़ में कहा- सगीर.. मैं भी तो मजबूर हूँ ना.. बस अब नाराज़गी खत्म करो.. चलो शाबाश मेरी तरफ देखो.. मेरा सोहना भाई.. नज़र उठाओ अपनी। ध्यान देने वाली बात है कि, मैंने नज़र नहीं उठाई परन्तु आपी के हाथ को भी नहीं झटका- आपी कितने रोज हो गए हैं.. आप नहीं आई हो.. आप का अपना दिल चाहता है तो आती हो.. मेरी खुशी के लिए तो नहीं ना.. ‘मुझे पता है.. आज 5 रोज हो गए हैं मैंने अपने सोहने भाई को खुश नहीं किया.. मैं क्या करूँ मेरी जान.. मौका ही नहीं मिल पाया है.. परन्तु मैं आज निशा लाज़मी कोशिश करूँगी.. ओके..’ आपी ने ये कहा तथा मेरी ठोड़ी से हाथ हटा लिया तथा मेरे चेहरे पर अपनी नजरें गड़ा दीं। आपको बता दूं कि, मैंने आपी की बात सुन कर भी अपना अंदाज़ नहीं बदला तथा हल्का सा गुस्सा दिखाते हुए बोला- अभी भी ये ही कह रही हो कि कोशिश करूँगी.. यानि कि आज निशा को भी आने का प्रोग्राम नहीं है? ‘यार तुम्हें पता ही है कि फरहान तथा हनी के फाइनल एग्जाम होने वाले हैं.. हनी निशा में 3-4 बजे तक पढ़ाई करती रहती है.. मैं उसके सामने कैसे आऊँ? तुम भी तो एक बार ज़िद पकड़ लेते हो.. तो कोई बात समझते ही नहीं हो। अब आपी के लहजे में भी झुंझलाहट पैदा हो गई थी। थोड़ी देर तक ऐसे ही आपी मेरे चेहरे पर नज़र जमाए रहीं तथा मेरी तरफ से कोई जवाब ना सुन कर.. कुछ फ़ैसला करके बोलीं- ओके ठीक है.. ऐसी बात ही तो ये लो.. ये कहते हुए आपी ने अपनी सलवार में अपने दोनों अंगूठों को फँसाया तथा एक ही झटके में अपने पाँव तक पहुँचा दिया तथा अपनी चादर तथा क़मीज़ को इकठ्ठा करके अपने पेट तक उठा लिया तथा मेरी तरफ पीठ करते हुए बोलीं- चलो अभी तथा इसी वक़्त चोदो मुझे.. मैं कसम खाती हूँ कि तुम्हें नहीं रोकूँगी.. आओ चोदो मुझे.. अपनी बहन का ये अंदाज़ देख कर मैं दंग ही रह गया तथा हकीक़तन डर से मेरी गाण्ड ही फट गई। मैं खुद भी ऐसी हरकतें करता ही था.. परन्तु जब बंदा खुद कर रहा हो.. तो समझ आता है.. जेहन मुतमइन होता है कि कोई मसला हुआ तो मैं संभाल ही लूँगा.. परन्तु आपी की ये हरकत मेरे वहमोगुमान में भी नहीं थी। हम से चंद क़दम के फ़ासले पर ही टीवी लाऊँज का दरवाज़ा था तथा अन्दर अम्मी बैठी थीं तथा सामने घर का मेन गेट था। अगर कोई भी घर में दाखिल होता तो पहली नज़र में ही हम दोनों सामने नज़र आते। अब हालत कुछ ऐसी थी कि आपी ने मेरी तरफ पुश्त की हुई थी तथा थोड़ी सी झुकी खड़ी थीं.. उनके सुंदर गुलाबी.. चिकने कूल्हे मेरी नजरों के सामने थे। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं ! झुकने से आपी के दोनों कूल्हों के दरमियान का गैप थोड़ा बढ़ गया था तथा आपी की गाण्ड का डार्क ब्राउन सुराख भी झलक दिखला रहा था। उससे थोड़े ही नीचे आपी की सुंदर चूत के लब नज़र आ रहे थे.. जो थोड़े उभर गए थे तथा आपस में ऐसे मिले हुए थे कि चूत की बारीक सी लकीर बन गई थी। आपी की साफ तथा शफ़फ़ गुलाबी रानें अपनी मुकम्मल गोलाई के साथ कहर बरपा रही थीं। मुझे हैरत का शदीद झटका लगा था। आपको बता दूं कि, मैं गुमसुम सा ही खड़ा था तथा मेरी नज़र आपी की नंगी रानों तथा कूल्हों पर ही थी कि आपी की आवाज़ मुझे होश की दुनिया में वापस ले गई। ‘चलो ना.. रुक क्यों गए हो.. आओ डालो अपना लण्ड मेरी चूत में..’ तेजी से मैं आगे बढ़ा तथा आपी के कंधों को थाम कर ऊपर उठाने की कोशिश करते हुए बोला- दीवाना हो गई हो आपी.. क्या कर रही हो.. उठो ऊपर.. सीधी खड़ी हो.. तथा सलवार ऊपर करो अपनी.. आपी ने अपने कंधों को झटका दे कर मेरे हाथों से अलग किया तथा वैसे ही झुकरझुके अपने हाथ से मेरे लण्ड को पैंट के ऊपर से ही मज़बूती से पकड़ कर दबाया तथा जिद्दी लहजे में ही कहा- नहीं.. मैं नहीं होती सीधी.. तुम इसे बाहर निकालो तथा अभी इसी वक़्त मेरी चूत में डाल कर ठंडा कर लो अपने आपको.. अपनी ख्वाहिश पूरी करो आओ.. तुम जिद्दी हो.. तो मैं भी तुम्हारी ही बहन हूँ। यह बोलते हो आपी की आवाज़ भर्रा गई थी तथा उनकी आँखों में नमी भी आ गई थी। मैं नीचे झुका तथा आपी की सलवार को पकड़ कर ऊपर करने के बाद आपी के हाथ से उनकी क़मीज़ तथा चादर भी छुड़वा दी.. जो उन्होंने अपने एक हाथ से अपने पेट पर पकड़ रखी थी। सच कहूं तो, इसके बाद मैंने मज़बूती से आपी के कंधों को पकड़ा तथा उनको सीधा खड़ा करके अपने सीने से लगा लिया। आपी ने अपना चेहरा मेरे सीने से लगा दिया तथा रोते हो हिचकियाँ लेकर बोलीं- सगीर.. मुझसे नाराज़.. नहीं हुआ करो.. मैं मर जाऊँगी.. अच्छा। मैंने अपना एक हाथ आपी की कमर पर रखा तथा कमर सहलाते हुए दूसरे हाथ से उनके सिर को अपने सीने से दबा कर बोला- अच्छा बस ना आपी.. रोया मत करो ना यार.. गुस्सा कर लो.. मार लो मुझे.. परन्तु रोया मत करो.. मेरा दिल हिल जाता है। आप अपने ख्यालात कहानी के अंत में अवश्य लिखें। वाकिया मुसलसल जारी है। [email protected] What did you think of this story