वासना के पंख-11
दोस्तो, आपने पिछले भाग में पढ़ा कि कैसे संध्या ने दो लंडों से चुदवाने की इच्छा ज़ाहिर की तथा दूसरे लंड के लिए अपने सगे भाई का प्रस्ताव रखा। संध्या ने अपने पुराने राज़ खोले कि कैसे उसकी कामुकता ने उसे अपने भाई के नज़दीक पहुंचाया तथा कैसे अपने भाई से केवल गांड मरवा कर वो शादी तक अपनी चूत कुंवारी रखी। अब आगे…
नीचे सैंया ऊपर साहिल
यह सारी कहानी सुनाने के बाद संध्या ने मोहन से पूछा कि वो ये सब सुन कर नाराज़ तो नहीं है?
मोहन- नहीं यार, अब क्या नाराजगी? मुझे वैसे भी गांड मारने का कोई खास शौक नहीं है। तूने मुझे कुँवारी चूत का मज़ा दिला दिया तथा क्या चाहिए? रही बात भाई की … तो अब उस बात पे क्या नाराज़ होऊंगा, अब तो मैं खुद मादरचोद बन के बैठा हूँ। संध्या- तो फिर अगर आपको ऐतराज़ ना हो तो मुझे आपसे चूत तथा साहिल से गांड एक साथ मरवाने में बड़ा मज़ा आएगा। मोहन- ऐतराज़ क्या होगा? एक काम कर अभी राखी आने वाली है तो सुधीर को यहीं बुलवा ले। बाकी सब मैं सम्हाल लूँगा। अगले ही दिन संध्या ने अपने भाई को संदेश भिजवा दिया कि इस साल राखी पर वो ही आ जाए तथा साथ में इशारे के तौर पर ये भी लिख दिया कि कुछ पुरानी यादें ताज़ा करनी हैं। सच कहूं तो, यह पढ़ कर सुधीर समझ गया कि शायद उसकी बहन राखी पर उपहार में उसका लंड चाहती है। यह इशारा इसलिए था ताकि सुधीर अकेला ही आये। सच कहूं तो, राखी को ज्यादा समय बचा भी नहीं था। सुधीर ने अकेले जाने का कोई बहाना सोच लिया। सच कहूं तो, एक समस्या तथा थी वो ये कि माँ को बताना है या नहीं। संध्या ने इस बारे में मोहन को कहा तो उसने कहा कि वो माँ से बात करके पता करेगा। फिर एक निशा मोहन सोने के समय अपनी माँ के कमरे में पहुँच गया तथा संध्या के सरदर्द का बहाना बना कर उसने अपनी माँ को चोदा तथा चुदाई के बाद जब लंड चूत में ही फंसा था, वो अपनी माँ से चिपका उनके स्तनों को सहला रहा था। ध्यान देने वाली बात है कि, मोहन- माँ… एक बात बता?
माँ- पूछ?
मोहन- मेरी कोई बहन होती तो तू उसको चोदने देती क्या?
माँ- चोदन तो तोय जा चूत बी ना मिलती… अब का करूँ, मो सेई चुदास सेन नी भई। यकीन मानिए, मोहन- मेरा मतलब अगर मेरी बहन होती तथा हमसे भी रहा नहीं जाता तथा हम दोनों चुदाई करने लगते तो तू मना करती क्या?
माँ- तथा नी तो का…! अब बा की चूत बा के खसम के लाने… पर तू काय इत्तो खोद खोद के पूछ राओ है। थारी तो कोई भेन हैइज नी। मोहन- कुछ नहीं ऐसे ही पड़े पड़े मन में ख्याल आया इसलिए पूछ लिया। चल अब तू सो जा। मैं चलता हूँ अब। मोहन ने तथा ज्यादा पूछना सही नहीं समझा क्योंकि माँ को शक होने लगा था कि बात क्या है। इन सब बातों से ये भी नहीं लगा कि माँ को भाई-बहन की चुदाई मंज़ूर हो सकती है। मोहन ने ये बात संध्या को बताई तथा दोनों ने निर्णय लिया कि माँ को ये बात ना बताई जाए। संध्या- परन्तु फिर कैसे करेंगे? माँ की खिड़की तो आजकल सारा टाइम खुली रहती है। इतने दिन के बाद मस्त चुदाई मिलेगी। मुझे वो छोटे से मेहमानों के कमरे में नहीं चुदाना। ऊपर से बेचारे साहिल ने आज तक हमेशा गांड ही मारी है कभी चोदा नहीं। पहली बार उनसे चुदवाऊँगी तो कुछ तो ख़ास होना चाहिए ना। असल में, मोहन- एक काम करेंगे, मैं सुधीर के पास चला जाऊँगा तथा तुम माँ को कुछ बहाना बना कर वो कांच बंद कर देना। आखिर राखी वाले दिन सुबह सुधीर आ गया। रक्षाबंधन का मुँहूर्त दोपहर का था तो मोहन सुधीर से खेती-किसानी की बातें करने लगा। असल में, संध्या जल्दी से नाश्ता ले कर आ गई। उसने मोहन तथा सुधीर को नाश्ता दिया तथा वापस रसोई में खाना बनाने के लिए जाने लगी तो सुधीर ने उसे वहीं उनके साथ बैठने को कहा। संध्या ने मोहन से नज़रें बचाते हुए सुधीर से कहा- मैं तो अपना नाश्ता कर ही लूंगी.
और फिर आँख मार कर अपनी एक उंगली बड़े कातिलाना अंदाज़ में ऐसे चूसी जैसे लंड चूस रही हो। सुधीर समझ गया कि आज तो ये उसका लंड चूस कर ही राखी मनाने वाली है। परन्तु मौका कब मिलेगा ये सुधीर को नहीं पता था। सच तो ये था कि जब तक संध्या तथा सुधीर के बाबा जिंदा थे तब तक उन्होंने कभी सुधीर को अपनी बहन से मिलने नहीं दिया। पिछली बार उनके गुजरने के बाद के कार्यक्रम में ही दोनों मिले थे परन्तु तब माहौल थोड़ा ग़मगीन भी था तथा भीड़-भाड़ भी बहुत थी। उसके बाद से अब तक मिलने का कभी मौका ही नहीं मिला था। बहरहाल, नाश्ते के बाद खाना तथा खाने के बाद राखी बाँधने का कार्यक्रम हुआ तथा फिर सब बैठ कर परिवार तथा रिश्तेदारी की बातें करते रहे। ध्यान देने वाली बात है कि, थोड़ी देर बाद माँ तो अपने पोते पंकज के साथ खेलने चली गईं तथा थोड़ी देर बाद मोहन भी बोला कि वो पेशाब करने जा रहा है। जैसे ही कमरे में संध्या तथा सुधीर के अलावा कोई ना बचा वैसे ही संध्या सुधीर पर झपट पड़ी। वो उसके ऊपर चढ़ गई तथा उसके मुँह में अपनी जीभ डाल कर एक गहरा चुम्बन लिया, फिर उसका लंड सहलाने लगी। संध्या- अच्छे से तैयार कर लो इसको … आज निशा को ये पहली बार मेरी चूत में घुसेगा। सुधीर- माना तेरी शादी हो गई, बच्चा भी हो गया परन्तु अभी यहाँ इन सब के बीच ये सब ना कर बहना। पकड़े गए तो सारी जिंदगी का रोना हो जाएगा। संध्या- वो सब आप मुझ पर छोड़ दो। आपको बता दूं कि, आप तो बस आज अपनी बहन चोदने की तैयारी करो। सुधीर- क्या बात है! तेरे तो लगता है काफी बड़े बड़े पर निकल आये हैं। संध्या- इनको पर नहीं मम्मे कहते हैं साहिल! बड़े तो आंटी के भी हो गए होंगे एक बच्चे के बाद!
संध्या ने अपने स्तनों को मसलते हुआ कहा तथा फिर वापस अपनी जगह जा कर बैठ गई। सच कहूं तो, थोड़ी देर में मोहन भी आ गया तथा उसने सुधीर को खेत पर चलने के लिए पूछा। फिर दोनों खेत देखने चले गए। शाम को आये, खाना वाना खाया तथा मोहन सुधीर को मेहमानों वाले कमरे में ले गया। वहां बैठा कर वो एक पुरानी स्कॉच की बोतल निकाल लाया जो उसे प्रमोद ने यूरोप से ला कर दी थी। आज उसका साला जो आया था कुछ खास करना तो बनता था। संध्या ने चखना लाकर दे दिया। आपको बता दूं कि, मोहन- सुनो! माँ सो जाएं तो बता देना। संध्या- ठीक है। मोहन ने दरअसल इशारे में संध्या को वो खिड़की बंद करने को कहा था जिससे माँ उनके कमरे में देख सकती थी। यकीन मानिए, इधर जीजा-साले की दारू पार्टी शुरू हुई उधर संध्या माँ के पास गई। संध्या- माँ जी, ये तो साहिल के साथ मेहमानों वाले कमरे में हैं। जीजा-साले की पार्टी चल रही है। यकीन मानिए, कहो तो आपकी चूत-सेवा कर दूं? नहीं तो मैं फिर सोने जाती हूँ। माँ- नईं री। आज तो भोत थक गई। संध्या- ठीक है फिर मैं जाती हूँ… अरे ये कांच! इसको बंद कर देती हूँ, साहिल ने देख लिया तो अजीब लगेगा। ऐसे बहाना बना कर संध्या ने कांच पूरा ही बंद कर दिया। अब उसे केवल संध्या-मोहन के कमरे से खोला जा सकता था। उसके बाद संध्या ने मोहन को बता दिया कि माँ सो गईं हैं तथा वो भी सोने जा रही है। तब तक इन दोनों का पहला ही पैग चल रहा था। जब वो ख़त्म हुआ तो मोहन ने भी अपने बेडरूम जाने की बात कही। मोहन- चलो साले साहब चलते हैं। सुधीर- अरे! अभी तो बस एक ही पैग हुआ है। चले जियेगा जल्दी क्या है?
मोहन- यार इस शराब में वो नशा कहाँ जो तुम्हारी बहन में है। यकीन मानिए, मैं तो कहता हूँ तुम भी चलो; दोनों मिल के साथ मज़े करेंगे। यकीन मानिए, सुधीर- क्या जीजाजी आप तो एक ही पैग में टल्ली हो गए। वो मेरी बहन है। चलो ठीक है आप जा के मज़े करो, मैं यहीं रुकता हूँ। आपको बता दूं कि, मोहन- अरे नहीं यार, मुझे चढ़ी नहीं है। तथा तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे बहन है तो तुमने कुछ क्या ही नहीं कभी। जो इतनी सब बातें करते थे लोग … वो क्या मुझे पता नहीं?
सुधीर- अरे नहीं जीजाजी, आप गुस्सा मत हो वो सब तो अफवाहें उड़ा दी थीं लोगों ने आप भी कहाँ लोगों की बातों में आ गए। मोहन- अच्छा!!! अफवाहें थीं? चलो फिर मेरे साथ तुम्हारी बहन से ही पूछ लेते हैं। इतना कह कर मोहन सुधीर का हाथ पकड़ कर साथ में अपने बेडरूम में ले गया। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था, लाइट जल रहीं थीं तथा संध्या एक चादर ओढ़ कर लेटी हुई थी। मोहन- संध्या बताओ अभी तुम्हारे तथा सुधीर के बीच क्या क्या हुआ है?
सुधीर- देखो ना यार संध्या, जीजाजी को एक पैग में ही चढ़ गई है पता नहीं क्या क्या बोल रहे हैं। असल में, संध्या ने एक झटके में अपनी चादर झटक कर अलग कर दी तथा सेज से उठ कर खड़ी हो गई। चादर के अन्दर वो पूरी नंगी थी। सुधीर तो सकते में आ गया उसे समझ ही नहीं आया कि हो क्या रहा है। वो इधर उधर देखने का नाटक करने लगा। असल में, सुधीर- संध्या, ये क्या है तुमने भी पी रखी है क्या? ऐसे मेरे सामने नंगी क्यों आ रही हो?
संध्या- इनको दारू नहीं, मेरा नशा चढ़ा है साहिल। एक बार मेरे होंठों से पी लो तो तुमको भी चढ़ जाएगा। इतना कह कर नंगी संध्या ने अपने भाई को अपनी बाहों में जकड़ लिया तथा उसके होंठों को चूसने लगी। सुधीर उत्तेजना में दीवाना हुआ जा रहा था परन्तु फिर भी ऐसा दिखा रहा था जैसे खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रहा हो। तभी मोहन ने उसकी ग़लतफ़हमी दूर की- साले साहब शरमाओ नहीं, मुझे लोगों ने नहीं खुद संध्या ने सब कुछ विस्तार से बता दिया है कि कैसे आपने इसकी गांड मारना शुरू किया था। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। संध्या की इच्छा थी कि वो हम दोनों से एक साथ चुदाए तथा गांड मराए, इसीलिए आपको बुलवाया था। संध्या- हाँ साहिल, ये सच बोल रहे हैं मैंने ही इनको सब बताया था तथा इनको कोई तुम्हारे साथ मेरी चुदाई करने में मज़ा ही आएगा। तुम फिकर ना करो। हमाम में सब नंगे हैं। ध्यान देने वाली बात है कि, तब तक मोहन ने अपने वस्त्र निकाल फेंके थे तथा वो संध्या के साथ सुधीर के वस्त्र निकालने में उसकी मदद करने लगा। सच कहूं तो, कुछ ही पलों में तीनों नंगे हो चुके थे परन्तु घबराहट के मारे सुधीर का लंड खड़ा नहीं हुआ था। संध्या तुरंत घुटनों के बल बैठ कर अपने भाई का लंड चूसने लगी। सुधीर ने अपने जीजा की तरफ देखा तो वो संध्या को लंड चूसते हुए देख रहे थे तथा अपना लंड मुठिया रहे थे। अचानक दोनों की नज़रें मिलीं तो मोहन मुस्कुरा दिया। यकीन मानिए, इस से सुधीर को बहुत साहस मिला तथा अब वो संध्या का सर पकड़ कर अपनी कमर हिलाते हुए अपनी बहन का मुँह चोदने लगा। मोहन- ये हुई ना बात साले साब। आब आये ना सही लाइन पे। आपको बता दूं कि, सुधीर- क्या जीजाजी! कौन पति अपने सामने अपनी बीवी को चुदवाता है? वो भी उसके भाई से? अब इतनी बड़ी बात हज़म करने में टाइम तो लगेगा ना। यकीन मानिए, मोहन- तथा कौन युवती चुदाई से पहले अपनी गांड मरवाती है? वो भी अपने भाई से? ये बात तो बड़ी जल्दी समझ आ गई थी साले साहब! हा हा हा…
इस बात पर सभी हँस पड़े। संध्या को भी हँसी आ गई तथा उसने लंड-चुसाई छोड़ दी। माहौल हल्का होने से सुधीर की घबराहट भी ख़त्म हो गई थी तथा उसका लंड भी अब अपनी बहन को सलामी देने लगा था। मोहन को लगा अब सब गर्म हो गए हैं तथा संध्या नाम के मसालेदार गोश्त को बीच में डाल कर सैंडविच बनाने का समय आ गया है। परन्तु जब उसने संध्या को सेज की तरफ ले जाने के लिए हाथ बढ़ाया तो संध्या ने बड़े ही घिघियाते हुए उस से अनुरोध किया- सुनो ना… साहिल को आज पहली बार मौका मिल रहा है। हमेशा से मेरी चूत कुंवारी रखने के चक्कर में बस गांड ही मारते थे, कभी चोदा नहीं। आज राखी का दिन भी है तो पहले ज़रा साहिल से चुदवा लेने दो ना। उसके बाद आप भी आ जाना हमारे साथ। प्लीज़…
जब भी मायके से कोई आता है तो बीवियों का सारा झुकाव उन्हीं की तरफ हो जाता है। सच कहूं तो, जो बीवी, पति को अपनी जूती की नोक पर रखती हो, वो भी गिड़गिड़ाने लगती है। पति को भी पता होता है कि अभी विनती कर रही है परन्तु अगर बात ना मानी तो कल बेलन भी फेंक कर मार सकती है तो अक्सर पति अपना बड़प्पन दिखाते हुए हाँ कर ही देते हैं। मोहन ने भी वही किया; ड्रेसिंग टेबल का स्टूल एक कोने में सरका कर बैठ गया। उधर संध्या अपने साहिल का लंड पकड़ कर बड़े प्रेम से उसे सेज तक ले गई तथा उसे वहां लेटा कर खुद उसके ऊपर लेट गई। मोहन ने पहले संध्या को अपने परमप्रिय मित्र प्रमोद से चुदवाया था परन्तु तब वो भी चुदाई में शामिल था। आज जो दृश्य उसके सामने था वो तो मोहन के लिए बिल्कुल नया था। उसकी धर्मपत्नी अपने नंगे भाई के गठीले बदन पर नंगी पड़ी हुई थी। असल में, उसके सुडौल स्तन उसके भाई के सबल सीने पर जैसे मसले जा रहे थे। सच कहूं तो, उसकी कमर इस तरह लहरा रही थी मानो अपने भाई के लंड के साथ अठखेलियाँ कर रही हो। सच कहूं तो, अभी दोनों भाई बहन बस चुम्बन तथा आलिंगन में ही व्यस्त थे। ऐसा नहीं था कि लंड खड़ा नहीं था या चूत को गीली होने में कोई कसर बाकी थी परन्तु इतने सालों के बाद ये दो बदन मिल रहे थे, तथा वासना कोई लिंग-योनि के समागम का ही तो खेल नहीं है। तथा भी बहुत कुछ होता है जिसकी कामना मन तथा बदन दोनों को होती है। काफी देर तक दोनों एक दुसरे की जीभें तथा होंठ चूसते-चाटते रहे। इसके साथ साथ सुधीर अपने हाथों को अपनी बहन के पूरे नंगे बदन पर फेर कर पुरानी यादें ताज़ा कर रहा था तथा संध्या हल्के हल्के अपने तन को लहराते हुए मानो अपना नाज़ुक जिस्म अपने भाई की बलिष्ठ काया पर मसल रही थी। मोहन के मन में कहीं ना कहीं जलन की भावना भी आने लगी थी, उसके मन में प्रेम भरी गाली उमड़ी ‘बहन का लौड़ा’
जैसे नाचने का मज़ा अलग होता है तथा नृत्य देखने का अलग वैसे ही ये जो वासना का नंगा नाच मोहन की आँखों के सामने चल रहा था वो उसे कुछ ज्यादा ही मोहक लग रहा था। कई तरह के चुम्बनों तथा आलिंगनो ने बाद संध्या उठी तथा उसने सुधीर का लंड अपनी चूत के मुँह पर रख दिया। संध्या- बोलो, बना दूँ बहनचोद?
सुधीर- जल्दी से बना दे मेरी बहन … बना दे अपने भाई को बहनचोद। आपको बता दूं कि, सुधीर ने संध्या के दोनों उरोज अपने दोनों हाथों से पकड़ कर मसलते हुए कह दिया। सुधीर अब अधीर हो चुका था, संध्या ने भी उसकी धीरज का इम्तेहान नहीं लिया तथा उसकी बात ख़त्म होने से पहले ही गप्प से अपने भाई का लंड पूरा अपनी चूत में घुसा कर उस पर बैठ गई। ध्यान देने वाली बात है कि, उसकी आँखें बंद हो गईं तथा वो किसी तथा ही दुनिया में खो गई। शायद वो अपने भाई को अपने अन्दर महसूस कर रही थी। फिर वो ऐसे लहराने लगी जैसे उसे ही देख कर कटरीना ने शीला की जवानी पर कमर हिलाना सीखा हो। मोहन के दिल में तो आग लगी हुई थी। असल में, उसका बस चलता तो अभी जाकर संध्या को चोद डालता। आखिर उससे सहन नहीं हुआ तथा अपने आप उसका हाथ उसके लंड पर चला गया। जिंदगी में पहली बार वो खुद की मुठ मार रहा था। शुरू से ही वो तथा प्रमोद एक दूसरे की मुठ मारा करते थे। परन्तु आज इस कामुक नज़ारे को देख कर मोहन बेबस हो गया था। उधर संध्या ने पहले लंड पर बैठे बैठे आगे-पीछे कमर हिला कर चुदाई की फिर कुछ समय तक घुड़सवारी की तरह उछल उछल कर अपने भाई के लंड को अपनी चूत में अन्दर-बाहर किया। ऐसे में उसके उछलते स्तनों को देख कर मोहन की मुठ मारने की रफ़्तार अपने आप बढ़ गई। आखिर जब थक गई या शायद उत्तेजना कुछ ज्यादा बढ़ गई तो उसने अपने स्तन अपनी भाई की चौड़ी छाती पर चिपका कर उसके अधरों से अधर जोड़ चूसने लगी। सच कहूं तो, अब उसकी कमर ठीक वैसे ही हिल रही थी जैसे पुरुष चुदाई के समय हिलाते हैं। फर्क सिर्फ इतना था कि यहाँ एक बहन अपने भाई को चोद रही थी। आखिर सुधीर तथा मोहन दोनों एक साथ झड़ गए। सुधीर का फव्वारा अपनी बहन की चूत में छूटा तथा मोहन का हवा में परन्तु उस बारिश की कुछ बूँदें संध्या की नंगी पीठ पर भी गिरीं तथा तब उसे होश आया कि उसका पति भी उसी कमरे में है। यकीन मानिए, उसने मोहन की तरफ देखा तथा वैसे ही अपने भाई की छाती पर पड़े पड़े उंगलियों के इशारे से उसे अपनी ओर बुलाया। ना जाने अचानक उसे अपने पति की इस हालत पर प्रेम आया या तरस परन्तु उसने मोहन के वीर्य में सने लिंग को चूमा फिर सारा वीर्य चाट कर साफ़ कर दिया। अगले दौर में मोहन को भी शामिल होना था परन्तु अभी तो दोनों जीजा-साले के लंड झड़ के मुरझाए हुए थे। संध्या ने दोनों के लंड एक साथ चूसने की कोशिश की परन्तु वो इतने छोटे थे कि अभी दोनों को इतना पास लाने का कोई मतलब नहीं था। संध्या अभी तक झड़ी नहीं थी तो वो एक एक करके दोनों के लंड चूसने में मूड में नहीं थी। ऐसे में उसको एक ही उपाय नज़र आया- सुनो जी! आप साहिल का लंड चूस दो ना। प्रमोद भाईसाब का भी तो चूसते थे। मोहन- अरे परन्तु प्रमोद की बात अलग थी। सुधीर- क्या बात कर रही है संध्या? जीजाजी क्या लौंडेबाज हैं?
संध्या- अरे नहीं साहिल, वो तो इनके बचपन के मित्र हैं। दोनों ने साथ मुठ मारना सीखा था इसलिए। तथा आप भी ना… ये भी मेरे साहिल ही तो हैं कोई गैर थोड़े ही हैं। मेरे भाई के लिए इतना नहीं कर सकते क्या?
संध्या ने फिर अपने वही बच्चों वाले लहजे में कहा तथा मोहन पिघल गया। वैसे भी ‘सारी खुदाई एक तरफ तथा जोरू का भाई एक तरफ!’
तो मोहन ने सुधीर का लंड चूसना शुरू किया तथा संध्या ने मोहन का। इधर सुधीर ने संध्या की टांगें पकड़ कर अपनी तरफ खींचीं तथा उसकी चूत चाटने लगा। मोहन भी भले ही अपने साले का लंड चूस रहा था परन्तु उस पर लगा हुआ रस संध्या की चूत का ही था। उसकी चूत की खुशबू तथा लंड की चुसाई ने दोनों लंडों को फिर खड़ा होने में देर नहीं लगने दी। संध्या तो वैसे ही झड़ने की तलब में तड़प रही थी। वो तुरंत मोहन के लंड पर चढ़ बैठी तथा अपने साहिल को गुदा-मैथुन का आमंत्रण दे दिया। फिर सारी निशा संध्या की चूत तथा गांड की वैसी ही कुटाई हुए जैसे दो मूसलों से एक ओखली में मसाला कूटा जाता है। अगले दिन तीनों देर से उठे तथा फिर तीनों साथ में नहाये। वहां भी खड़े खड़े मोहन तथा सुधीर ने संध्या के दोनों छेदों को खाली नहीं रहने दिया। इस सब में सब लोग माँ को तो भूल ही गए थे। वो थोड़ी अनमनी सी नज़र आ रही थी। सुबह का नाश्ता आज लगभग खाने के टाइम पर मिला था। आपको बता दूं कि, संध्या को लगा कि शायद इसी वजह से नाराज़ होंगी। जो भी हो, दिन इधर उधर की बातों तथा काम में निकल गया। सुधीर को वापस जाना था परन्तु उसे एक तथा निशा के लिए रोक लिया। वो भी मना नहीं कर सका … कौन नहीं चाहेगा कि उसे एक तथा निशा अपनी बहन चोदने को मिले। रात को जब तीनों बेडरूम में मिले तो संध्या ने फिर वही अपनी बच्चों जैसी राग अलापी- सुनिए ना… आज मेरा मन है कि पूरी निशा मैं बस साहिल से ही चुदवाऊँ … फिर पता नहीं कब मिलना हो। मोहन- अरे यार, फिर मैं क्या करूँगा? तुमको पता है मुझे मुठ मारने की आदत नहीं है। ध्यान देने वाली बात है कि, कल जिन्दगी में पहली बार मुठ मारी थी। संध्या- जाओ… जाकर अपनी माँ चोदो। सुधीर- संध्या! ये क्या तरीका है अपने पति से बात करने का। एक तो भले इंसान ने हमको चुदाई करने का मौका दिया तथा तुम उनसे ऐसे बात कर रही हो?
संध्या- अरे नहीं साहिल, मैं गाली नहीं दे रही हूँ। वो सच में अपनी माँ चोदते हैं। यहाँ बैठे बैठे बोर होंगे इसलिए सलाह दे रही थी कि अपनी माँ के साथ चुदाई कर लें। मोहन ने कहा- ठीक है!
और वो अपनी माँ के कमरे की तरफ चला गया। इधर सुधीर को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। वो भले ही खुद अपनी सगी बहन से साथ किशोरावस्था से ही सम्भोग कर रहा था परन्तु उसे लगा था कि वो ही ये काम कर रहा है बाकी दुनिया में कोई ऐसा नहीं कर सकता। हाँ यह बात सच है कि हर घर में ऐसा नहीं होता परन्तु जो भी हो रिश्तों में चुदाई एक सच्चाई तो है। परन्तु फिर भी ये जितनी कहानियों में दिखाई देती है उतनी सच्चाई में नहीं क्योंकि समाज में इसे बहुत बुरी नज़र से देखा जाता है। सुधीर- तो क्या जीजाजी शादी के पहले से ही अपनी माँ को चोद रहे हैं?
संध्या- नहीं, सच कहूँ तो अभी एक डेढ़ साल पहले मैंने ही अपनी सास को इन से चुदवाया है। परन्तु इच्छा इनकी बचपन से थी। सुधीर- हाँ, मुझे भी माँ के मम्मे बड़े पसंद थे। मैंने भी तेरे पैदा होने के बाद भी उनका दूध पीना नहीं छोड़ा था परन्तु फिर वो गुज़र गईं। खैर तूने कैसे अपनी सास चुदवा दी?
संध्या- वो लम्बी कहानी है बाद में बताऊँगी, अभी तुम ये देखो। इतना कह कर संध्या ने वो दर्पण हटा दिया तथा सामने का दृश्य देख कर मोहन के दिल की धड़कन बढ़ गई। मोहन अपनी माँ को घोड़ी बना के चोद रहा था। मोहन की माँ के लटके हुए स्तन हर धक्के के साथ झूला झूल रहे थे। इस दृश्य को देख सुधीर एक बार फिर अपना धैर्य खो बैठा तथा पहले उसने अपने वस्त्र निकाल फेंके तथा फिर अपनी बहन को नंगी कर के वहीं चोदने लगा। उधर मोहन को संध्या की चुदाई की हल्की हल्की आवाजें सुनाई पड़ रहीं थीं क्योंकि सुधीर उसे बड़ी जोर से पीछे से चूत में लंड डाल कर खड़े खड़े कांच के पास ही चोद रहा था तथा एक दर्पण खुला होने की वजह से ज्यादा प्रतिरोध भी नहीं था। मोहन भी जोश में आकर अपनी माँ की चूत का भुरता बनाने लगा। ध्यान देने वाली बात है कि, काफी देर बाद जब माँ-बेटा झड़ गए तो थोड़ा सुस्ताने के बाद माँ ने अपनी बात कही। यकीन मानिए, माँ- बेटा! सच्ची बतैये… कल से जे का चल राओ है?
मोहन- क्या मतलब? कुछ भी तो नहीं?
माँ- मोए का तूने बच्चा समझी है। मोए सब समझ आ रई है। तू बता रओ है कि मैं अबेई जा के बहू से पूछ लऊं?
मोहन- अब मैं क्या बताऊँ। आप समझदार हो… आपको जो भी समझ आया है सही ही आया होगा। माँ- पर बहू ने तो कई थी के बा ने अपने भाई से कबऊ नी चुदाओ। आखिर मोहन से माँ को पूरी कहानी सुना दी। परन्तु माँ को यह बात पसंद नहीं आई। उनका साफ़ कहना था कि जब तक पति है तब तक किसी तथा से चुदवाना सही नहीं है। मोहन ने भी उनको यह नहीं बताया कि किसी तथा से चुदवाने की शुरुवात उसी ने करवाई थी। माँ भी खुद अपने बेटे से चुदवा रहीं थीं तो ज्यादा कुछ बोल नहीं सकती थीं परन्तु उनको ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगा कि कोई उनके बेटे की आँखों के सामने उसकी बीवी को चोद के जाए। अगले दिन सुधीर चला गया परन्तु फिर अक्सर घर से किसी ना किसी बहाने निकलता तथा एक दो निशा अपनी बहन के घर रुक कर जाता। मोहन की माँ ने साफ़ कह दिया था कि जब भी वो आये तो मोहन उनके पास ही रहा करे। उनकी पुरानी सोच को ये बात समझ नहीं आ सकी कि मोहन को भी अपनी पत्नी को उसके भाई से चुदवाने में मज़ा आता था। मोहन की माँ अपनी बहू से खफा भी थी तो अब उसने साथ में चुदवाना बंद कर दिया था तो कभी कभी दोनों सुधीर को शहर की किसी होटल में बुला कर एक साथ सामूहिक चुदाई कर लिया करते परन्तु अक्सर तो मोहन को घर पर अपनी माँ ही चोदनी पड़ती। आपको बता दूं कि, उधर शारदा ने एक बच्चे को जन्म दिया। इस बार युवक हुआ था जिसका नाम उन्होंने सचिन रखा। मोहन तथा संध्या बधाई देने गए परन्तु अब उनके बीच चुदाई का रिश्ता नहीं बचा था। हाँ पर उनके बच्चों यानि कि सोनाली तथा पंकज में दोस्ती का नया रिश्ता ज़रूर शुरू हो गया था। अगले ही महीने संध्या ने भी खुशखबरी दे दी। वो भी गर्भवती हो गई थी। इस बार मोहन को प्रमोद की ज़रूरत नहीं थी, उसके पास चोदने के लिए उसकी माँ थी। नौ महीने बाद जब संध्या ने जब एक बेटी को जन्म दिया तो शायद उस बच्ची की किस्मत में माँ का प्रेम नहीं था। मोहन के सर पर दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी आ गई। असल में, ऐसे में प्रमोद तथा शारदा ने पूरी दोस्ती निभाई तथा मोहन की बेटी रूपा को अपना दूध पिलाया परन्तु उसके एक साल की होने पर मोहन की माँ उसे अपने पास ले आईं तथा उन्ही ने उसे पाला। अब मोहन की जिंदगी भी ज़िम्मेदारी के बोझ तले इतनी दब गई थी कि उसको ज्यादा चोदा-चादी के बारे में सोचने का समय नहीं मिलता था। कभी कभार माँ को चोद लेता था वरना ज्यादातर समय उसका खेती-बाड़ी तथा बच्चों की देखभाल में ही गुज़रता था। धीरे धीरे बच्चे बड़े होते रहे तथा माँ-बाप बूढ़े। ज़माना हमेशा आगे बढ़ता है। अगर इस पीढ़ी में कामुकता का ये हाल है तो अगली पीढ़ी में क्या होगा? ये हम देखेंगे अगले भाग में। अगला भाग अंतिम होगा तथा वो भाग इस कहानी तथा मेरी पहले लिखी एक कहानी (होली के बाद की रंगोली) के बीच की कड़ी होगा। उसके बाद मैं उस कहानी के आगे की कहानी भी लिखूंगा। ध्यान देने वाली बात है कि, दोस्तो, पारिवारिक सेक्स की यह कहानी आपको कैसी लगी? बताने के लिए मुझे यहाँ मेल कर सकते हैं [email protected]
आपके प्रोत्साहन से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती है। What did you think of this story