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केले का भोज-4

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क्षितिज कहीं पास दिख रहा था। मैंने उस तक पहुँचने के लिए और जोर लगा दिया… कोई लहर आ रही है… कोई मुझे बाँहों में कस ले, मुझे चूर दे… ओह… कि तभी ‘खट : खट : खट’… मेरी साँस रुक गई। योनि एकदम से भिंची, झटके से हाथ खींच लिया… खट खट खट… हाथ में केवल डंठल और छिलका था। मैं बदहवास हो गई। अब क्या करूँ? ‘निशा, दरवाजा खोलो !’… खट खट खट… मैंने तुरंत नाइटी खींची और उठ खड़ी हुई। केला अन्दर महसूस हो रहा था। चलकर दरवाजे के पास पहुँची और चिटकनी खोल दी। अंजलि मेरे उड़े चेहरे को देखकर चौंक पड़ी- क्या बात है? मैं ठक ! मुँह में बोल नहीं थे। ‘क्या हुआ, बोलो ना?’ क्या बोलती? केला अन्दर गड़ रहा था। मैंने सिर झुका लिया। आँखें डबडबा आईं। अंजलि घबराई, कुछ गड़बड़ है, कमरे में खोजने लगी। केले का छिलका बिस्तर पर पड़ा था। नाश्ते की दोनों प्लेटें एक साथ स्टडी टेबल पर रखी थीं। ‘क्या बात है? कुछ बोलती क्यों नहीं?’ मेरा घबराया चेहरा देखकर संयमित हुई,’आओ, पहले बैठो, घबराओ नहीं। ’ मेरा कंधा पकड़कर लाई और बिस्तर पर बिठा दिया। मैं किंचित जांघें फैलाए चल रही थी और फैलाए ही बैठी। ‘अब बोलो, क्या बात है?’ मैंने भगवान से अत्यंत आर्त प्रार्थना की- प्रभो… बचा लो। अचानक उसके दिमाग में कुछ कौंधा। उसने मेरी चाल और बैठने के तरीके में कुछ फर्क महसूस किया था। केले का छिलका उठाकर बोली- क्या मामला है?’ मैं एकदम लाज से गड़ गई, सिर एकदम झुका लिया, आँसू की बूंदें नाइटी पर टपक पड़ी। ‘अन्दर रह गया है?’ मैंने हथेलियों में चेहरा छिपा लिया। असल में, बदन को संभालने की ताकत नहीं रही। बिस्तर पर गिर पड़ी। अंजलि ठठाकर हँस पड़ी- मिस निशा, आपसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी। आप तो बड़ी सुशील, मर्यादित और सो कॉल्ड क्या क्या हैं?’ उसकी हँसी बढ़ने लगी। मुझे गुस्सा आ गया- बेदर्द लड़की ! मैं इतनी बड़ी मुश्किल में हूँ और तुम हँस रही हो? ‘हँसूं न तो क्या करूँ? मुझसे तो बड़ी बड़ी बातें कहती हो, खुद ऐसा कैसे कर लिया?’ मैंने लाज और गुस्से से मुँह फेर लिया। अब क्या करूँ? बेहद डर लग रहा था। देखना चाहती थी कितना अन्दर फँसा हुआ है, निकल सकता है कि नहीं। कहीं डॉक्टर बुलाना पड़ गया तो? सोचकर ही रोंगटे खड़े हो गए। कैसी किरकिरी होगी ! मैंने आँख पोछी और हिम्मत करके कमरे से बाहर निकली। कोशिश करके सामान्य चाल से चली, गलियारे में कोई देखे तो शक न करे। बाथरूम में आकर दरवाजा बंद किया और नाइटी उठाकर बैठकर नीचे देखा। दिख नहीं रहा था। काश, आइना लेकर आती। हाथ से महसूस किया। केले का सिरा हाथ से टकरा रहा था। बेहद चिकना। नाखून गड़ाकर खींचना चाहा तो गूदा खुदकर बाहर चला आया। और खोदा। ध्यान देने वाली बात है कि, उसके बाद उंगली से टकराने लगा और नाखून गड़ाने पर भीतर धँसने लगा। मैंने उछल कर देखा, शायद झटके से गिर जाए। डर भी लग रहा था कि कहीं कोई पकड़ न ले। कई बार कूदी। बैठे बैठे और खड़े होकर भी। कोई फायदा नहीं। कूदने से कुछ होने की उम्मीद करना आकाश कुसुम था। फँस गई। कैसे निकलेगा? कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी रही। फिर निकलना पड़ा। चलना और कठिन लग रहा था। यही केला कुछ क्षणों पहले अन्दर कितना सुखद लग रहा था ! कमरे के अन्दर आते ही अंजलि ने सवाल किया,’निकला?’ मैंने सिर हिलाया। हमारे बीच चुप्पी छाई रही। परिस्थिति भयावह थी। ‘मैं देखूँ?’ हे भगवान, यह अवस्था ! मेरी दुर्दशा की शुरुआत हो चुकी थी। मैं बिस्तर पर बैठ गई। अंजलि ने मुझे पीछे तकिए पर झुकाया और मेरे पाँवों के पास बैठ गई। मेरी नाइटी उठाकर मेरे घुटनों को मोड़ी और उन्हें धीरे धीरे फैला दी। यकीन मानिए, बालों की चमचमाती काली फसल… पहली बार उस पर बाहर की नजर पड़ रही थी। अंजलि ने होंठों को फैलाकर अन्दर देखा। हे भगवान कोई रास्ता निकल आए ! उसने उंगलियों से होंठों के अन्दर, अगल बगल टटोला, महसूस किया। बाएँ दाएँ, ऊपर नीचे। आपको बता दूं कि, नाखून से खींचने की असफल कोशिश की, भगांकुर को सहलाया। ये क्यों? मन में सवाल उठा, क्या यह अभी भी तनी अवस्था में है? अंजलि ने गुदा में भी उंगली कोंची, दो गाँठ अन्दर भी घुसा दी। घुसाकर दाएं बाएँ घुमाया भी। मैं कुनमुनाई। आपको बता दूं कि, यह क्या कर रही है? पलकों की झिरी से उसे देखा, उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कहीं वह मुझसे खेल तो नहीं रही है? ‘ओ गॉड, यह तो भीतर घुस गया है। सच कहूं तो, ’ उसके स्वर में वास्तविक चिंता थी- क्या करोगी?’ ‘डॉक्टर को बुलाओगी? वार्डन को बोलना पड़ेगा। हॉस्टल सुपरिंटेंडेंट जानेगी, फिर सारी टीचर्स,… ना ना… बात सब जगह फैल जाएगी। ’ ‘ना ना ना… ‘ मैंने उसी की बात प्रतिध्वनित की। कुछ देर हम सोचते रहे। समय नहीं है, जल्दी करना पड़ेगा, इन्फेक्शंन का खतरा है। … मैं क्या कहूँ। ‘एक बात कहूँ, इफ यू डोंट माइंड?’ ‘…’ मैं कुछ सोच नहीं पा रही। ‘विक्रम को बुलाऊँ? एमबीबीएस कर रहा है। कोई राह निकाल सकता है। सबके जानने से तो बेहतर है एक आदमी जानेगा। ’ बाप रे ! एक लड़का। सच कहूं तो, वह भी सीधे मेरी टांगों के बीच ! ना ना… ‘निशा, और कोई रास्ता नहीं है। थिंक इट। यही एक संभावना है। ’ कैसे हाँ बोलूँ। अब तक किसी ने मेरे बदन को देखा भी नहीं था। यह तो उससे भी आगे… मैं चुप रही। ‘जल्दी बोलो निशा। यू आर इन डैंजर। अन्दर बॉडी हीट से सड़ने लगेगा। फिर तो निकालने के बाद भी डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा। लोगों को पता चल जाएगा। ’ इतना असहाय जिंदगी में मैंने कभी नहीं महसूस किया था,’ओके…’ ‘तुम चिंता न करो। ही इज ए वेरी गुड फ्रेड ऑव मी (वह मेरा काफी ही अच्छा दोस्त है। आपको बता दूं कि, )’ उसने आँख मारी- हर तरह की मदद करता है। ’ गजब है यह लड़की। इस अवस्था में भी मुझसे मजाक कर रही है। उसने विक्रम को फोन लगाया- विक्रम, क्या कर रहे हो… नाश्ता कर लिया?… नहीं?… तुम्हारे लिए यहाँ काफी अच्छा नाश्ता है। यकीन मानिए, खाना चाहोगे? सोच लो… इटस ए लाइफटाइम चांस… नाश्ते से अधिक उसकी प्लेट मजेदार… नहीं बताऊँगी… अब मजाक छोड़ती हूँ। तुम तुरंत आ जाओ। माइ रूममेट इज इन अ बिग प्राब्लम। मुझे लगता है तुम कुछ मदद कर सकते हो… नहीं नहीं.. फोन पर नहीं कह सकती। इट्स अर्जेंट… बस तुरंत आ जाओ। ’ मुझे गुस्सा आ रहा था। ‘ये नाश्ता-वाश्ता क्या बक रही थी?’ ‘गलत बोल रही थी?’ उसे कुछ ध्यान आया, उसने दुबारा फोन लगाया- विक्रम , प्लीज अपना शेविंग सेट ले लेना। मुझे लगता है उसकी जरूरत पड़ेगी। यकीन मानिए, ’ शेविंग सेट! क्या बोल रही है?… अचानक मेरे दिमाग में एकदम से साफ हो गया… क्या वहाँ के बाल मूंडेगी? हाय राम!!! कुछ ही देर में दरवाजे पर दस्तक हुई। ‘हाय निशा ! ‘ विक्रम ने भीतर आकर मुझे विश किया और समय में मैं बस एक ठंडी ‘हाय’ कर देती थी, इस वक्त मुस्कुराना पड़ा। ध्यान देने वाली बात है कि, ‘क्या प्राब्लम है?’ अंजलि ने मेरी ओर देखा, मैं कुछ नहीं बोली। ‘इसने केला खाया है। ’ ‘तो?’ ‘वो इसके गले में अटक गया है। ध्यान देने वाली बात है कि, ’ उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरे,’ऐसा कैसे हो सकता है?’ ‘मुँह खोलो !’ अंजलि हँसी रोकती हुई बोली- उस मुँह में नहीं… बुद्धू… दूसरे में… उसमें। ’ उसने उंगली से नीचे की ओर इशारा किया। आपको बता दूं कि, विक्रम के चेहरे पर हैरानी, फिर हँसी ! फिर गंभीरता… हे भगवान, धरती फट जाए, मैं समा जाऊँ। आपको बता दूं कि, ‘यह देखो’, अंजलि ने उसे छिलका दिखाया- टूटकर अन्दर रह गया है। ’ ‘यह तो सीरियस है। ’ विक्रम सोचता हुआ बोला। ‘बहुत कोशिश की, नहीं निकल रहा। ध्यान देने वाली बात है कि, तुम कुछ उपाय कर सकते हो?’ विक्रम विचारमग्न था। बोला- देखना पड़ेगा। ’ मैंने स्वाचालित-सा पैरों को आपस में दबा लिया। ‘निशा…’ मैं कुछ नहीं सुन पा रही थी, कुछ नहीं समझ पा रही थी। कानों में यंत्रवत आवाज आ रही थी- निशा… बी ब्रेव…! यह सिर्फ हम तीनों के बीच रहेगा…..!’ मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाया हुआ है। मुझे पीछे ठेलकर तकिए पर लिटा रही है। मेरी नाइटी ऊपर खिंच रही है… मेरे पैर, घुटने, जांघें… पेड़ू… कमर…प्रकट हो रहे हैं। मेरी आत्मा पर से भी खाल खींचकर कोई मुझे नंगा कर रहा है। पैरों को घुटनों से मोड़ा जा रहा है… दोनों घुटनों को फैलाया जा रहा है। सच कहूं तो, मेरा बेबस, असहाय, असफल विरोध… मर्म के अन्दर तक छेद करती पराई नजरें… स्त्री की अंतरंगता के चिथड़े चिथड़े करती… कहानी जारी रहेगी। [email protected] 2385 What did you think of this story